संपादकीय,आस्था, कानून और पाखंड के बीच फँसा रुद्रपुर

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भारत के कुछ शहरों को कानूनी रूप से पूरी तरह शाकाहारी घोषित किया गया है—पालीताना, ऋषिकेश, हरिद्वार, पुष्कर और सीमित अर्थों में अयोध्या। इन स्थानों पर यह निर्णय किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी धार्मिक परंपराओं, सामाजिक सहमति और विधिसम्मत आदेशों के आधार पर लिया गया। यहाँ शाकाहार “घोषणा” नहीं, बल्कि स्थापित सामाजिक अनुशासन है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


लेकिन रुद्रपुर में नॉनवेज पर लगाया गया हालिया प्रतिबंध इस श्रेणी में नहीं आता। यह न तो किसी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सर्वसम्मति का परिणाम है, न ही किसी विधायी प्रक्रिया का। इसे जबरन धर्म से जोड़कर सही ठहराने की कोशिश की जा रही है—और यहीं से सवाल खड़े होते हैं।
महापौर विकास शर्मा द्वारा यह कहना कि “रुद्रपुर भगवान रुद्र के नाम पर है, इसलिए नॉनवेज प्रतिबंधित होगा”, न केवल ऐतिहासिक अज्ञानता दर्शाता है बल्कि राजनीतिक पाखंड की भी मिसाल है। रुद्रपुर का नाम राजा रुद्र चंद्र के नाम पर पड़ा था—कुमाऊँ के एक प्रतापी शासक, न कि किसी धार्मिक कल्पना पर। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर धार्मिक रंग देना भाजपा की वही पुरानी रणनीति लगती है, जिसमें हर शहर, हर सड़क और हर निर्णय को जबरन आस्था से जोड़ दिया जाता है।
यदि शाकाहार को बढ़ावा देना उद्देश्य है, तो यह जन-जागरूकता, स्वास्थ्य और पर्यावरण के तर्कों से किया जा सकता है। लेकिन इसे “भगवान के नाम” पर थोपना न तो लोकतांत्रिक है, न संवैधानिक। भोजन व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसे नगर निगम के एक आदेश से अपराध नहीं बनाया जा सकता।
विडंबना यह है कि यही भाजपा, जो विकास और आधुनिकता की बात करती है, स्थानीय इतिहास से अनभिज्ञ होकर सांस्कृतिक पहचान को भी विकृत कर रही है। रुद्रपुर को धार्मिक नगरी साबित करने की हड़बड़ी में उसकी ऐतिहासिक विरासत को ही नकार दिया गया।
साफ है—नॉनवेज पर प्रतिबंध महापौर की व्यक्तिगत आकांक्षा हो सकती है, लेकिन उसे पूरे शहर पर थोपना और उसे धर्म की आड़ देना स्वीकार्य नहीं। आस्था स्वेच्छा से निभाई जाती है, आदेश से नहीं। और इतिहास को झूठ के सहारे बदलने की कोशिश अंततः सत्ता के पाखंड को ही उजागर करती है।


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