

रुद्रपुर की ठंडी होती शाम में जनता इंटर कॉलेज का प्रांगण उस रात कविता, भावना और जनसमर्थन के रंगों में सराबोर था। मंच पर राष्ट्र के महापुरुषों, शहीदों और मातृभूमि की महिमा का गुणगान करते हुए कवि मंचासीन थे — डॉ. हरिओम पंवार (मेरठ), शम्भू शिखर (बिहार), दिनेश बावरा (मुंबई), अमित शर्मा (नई दिल्ली), काव्या जैन (बाजपुर) और सुदीप भोला (जबलपुर) जैसे नामों ने जब अपने शब्दों से सभा को बांधा, तो तालियों की गड़गड़ाहट ने रुद्रपुर के सांस्कृतिक आकाश में एक नई ऊर्जा भर दी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे उत्तराखंड के प्रख्यात उद्योगपति श्री शिवकुमार अग्रवाल, और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तराखंड के अध्यक्ष एडवोकेट डी.पी. यादव। मंच पर विराजमान यह सभी व्यक्तित्व किसी राजनीतिक दल या मंच से नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना से जुड़े हुए थे — और यही इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी खूबी थी।
परंतु इस गैर राजनीतिक विराट कवि सम्मेलन में जो दृश्य पंक्तियों के आगे बैठे लोगों की आँखों में दिखा, वह एक गहरी सामाजिक लहर का संकेत भी दे गया।
जनता इंटर कॉलेज: कविता का मंच, सहानुभूति का मंजर
रुद्रपुर शहर में जब भी कोई सांस्कृतिक आयोजन होता है, वहाँ राजनीति की हल्की परछाई अनायास चली आती है। पर यह कवि सम्मेलन अलग था। मंच पर कविता थी, व्यंग्य था, और जनता थी — मगर दर्शकदीर्घा में जो उत्साह उमड़ा, वह महज़ कविता के लिए नहीं था।
पहली पंक्ति में बैठे थे शहर के कई सामाजिक चेहरे — व्यापारी, शिक्षक, अधिवक्ता, समाजसेवी, और वे जनप्रतिनिधि जो वर्षों से रुद्रपुर के राजनीतिक परिदृश्य के गवाह रहे हैं। इन सबके बीच बैठे थे पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, जिनकी उपस्थिति भले “गैर राजनीतिक” रूप में थी, पर जनभावना ने इसे अलग ही अर्थ दे दिया।
लोगों के चेहरे पर अपनापन, समर्थन और पुनः एक उम्मीद की झलक थी। यह वही जनसमूह था, जिसने 2022 में ठुकराल के निर्दलीय चुनावी संघर्ष को देखा था — और अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले, यह कवि सम्मेलन मानो एक सांस्कृतिक बहाने से “सहानुभूति लहर” की भूमिका तैयार कर रहा था।
राजकुमार ठुकराल: जनभावना की नई धारा
रुद्रपुर की जनता राजकुमार ठुकराल को एक राजनीतिक चेहरे से अधिक, एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी देखती है। चाहे जनसमस्याओं पर मुखर आवाज उठाना हो, या धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सहभागिता — ठुकराल हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे हैं।
कवि सम्मेलन में जब “भारत मां के वीरों पर” कविता गूंज रही थी, तभी ठुकराल के समर्थकों की भीड़ ने पूरे पंडाल को खचाखच भर दिया। यह महज कवि प्रेमियों का जमावड़ा नहीं था — यह उन समर्थकों की उपस्थिति थी जो अपने नेता को फिर से मुख्यधारा में लौटते हुए देखना चाहते हैं।
गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में शहर की नब्ज़ फिर से ठुकराल के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। सिटी क्लब के हालिया चुनाव में संजय ठुकराल — जो राजकुमार ठुकराल के भाई हैं — ने सबसे अधिक मतों से विजय हासिल की थी। इसे जनता ने एक “परिवार की सामाजिक पुनर्स्थापना” के रूप में देखा। यह जीत संकेत दे रही है कि जनता अब ठुकराल परिवार को एक बार फिर सामाजिक नेतृत्व के केंद्र में देखना चाहती है।
साहित्य और समाज की साझी भूमि
कवि सम्मेलन की सबसे सुंदर बात यह थी कि इसने राजनीति और समाज के बीच की दूरी को मिटाया — बिना राजनीतिक भाषणों के।
मंच से न कोई नारा लगा, न कोई दलगत संबोधन हुआ। लेकिन कविता की पंक्तियाँ जब देशप्रेम, समाज और न्याय की बात कर रही थीं, तब पंडाल में बैठे हर व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ जाग उठा।
डॉ. हरिओम पंवार की कविता “जब तक जवान जिंदा है, तब तक हिंदुस्तान जिंदा है” पर जो तालियाँ गूंजीं, उनमें भावनाओं के साथ-साथ उस नेतृत्व की पुकार भी थी जो जनता के दिलों में अभी तक मरी नहीं।
सहानुभूति से समर्थन तक: 2027 का संकेत
राजकुमार ठुकराल ने 2022 का चुनाव निर्दलीय लड़ा था — और उस समय यह कदम एक “विद्रोही निर्णय” माना गया था। परंतु आज, रुद्रपुर की जनता उस निर्णय को “आत्मसम्मान की राजनीति” के रूप में देखने लगी है।
2027 के चुनाव की सुगबुगाहट अभी दूर है, लेकिन इस कवि सम्मेलन में जो दृश्य दिखाई दिया, उसने संकेत दे दिया है कि ठुकराल का राजनीतिक आधार अब भी अक्षुण्ण है।
उनके समर्थकों का संगठनात्मक नेटवर्क, सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी निरंतर मौजूदगी और जनता के बीच व्यक्तिगत संबंध — यह सब अब एक बार फिर सक्रिय होते दिख रहे हैं।
वास्तव में, यह कवि सम्मेलन न तो किसी राजनीतिक मंच का प्रदर्शन था, न प्रचार का अवसर — पर इसके माध्यम से जो माहौल बना, उसने रुद्रपुर की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।
संस्कार और नेतृत्व का संगम
सुदीप भोला (जबलपुर) और शम्भू शिखर (मधुबनी) की हास्य कविताओं ने जब दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर किया, तो वह ठहाके सिर्फ मनोरंजन नहीं थे — वह शहर की थकी हुई राजनीति के बीच नई ऊर्जा का प्रतीक थे।
राजकुमार ठुकराल की उपस्थिति ने इस आयोजन को और जीवंत बना दिया। उन्होंने मंच पर कोई भाषण नहीं दिया, पर उनका मौन भी बहुत कुछ कह गया। जनता का अभिवादन, मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ना, और समर्थकों की उत्साहित प्रतिक्रियाएँ — सब कुछ संकेत दे रहे थे कि रुद्रपुर की राजनीति में ठुकराल अभी “बीते हुए कल” नहीं, बल्कि “आने वाले कल” का हिस्सा हैं।
संवाद से विश्वास की ओर
इस कवि सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता यही थी कि इसने समाज को फिर से जोड़ने की कोशिश की।
जहां एक ओर कविता ने संस्कृति का दर्पण दिखाया, वहीं दूसरी ओर जनसमूह ने यह साबित किया कि राजनीति से परे भी समाज में नेतृत्व की चाह बनी रहती है।
शहर के कई बुजुर्गों ने कहा — “यह वही माहौल है जो ठुकराल के पहले कार्यकाल के समय दिखता था — जनता, समाज और नेतृत्व का सहज संवाद।”
यह संवाद आज कविता के बहाने लौटा है, और शायद यही इस आयोजन का सबसे बड़ा संदेश भी है।
संस्कृति की छांव में जनराजनीति का पुनर्जागरण
‘विराट कवि सम्मेलन’ जैसे आयोजन यह सिद्ध करते हैं कि रुद्रपुर की जनता संस्कृति और समाज के साथ-साथ नेतृत्व की भी कद्र करती है।
यह कार्यक्रम भले गैर राजनीतिक रहा हो, पर इसकी सामाजिक ऊर्जा और जनसंदेश ने राजनीति की जमीन पर नई हरियाली बो दी है।
राजकुमार ठुकराल के प्रति सहानुभूति लहर अब सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से संगठित होती जा रही है।
2027 का चुनाव अभी दूर है, पर रुद्रपुर की गलियों में कविता की गूंज के साथ यह फुसफुसाहट भी सुनाई दी —
“ठुकराल लौटे तो रुद्रपुर बोलेगा।”
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स संपादकीय टिप्पणी:
संस्कृति और राजनीति जब साथ चलते हैं, तो समाज का पुनर्जागरण होता है। रुद्रपुर का यह कवि सम्मेलन उसी नवजागरण का प्रारंभ है — जहाँ कविता के साथ नेतृत्व भी जनभावनाओं में पुनर्जीवित हो रहा है।




