

रुद्रपुर,उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक एकता, सामूहिक संघर्ष और राज्य निर्माण की साझा पीड़ा पर खड़ा हुआ राज्य है। यहाँ पहाड़ और मैदान की पहचान नहीं, बल्कि “उत्तराखंडी अस्मिता” प्राथमिक रही है। लेकिन हाल के दिनों में कांग्रेस पार्टी जिस ढंग से राजनीतिक नैरेटिव खड़ा कर रही है, वह इस राज्य की आत्मा पर सबसे तीखा राजनीतिक प्रहार है। खानपुर विधायक उमेश कुमार और किच्छा के वरिष्ठ नेता तिलक राज बहेड़ की मुलाकात सिर्फ एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि कांग्रेस की गहरी रणनीति का संकेत है— पहाड़ बनाम मैदान की राजनीति को पुनर्जीवित कर वोट हासिल करने की कोशिश।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
कांग्रेस यह भूल रही है कि यही विभाजन रेखा कभी उत्तराखंड आंदोलन के संघर्ष कमजोर कर चुकी है। आज वही राजनीति फिर उभारी जा रही है—
पहाड़ अलग, मैदान अलग।
पहाड़ का नेतृत्व अलग, मैदान का अलग।
कौन दबा रहा है? कौन हाशिये पर है?
ऐसे प्रश्न उछाले जा रहे हैं, मानो उत्तराखंड एक राज्य नहीं बल्कि दो टुकड़ों में बंटी हुई राष्ट्रीयता हो।
उमेश कुमार को मैदान की राजनीति के चेहरे के रूप में आगे बढ़ाना और तिलक राज बहेड़ के बयानों से “मैदान की अनदेखी” का माहौल बनाना — यह सब कांग्रेस की सुनियोजित चुनावी इंजीनियरिंग का हिस्सा है। कांग्रेस मैदान में अपनी कमजोर पकड़ को “क्षेत्रीय असंतोष” के नाम पर मजबूत करना चाहती है, लेकिन यह वही राजनीति है जो समाज को जोड़ती नहीं, तोड़ती है।
इस बीच हरक सिंह रावत के बयान और हरिद्वार की “पहाड़–मैदान एकता रैली” ने इस खेल को पूरी तरह उजागर कर दिया। सवाल यह है —
यदि एकता लक्ष्य है तो विभाजन का नैरेटिव क्यों?
“पहाड़ बनाम मैदान” के नाम पर भावनाओं को भड़काया जाएगा, फिर मंच पर “एकता” का नारा?
यह एक राजनीतिक नाटक है, जिसमें जनता को दर्शक और वोट को इनाम की तरह देखा जा रहा है।
परंतु कांग्रेस का यह दांव 2025–27 के राजनीतिक समीकरणों के बीच गहरी भूल साबित हो सकता है। आज उत्तराखंड का मतदाता उस दौर से आगे निकल चुका है जब भावनात्मक और क्षेत्रीय विभाजन वोट दिला देता था। जनता की प्राथमिकताएँ बिल्कुल स्पष्ट हैं —
सुरक्षा, रोजगार, विकास, कानून व्यवस्था और स्थिर नेतृत्व।
और इन मुद्दों पर वर्तमान में उत्तराखंड में सबसे अधिक स्वीकार्यता भाजपा के पास है। नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय दृष्टि और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की निर्णायक छवि जनता के बीच भरोसा पैदा कर चुकी है।
▸ UCC
▸ लव जिहाद व भूमि जिहाद पर रोक
▸ धार्मिक विरासत संरक्षण
▸ विकास के एजेंडे पर फोकस
इन कदमों ने भाजपा को जनभावना से जोड़ रखा है — जबकि कांग्रेस भावनाओं को भड़काकर सत्ता की सीढ़ी ढूंढ रही है।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि उत्तराखंड अब “पहाड़ बनाम मैदान” के भावनात्मक संघर्ष में नहीं फंसेगा।
यहाँ रहने वाला हर नागरिक — चाहे पहाड़ में जन्मा हो या मैदान में बसा — उत्तराखंडी है।
मतदाता अब पूछता है —
कौन राज्य का भविष्य सुरक्षित रखेगा? कौन स्थिर नेतृत्व देगा? कौन राष्ट्रहित, सुरक्षा और विकास में भरोसेमंद है?
कांग्रेस यदि पहाड़–मैदान को चुनावी हथियार बनाकर आगे बढ़ती रही, तो यह दांव खुद उसी पर उलटा पड़ेगा।
उत्तराखंड की जनता अब स्पष्ट संदेश दे चुकी है —
विकास पर वोट मिलेगा, विभाजन पर नहीं
नेतृत्व पर भरोसा होगा, राजनीतिक प्रयोगों पर नहीं
राज्य की एकता पर हमला किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं
और यही कारण है कि कांग्रेस की यह “नवीन रणनीति” नहीं, बल्कि राजनीतिक आत्मघात साबित होती दिख रही है।




