

रुद्रपुर विकास के नाम पर सड़कों को बेतरतीब ढंग से खोदने, सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी और नागरिकों की जान जोखिम में डालने वाली कार्यप्रणाली पर देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल का कड़ा रुख स्वागतयोग्य है। सात एजेंसियों की रोड कटिंग अनुमति निरस्त करना केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सीधा तमाचा है जो वर्षों से “पहले खोदो, फिर भरो, फिर दोबारा खोदो” के फार्मूले पर चलता आया है। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित खबर का संज्ञान लेकर लिया गया यह निर्णय बताता है कि यदि प्रशासन चाहे तो अव्यवस्था पर लगाम लग सकती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
लेकिन सवाल यह है—क्या यह कार्रवाई केवल एक शहर या कुछ एजेंसियों तक सीमित रह जाएगी, या फिर इसका असर रुद्रपुर और पूरे उधम सिंह नगर के उस विकास मॉडल पर पड़ेगा, जो दिखने में ‘स्मार्ट’ और हकीकत में ‘अस्मार्ट’ बन चुका है?
रुद्रपुर: चौड़ीकरण के नाम पर खुदाई का चक्रव्यूह
रुद्रपुर शहर की सड़कों का इतिहास बीते दो वर्षों से किसी व्यंग्य कथा से कम नहीं है। पहले चौड़ीकरण के नाम पर सड़क बनाई गई। फिर उसी नई सड़क को खोद दिया गया—कभी नाली के लिए, कभी पाइपलाइन के लिए, कभी केबल डालने के लिए। खुदाई से निकली मिट्टी बाहर फेंकी गई, उसका कोई हिसाब नहीं। फिर बताया गया कि मिट्टी खरीदी जाएगी, कंक्रीट बिछेगी, सड़क बनेगी।
अब वही सड़क फिर से चौड़ी हो रही है। फिर से खुदाई। फिर से मिट्टी गायब। फिर से कंक्रीट। और हर बार बोर्ड टंग जाता है—“कार्य प्रगति पर है”।
दो साल होने को हैं, लेकिन प्रगति कहाँ है? सड़कें अधूरी हैं, गड्ढे स्थायी हो गए हैं और जनता अस्थायी परेशानियों को स्थायी नियति मानने को मजबूर है।
बजट किसका, हिसाब किसका?
सबसे बड़ा प्रश्न—इन कार्यों के लिए कितना बजट पास हुआ? किस मद से हुआ? कितनी बार हुआ?
रुद्रपुर ही नहीं, पूरे जिले में यही हाल है। कहीं सड़क बनती है, फिर नाली बनती है। कहीं नाली बनती है, फिर सड़क क्रॉस की जाती है। और हर बार नई खुदाई, नई भराई, नया बिल।
पीडब्ल्यूडी हो या नगर निगम, जल संस्थान हो या पेयजल निगम, ऊर्जा निगम हो या स्मार्ट सिटी—हर विभाग अपनी-अपनी परियोजना लेकर सड़क पर उतरता है। समन्वय शून्य है, लेकिन खुदाई का उत्साह चरम पर। जिम्मेदारी तय करने की बात आते ही फाइलें एक-दूसरे के टेबल पर सरकने लगती हैं।
‘सड़क खोदो अभियान’ और जिम्मेदारों की चुप्पी
यह सिलसिला अब किसी अभियान जैसा बन चुका है—“सड़क खोदो अभियान”। इसमें ठेकेदार, संबंधित अधिकारी और विभागीय बाबू—तीनों की भूमिका संदिग्ध नहीं, बल्कि स्पष्ट है।
पहले सड़क बनाओ, फिर उसी सड़क को खोदो। इससे काम भी मिलता है, भुगतान भी, और अगले साल फिर मरम्मत के नाम पर नया टेंडर भी।
किसी ने नहीं बताया कि जो मिट्टी खुदाई से निकली, वह कहाँ गई। यदि वह बेकार थी तो पहले क्यों बिछाई गई? यदि उपयोगी थी तो फिर खरीदी क्यों जा रही है? इस ‘मिट्टी विज्ञान’ का उत्तर किसी के पास नहीं।
कलेक्ट्रेट परिसर: करोड़ों की टाइल्स, महीनों में टूटन
यदि कोई यह समझे कि यह अव्यवस्था केवल सड़कों तक सीमित है, तो उसे कलेक्ट्रेट परिसर का एक चक्कर लगा लेना चाहिए।
करोड़ों रुपये की लागत से लगी टाइल्स मानकों के विपरीत लगाई गईं और नई-नवेली होने के बावजूद टूटने लगीं। दीवारें थक चुकी हैं, स्टेडियम की दीवारों पर हल्की दरारें दिखने लगी हैं, फर्श बैठने लगे हैं।
यह वही परिसर है, जहाँ से पूरे जिले के विकास की निगरानी होती है। यदि यहीं गुणवत्ता दम तोड़ रही है, तो बाकी शहर का हाल समझा जा सकता है।
ओवरब्रिज और कंक्रीट का ‘डामरीकरण’
रुद्रपुर ओवरब्रिज की कंक्रीट सड़क कभी गर्व से बताई जाती थी—“25 साल तक चलने वाली सड़क।”
लेकिन अब उसी कंक्रीट पर डामर बिछा दिया गया। सवाल उठता है—यह कौन सा इंजीनियरिंग नियम है?
असल जवाब सब जानते हैं। कंक्रीट सड़क एक बार बनती है, लंबे समय तक चलती है। डामर सड़क हर साल मरम्मत मांगती है। और मरम्मत का मतलब—हर साल टेंडर, हर साल बिल, हर साल कमाई।
भ्रष्टाचारियों ने कंक्रीट को भी कमाई का साधन बना लिया है। यह विकास नहीं, बल्कि योजनाबद्ध लूट का मॉडल है।
देहरादून के जिलाधिकारी का कदम: उम्मीद की किरण
ऐसे माहौल में जिलाधिकारी सविन बंसल द्वारा रोड कटिंग की अनुमति निरस्त करना एक सकारात्मक और साहसिक कदम है। यह संदेश स्पष्ट है—सुरक्षा मानकों की अनदेखी और नागरिकों की परेशानी अब बर्दाश्त नहीं होगी।
लोनिवि, राष्ट्रीय राजमार्ग, नगर निगम सहित सभी एजेंसियों को 10 दिन में सड़कों को पूर्व स्थिति में लाने का निर्देश भी दिखाता है कि प्रशासन अब केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं रहना चाहता।
आगे क्या?
लेकिन यह कार्रवाई तभी सार्थक होगी, जब:
समन्वित योजना बने—सड़क, नाली, पाइपलाइन, केबल—सब एक साथ।
जिम्मेदारी तय हो—कौन अधिकारी, कौन विभाग, कौन ठेकेदार।
बजट की पारदर्शिता हो—कितना पैसा, कितनी बार, किस काम के लिए।
गुणवत्ता की जांच हो—काम पूरा होने के बाद नहीं, काम के दौरान।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आज सात एजेंसियों की अनुमति रद्द होगी, कल नई एजेंसियां आ जाएंगी और ‘कार्य प्रगति पर’ के बोर्ड फिर लग जाएंगे।
रुद्रपुर और उधम सिंह नगर की जनता विकास के खिलाफ नहीं है। जनता सड़क चाहती है, लेकिन ऐसी सड़क नहीं जो हर छह महीने में खुद जाए।




