संपादकीय:रजत जयंती वर्ष में रामनगर बनेगा इतिहास का साक्षी –राज्य आंदोलनकारियों का संकल्प सम्मेलन”✍️ अवतार सिंह बिष्ट संपादक – हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स

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उत्तराखंड राज्य स्थापना की रजत जयंती वर्षगांठ के अवसर पर 6 नवंबर 2025, बृहस्पतिवार को रामनगर ऐतिहासिक गवाह बनने जा रहा है। राज्य आंदोलन की गौरवगाथा को समर्पित यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उन तमाम राज्य आंदोलनकारियों की भावना का जीवंत प्रतीक है, जिन्होंने अलग राज्य के लिए संघर्ष की अग्निपरीक्षा से गुजरकर देवभूमि को नया राजनीतिक स्वरूप दिया। पर्वतीय सभा, लखनपुर के सभागार में होने वाला यह राज्य आंदोलनकारी सम्मेलन अपनी भव्यता, विषय-वस्तु और उद्देश्य से निश्चित ही ऐतिहासिक सिद्ध होने जा रहा है।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राज्य के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के मुख्य अतिथि के रूप में आने की पूरी संभावना है। आंदोलनकारी प्रतिनिधिमंडल, जिसमें वरिष्ठ आंदोलनकारी खड़क सिंह बगड़वाल, केदार पलाड़िया, पुष्कर दुर्गापाल और प्रभात ध्यानी सहित कई प्रमुख साथी शामिल रहे, ने बीते दिवस नैनीताल प्रशासन और मुख्यमंत्री कार्यालय से संपर्क बनाए रखा। प्रतिनिधिमंडल ने आयुक्त कुमाऊं मंडल श्री दीपक रावत जी से हल्द्वानी कैंप कार्यालय में भेंट कर मुख्यमंत्री जी को औपचारिक आमंत्रण पत्र सौंपा।

यह भेंट महज औपचारिकता नहीं थी, बल्कि उसमें राज्य निर्माण आंदोलन की आत्मा झलक रही थी। आंदोलनकारियों ने विस्तार से कुमाऊं कमिश्नर से चर्चा की और उन्हें सम्मेलन के उद्देश्य, तीन सूत्रीय ज्ञापन और राज्य आंदोलनकारियों की वर्तमान स्थितियों से अवगत कराया। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी को सम्मेलन में संबोधित करने से पहले एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा जाएगा, जिसमें प्रमुख रूप से तीन महत्वपूर्ण माँगें रखी जाएँगी—

1️⃣ राज्य आंदोलनकारियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह समस्त सुविधाएं दी जाएँ,
2️⃣ राज्य आंदोलनकारियों के लिए क्षैतिज आरक्षण का पूर्ण लाभ सुनिश्चित किया जाए,
3️⃣ वंचित आंदोलनकारियों को उनके योगदान के आधार पर न्यायपूर्ण मान्यता और आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।

सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री जी को राज्य आंदोलनकारी संगठन की ओर से एक प्रतीक चिन्ह भी भेंट किया जाएगा, जो उनके संघर्ष और राज्य निर्माण की भावना के प्रति सम्मान का प्रतीक होगा।

राज्य आंदोलन की 25वीं वर्षगांठ पर यह सम्मेलन इसलिए भी विशेष है कि जब सरकार रजत जयंती के नाम पर पूरे राज्य में विकास के नारे लगा रही है, वहीं सच्चे सेनानी आज भी पेंशन, पहचान और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। उत्तराखंड की जनता जानती है कि जिस जनांदोलन ने इस राज्य की नींव रखी, उसकी आत्मा आज भी जीवित है, और वह आत्मा इन्हीं आंदोलनकारियों के भीतर धड़क रही है।

प्रभात ध्यानी, खड़क सिंह बगड़वाल, पुष्कर दुर्गापाल, केदार पलाडिया जैसे वरिष्ठ आंदोलनकारी वर्षों से इस मांग को उठा रहे हैं कि राज्य आंदोलनकारियों को लोकतंत्र सेनानियों की तर्ज पर ₹20,000 प्रतिमाह पेंशन दी जाए। वर्तमान में जो अल्प पेंशन दी जा रही है, वह न तो उनकी सामाजिक गरिमा के अनुरूप है, न ही उनके त्याग और संघर्ष की कीमत का आकलन कर सकती है। आज जब लोकतंत्र सेनानियों को सम्मानजनक पेंशन और सुविधाएं मिल रही हैं, तब राज्य निर्माण सेनानियों के लिए भी समान व्यवस्था करना सरकार का नैतिक और ऐतिहासिक दायित्व है।

यह सम्मेलन केवल पेंशन या सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का प्रश्न है। जब-जब उत्तराखंड की धरती ने अपने आंदोलन की गूंज सुनी है, तब-तब यह पर्वतीय अस्मिता की पुकार रही है — “हमने राज्य मांगा था, सत्ता नहीं।” यही भावना आज फिर रामनगर के सम्मेलन से उठेगी।

इस भव्य आयोजन के लिए रामनगर के स्थानीय संयोजक साथियों की भूमिका उल्लेखनीय है। चंद्रशेखर जोशी, इंद्र सिंह मनराल, योगेश सती, शेर सिंह लटवाल, हरीश भट्ट (पत्रकार), राजेंद्र खुल्बै, नवीन नैथानी, डा. धनेश्वरी घिल्डियाल, अनिल अग्रवाल (खुलासा) आदि सभी ने पूरे समर्पण और टीम भावना के साथ सम्मेलन की तैयारी को दिशा दी है। पर्वतीय सभा, लखनपुर चुंगी के पास स्थित सभागार को सम्मेलन स्थल के रूप में चुना गया है, जो उत्तराखंड के इतिहास के इस नए अध्याय का साक्षी बनेगा।

सम्मेलन के आयोजक प्रभात ध्यानी (मो. 9837758770), चंद्रशेखर जोशी (7017598577), इंद्र सिंह मनराल (9411597877) और नवीन नैथानी (9837180665) ने सभी राज्य आंदोलनकारियों, उनके परिवारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनता से इस ऐतिहासिक सम्मेलन में अधिक से अधिक संख्या में पहुँचने की अपील की है।

यह रजत जयंती वर्ष केवल जश्न का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का समय भी है। 25 वर्षों में उत्तराखंड ने विकास की राह पर कई उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन उस आंदोलन की मूल आत्मा – “जन सरोकारों पर आधारित राज्य” – अब भी अधूरी है। राज्य आंदोलनकारियों का संघर्ष यही याद दिलाता है कि सत्ता बदलने से नहीं, व्यवस्था के मूल में जनता को जोड़ने से ही उत्तराखंड का सपना पूरा होगा।

रामनगर का यह सम्मेलन एक बार फिर उस एकता, समर्पण और अस्मिता की भावना को जीवित करेगा, जिसने कभी गढ़वाल-कुमाऊं को जोड़कर ‘उत्तराखंड’ नामक स्वप्न को साकार किया था। जब मंच पर सैकड़ों आंदोलनकारी एक स्वर में अपने अधिकारों की मांग करेंगे, तब वह केवल पेंशन या सुविधा की आवाज़ नहीं होगी — वह उस अधूरे वादे की पुकार होगी, जिसे 9 नवंबर 2000 के बाद से बार-बार भुलाया गया।

राज्य सरकार और मुख्यमंत्री धामी जी के लिए यह अवसर है कि वे इस सम्मेलन को केवल प्रतीकात्मक न मानें, बल्कि इसे उत्तराखंड की आत्मा के पुनर्जागरण का पर्व समझें। अगर इस मंच से यह घोषणा होती है कि राज्य आंदोलनकारियों को लोकतंत्र सेनानियों की तरह ₹20,000 मासिक पेंशन दी जाएगी, तो यह निर्णय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा।

रामनगर का सम्मेलन केवल बीते संघर्षों की याद नहीं, बल्कि आने वाले उत्तराखंड की नई दिशा तय करने का मंच है। यह वही आवाज़ है जो कहती है—

“हमने पहाड़ मांगे थे, सिर्फ सीमेंट की इमारतें नहीं।”

इसलिए आइए, 6 नवंबर को पर्वतीय सभा, लखनपुर में एकत्र हों।
राज्य आंदोलन की जड़ों को फिर से सींचें,
और रजत जयंती को केवल उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का पर्व बनाएं।

सभी राज्य आंदोलनकारियों और जनसरोकारों से जुड़े साथियों से निवेदन है — रामनगर आइए, इस ऐतिहासिक सम्मेलन का हिस्सा बनिए।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट
संपादक – हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
(राज्य निर्माण आंदोलनकारी एवं जनसरोकार पत्रकार)


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