संपादकीय | धान कुटाई की आड़ में सरकारी चावल की लूट, सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा सवाल

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रूद्रपुर में सामने आया स्वास्तिक राइस लैंड प्राइवेट लिमिटेड का मामला केवल 2811 क्विंटल चावल की हेराफेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं में व्याप्त लापरवाही, मिलीभगत और निगरानी तंत्र की कमजोरियों का जीवंत उदाहरण बन चुका है। मूल्य समर्थन योजना जैसी संवेदनशील व्यवस्था, जिसका उद्देश्य किसानों को सुरक्षा देना और गरीबों तक अनाज पहुंचाना है, उसी योजना को कुछ निजी मिल संचालकों ने निजी मुनाफे का जरिया बना लिया।
खरीफ सत्र 2023-24 में पीसीयू द्वारा आवंटित धान के बदले निर्धारित समय पर चावल जमा न करना, भौतिक सत्यापन में मिल से स्टॉक का पूरी तरह गायब मिलना और बाद में भुगतान के नाम पर झूठे आश्वासन व खोखले चेक देना—ये सभी तथ्य यह संकेत देते हैं कि यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, न कि कोई प्रशासनिक चूक। लगभग 98.47 लाख रुपये की राजस्व हानि सीधे-सीधे सरकारी खजाने और अंततः जनता की जेब पर चोट है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि अंतिम तिथि बीतने के बाद भी लंबे समय तक मिल प्रबंधन को मोहलत क्यों दी जाती रही? क्या समय रहते सख्त कार्रवाई होती तो सरकारी चावल बाजार में बिकने से बचाया जा सकता था? यह मामला केवल तीन आरोपियों तक सीमित न रहे, बल्कि इसकी जांच उन अधिकारियों की भूमिका तक भी पहुंचे, जिनकी जिम्मेदारी निगरानी और समयबद्ध कार्रवाई की थी।
पुलिस द्वारा निदेशकों और लेखाकार पर मुकदमा दर्ज किया जाना एक आवश्यक कदम है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं। जरूरत है कि मिल की संपत्तियों को तत्काल सीज कर राजस्व की भरपाई सुनिश्चित की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कुटाई मिलों की निगरानी प्रणाली को और सख्त किया जाए।
सरकारी अनाज की लूट केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है। यदि ऐसे मामलों में उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संदेश जाएगा कि सिस्टम को ठगा जा सकता है। अब वक्त है कि प्रशासन इस प्रकरण को चेतावनी मानते हुए पूरे राज्य में धान कुटाई और चावल जमा प्रक्रिया की गहन समीक्षा करे, ताकि गरीबों का हक और सरकारी संसाधन दोनों सुरक्षित रह सकें।


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