

देहरादून में एमडीडीए द्वारा शुरू की जा रही ड्रोन सर्विलांस प्रणाली केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि तेजी से अनियंत्रित हो रहे शहरीकरण पर ‘नियंत्रण की नई नीति’ है। देहरादून का अनुभव बताता है कि जमीन पर पहुंचते-पहुंचते सबूत मिट जाते हैं, अवैध फ्लोर रातों-रात खड़े हो जाते हैं, खेतों में प्लॉट काटने वाले अपनी गतिविधियों को छुपा लेते हैं और शिकायतों का कोई प्रभाव नहीं दिखता। ऐसे में आसमान से की जाने वाली निगरानी वह सच्चाई पकड़ लेती है जिसे जमीन पर खड़ा अधिकारी अक्सर देख ही नहीं पाता।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
इसी पृष्ठभूमि में रुद्रपुर और पूरे उधम सिंह नगर से उठी मांग बिल्कुल जायज़ है। यहां की स्थिति देहरादून से अलग नहीं—बल्कि कई मामलों में अधिक गंभीर है। रुद्रपुर, किच्छा, बाजपुर, गदरपुर, काशीपुर और सितारगंज में अवैध कॉलोनियों, फर्जी लेआउट, दो-मंजिला-से-अधिक निर्माण, स्टिल्ट पार्किंग की जगह दुकानों में तब्दील किए गए बेसमेंट, और खेतों में धड़ल्ले से कट रही अवैध प्लाटिंग ने जिले के नियोजित विकास मॉडल को लगभग विचलित कर दिया है।
लोकल निकायों की सीमित मानव-शक्ति और बढ़ते राजनीतिक दबावों के कारण कार्रवाई अक्सर कागज तक ही सिमट जाती है। कई बार तो अवैध निर्माण पूरी तरह तैयार हो जाता है, उसके बाद नोटिस दिए जाते हैं—जो अपने आप में एक मजाक जैसा है। ऐसे में ड्रोन आधारित सर्विलांस रुद्रपुर की वह जरूरत है जो वर्षों से अनसुनी रही है।
रुद्रपुर की कठिनाई यह है कि शहर तेजी से फैल रहा है, लेकिन प्रशासनिक नियंत्रण उसी पुराने मॉडल पर अटका है।
अगर एमडीडीए देहरादून में रियल-टाइम फुटेज को केस फाइल का डिजिटल साक्ष्य बना सकता है, तो उधम सिंह नगर का विकास प्राधिकरण, नगरपालिका और जिला प्रशासन इस मॉडल को अपनाने से पीछे क्यों हटें?
—ड्रोन फुटेज से अवैध प्लॉटिंग तुरंत पकड़ी जा सकती है।
—पहले से खड़े हो चुके गैरकानूनी फ्लोर की पहचान बिना देरी की जा सकती है।
—गदरपुर-किच्छा रोड, पंतनगर क्षेत्र, ट्रांजिट कैंप, खेड़ा–फुलसुंगी, रम्पुरा, लालपुर और बाइपास के आसपास चल रही गुप्त कॉलोनी कटाई पर तुरंत नकेल लगाई जा सकती है।
आज जब शहर का विस्तार अनियंत्रित गति से हो रहा है, तब केवल नोटिस और निरीक्षण पर आधारित पुराना सिस्टम असफल साबित हो चुका है। जनता




