संपादकीय“वायदों की राजनीति, संघर्ष की जमीनी हकीकत — उपनल कर्मचारियों के धैर्य की अंतिम परीक्षा”

Spread the love

उत्तराखंड राज्य गठन का मूल उद्देश्य था—पर्वतीय क्षेत्रों के युवाओं को रोजगार, सुरक्षा और सम्मान दिलाना। लेकिन आज राज्य स्थापना के 25 वर्ष बाद भी, हजारों युवा उपनल कर्मचारी असुरक्षा, अस्थिरता और अनिश्चित भविष्य से घिरे हुए हैं।
सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, घोषणाएं बदलीं… पर नहीं बदला तो सिर्फ उपनल कर्मचारियों का दर्द।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

रुद्रपुर नगर निगम में इन दिनों उपनल कर्मचारी महासंघ उत्तराखण्ड, जनपद इकाई ऊधम सिंह नगर शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठा है। यह धरना कोई अचानक जन्मी नाराज़गी नहीं—बल्कि वर्षों से चले आ रहे उपेक्षा, शोषण और भटकाव के खिलाफ सामूहिक आक्रोश की आवाज़ है। इससे पहले कलेक्ट्रेट परिसर रुद्रपुर, और उससे पहले देहरादून परेड ग्राउंड से यही संघर्ष जारी है। पूरे प्रदेश में उपनल कर्मचारियों की आवाज़ एक ही सवाल गूंजा रही है—
“कब तक हम ठेका आधारित मजदूर समझे जाएंगे?”और सच यही है कि इस सवाल का अब तक किसी सरकार के पास ठोस जवाब नहीं है।

उपनल कर्मचारियों की दो सूत्रीय मांग – सरल, न्यायसंगत, लेकिन उपेक्षित?यूनियन और कर्मचारियों की मांगें लंबी और जटिल नहीं हैं। वे सिर्फ यह चाहते हैं:

1️⃣ समान कार्य = समान वेतन
2️⃣ नियमित रोजगार और सुरक्षित भविष्य के लिए स्पष्ट नियमावली

यह मांगें न तो अव्यवहारिक हैं, और न ही तात्कालिक राजनीतिक दवाब की उपज।
कर्मचारी शिक्षण से लेकर तकनीकी सेवाओं तक, स्वास्थ्य व्यवस्था से प्रशासन तक — हर विभाग में वही कार्य करते हैं जो नियमित कर्मचारी करते हैं।
परंतु वेतन में जमीन-आसमान का अंतर है।अफसोस की बात यह है कि न्यायालय भी कर्मचारियों के पक्ष में अपना फैसला सुना चुका है, फिर भी सरकारें अदालत के आदेशों को “फाइलों में दफन” किए बैठी हैं।
कर्मचारियों का यह दावा पूरी तरह सही है कि—

नैनीताल उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के बावजूद नियमितीकरण पर सरकार ने आज तक एक इंच भी आगे कदम नहीं बढ़ाया।

मंत्रिमंडलीय उप-समिति — वास्तविक समाधान या सिर्फ समय टालने की राजनीति?

हाल ही में राज्य सरकार ने घोषणा की कि उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण सहित अन्य मुद्दों पर विचार के लिए एक मंत्रिमंडलीय उप-समिति बनाई जाएगी, और समिति दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपेगी।

पहली नजर में यह कदम सकारात्मक लगता है, पर सवाल यह भी उठता है —

क्या यह समिति समाधान खोजने के लिए बनी है, या

आंदोलन ठंडा करने के लिए समय खरीदने का तरीका है?

क्योंकि उतना ही सच यह भी है कि पिछले तीन कार्यकालों में सरकारें बार-बार समितियां बनाती रही हैं, रिपोर्टें आती रहीं, मगर ज़मीन पर स्थिति जस की तस बनी रही।

उपनल कर्मचारियों ने इन अनुभवों के कारण एकदम सही कहा —
“समिति नहीं, नीति चाहिए। वादा नहीं, व्यवस्था चाहिए।”

धामी सरकार की घोषणाएं — कागज़ों से आगे क्यों नहीं बढ़ पाईं?

सरकार ने कई बार मंचों पर कहा:

उपनल कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन दिया जाएगा

महंगाई भत्ता (DA) लागू होगा

कर्मचारियों के लिए विदेशों में रोजगार के अवसर भी खोले जाएंगे

सुनने में यह सब शानदार लगता है।
लेकिन धरातल पर सत्य एकदम विपरीत है —

➡ नगर निगम रुद्रपुर में कर्मचारी आज भी धरने पर बैठे हैं
➡ कलेक्ट्रेट में भी महीनों पहले यही विरोध हुआ था
➡ देहरादून परेड ग्राउंड में आंदोलन अभी भी जारी है

यदि घोषणाएं पूरी होतीं — तो आज यह आंदोलन क्यों चलते?

उत्तर साफ है —
कागज़ों पर कल्याण और धरातल पर शोषण — यही वास्तविकता है।

राज्य के निर्माण में युवाओं ने संघर्ष किया — और आज वही युवा न्याय के लिए संघर्ष को मजबूर हैं

यदि आज कोई सबसे बड़ा व्यंग्य है, तो वह यही कि —
उत्तराखंड युवा संघर्ष से जन्मा राज्य है, और आज वही युवाओं को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

उपनल कर्मचारियों की उम्र धीरे-धीरे बढ़ रही है।
नौकरी अस्थायी है, वेतन सीमित है, भविष्य अनिश्चित है…
ऐसे में घर, परिवार, बच्चों की पढ़ाई, चिकित्सा, और सामाजिक सम्मान… सब सवालों में घिर जाते हैं।


बयान 1 — मनोज कुमार, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष, उपनल कर्मचारी संघ

“सरकार महंगाई पर भाषण देती है लेकिन हम कर्मचारियों का पेट भरने के लिए क्या कर रही है, कोई जवाब नहीं है। हम 10–15 साल से एक ही पद पर काम कर रहे हैं, हर विभाग की रीढ़ बनकर सेवा दे रहे हैं, लेकिन नियमितीकरण आज तक अधर में अटका है।
हमने राज्य के विकास में दिन-रात काम किया, चुनावों में वादे सुने, लेकिन अब सब भूल गए। अगर सरकार ने नियमितीकरण पर ठोस और अंतिम निर्णय नहीं लिया तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उपनल कर्मचारी अपना जवाब देंगे और चुनाव प्रचार तक में एग्जाम रोककर विरोध करने का रास्ता भी अपनाएंगे। हम किसी राजनीतिक दल के नहीं — अपने हक के लिए लड़ रहे हैं।”


बयान 2 — आशा देवी, डाटा एंट्री ऑपरेटर

“हम संविदा पर काम करते-करते थक गए हैं। हमारी उम्र बीत गई, लेकिन नौकरी की अनिश्चितता वैसी ही है। 16 साल से सिस्टम चलाने वाली उंगलियां अब भी ‘कॉन्ट्रैक्ट’ पर ही गिनी जा रही हैं। महंगाई दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन हमारा वेतन वही का वही — इस अन्याय का जवाब कौन देगा?
हमारी मांग सिर्फ स्थायी नौकरी की है, कोई दान-भिक्षा नहीं। हम चाहती हैं कि सरकार हमें सम्मान दे, सुरक्षा दे और भविष्य का भरोसा दे। हम पीछे हटने वाली नहीं — जब तक नियमितीकरण नहीं होगा, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।”


बयान 3 — करम सिंह दानू, पर्यावरण पर्यवेक्षक

“हम पर्यावरण संरक्षण से लेकर सरकारी योजनाओं की ज़मीन पर निगरानी तक का काम कर रहे हैं। काम स्थायी, जिम्मेदारियां स्थायी — फिर रोजगार अस्थायी क्यों?
सरकार के पास नई नियुक्तियों के लिए बजट है, बाहरी कंपनियों के लिए भुगतान है, लेकिन जिन कर्मचारियों ने सिस्टम संभाला हुआ है उनके लिए नियमितीकरण नहीं — यह सीधा अन्याय है।
अगर हमारी आवाज़ नहीं सुनी गई तो हम शांतिपूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक संघर्ष और तेज करेंगे — क्योंकि हमारा मुद्दा सिर्फ रोजगार नहीं, सम्मान का भी है।”


मनोज गहतोड़ी का बयान

4, उपनल कर्मचारियों के आंदोलन ने शुक्रवार को नया मोड़ ले लिया,मनोज कुमार गहतोड़ी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर सीधे निशाना साधते हुए कहा कि “जब वह मुख्यमंत्री बनने से पहले विपक्ष में थे, तब हमारे धरनों को खुलकर समर्थन देते थे, लेकिन आज सत्ता में आने के बाद हमारी आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है।”गहतोड़ी ने आरोप लगाया कि नियमितीकरण को लेकर हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सरकार केवल समय निकालने में लगी है, जिससे कर्मचारियों में भारी नाराज़गी है। उनका कहना था कि हजारों उपनल कर्मचारी वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन न तो उनके भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है और न ही वेतन-भत्तों में सुधार किया गया है।
चेतावनी के अंदाज़ में गहतोड़ी ने कहा कि यदि इसी तरह उपेक्षा जारी रही, तो “2027  परिणाम मुकदमे को तैयार रहे— और सरकार को उपनल कर्मचारियों की ताकत का अंदाज़ा तब होगा।”उन्होंने साफ कहा कि संघर्ष अब सड़क से विधानसभा तक जाएगा और सरकार को मजबूर होना पड़ेगा कि कर्मचारियों के हित में निर्णय ले।

क्या ऐसे मानसिक बोझ में कोई व्यक्ति अपनी ड्यूटी में 100% दे सकता है?
फिर भी ये कर्मचारी पूरी ईमानदारी से काम कर रहे हैं —
यह अपने आप में एक मानवीय साहस है।

सरकार की वास्तविक परीक्षा अब शुरू हुई है

यदि सरकार सच में संवेदनशील है, यदि मुख्यमंत्री सच में रोजगार और युवाओं की बात करते हैं, तो अब सिर्फ एक काम करना होगा —

✔ समान वेतन — समान कार्य लागू किया जाए
✔ नियमितीकरण और सेवा सुरक्षा नीति तत्काल बनाई जाए
✔ कोर्ट के फैसलों को तुरंत लागू किया जाए

यह न तो राजनीतिक दान है, और न ही चुनावी रेवड़ी —
यह योग्य कर्मचारियों का अधिकार है।

आंदोलन जारी रहेगा तो नुकसान किसका?

सरकार को यह समझना होगा कि इस संघर्ष के परिणाम तीन स्तर पर पड़ रहे हैं —

1️⃣ कर्मचारियों का मानसिक और आर्थिक नुकसान
2️⃣ सार्वजनिक सेवाओं में बाधा
3️⃣ सरकार की छवि पर आघात

आंदोलन लंबा खिंचने पर जनता और सरकार दोनों हारेंगे,
और संघर्षरत कर्मचारी हर दिन टूटेंगे।

इसलिए यह जरूरी है कि सरकार अब विलंब की राजनीति नहीं,
न्याय की नीति पर काम करे।
अंत में — निर्णय की घड़ी आ चुकी है

उपनल कर्मचारियों ने बार-बार “विश्वास” दिखाया है।
अब बारी सरकार की है कि वह विश्वसनीयता दिखाए।

यह लड़ाई न वेतन की है, न सत्ता की —
यह लड़ाई सम्मान, सुरक्षा और स्थायित्व की है।

राज्य के हज़ारों उपनल कर्मचारी आज रुद्रपुर, देहरादून और विविध जिलों में सिर्फ यही कह रहे हैं —

“हम भी इसी राज्य के नागरिक हैं। हमें भी स्थायी भविष्य का अधिकार है।”

सरकार को यह आवाज़ सुननी ही होगी।
या तो समाधान करके सुनेगी —
या फिर इतिहास के कटघरे में खड़ी होकर सुनेगी।


Spread the love