

रुद्रपुर की कल्याणी नदी अपने उफान पर है और इस विनाशकारी बाढ़ ने 200 से अधिक परिवारों को तबाह कर दिया है। घरों में कमर तक पानी भरा है, रजाइयाँ, कपड़े, राशन, सिलेंडर, बच्चों की कॉपियाँ और किताबें—सब या तो बह गए हैं या पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इन परिवारों के सामने अब दो वक्त की रोटी जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

लेकिन दुःखद विडंबना यह है कि इस आपदा की घड़ी में नेताओं और समाजसेवियों की प्राथमिकता पीड़ितों का हाथ थामना नहीं, बल्कि कैमरों के सामने कमर तक पानी में खड़े होकर फोटो खिंचवाना है। सोशल मीडिया पर अपलोड की गईं तस्वीरें भले ही कुछ घंटों की टीआरपी दिला दें, परंतु पीड़ित परिवारों के आँसू, भूख और बेबसी को कोई राहत नहीं दे सकतीं।
यह समय “फोटोशूट राजनीति” का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। ज़िला प्रशासन और सरकार को चाहिए कि इन परिवारों की वास्तविक स्थिति को समझकर उन्हें आर्थिक सहायता मुहैया कराए। केवल अस्थायी राहत शिविरों में भोजन बाँट देना पर्याप्त नहीं है। यह स्पष्ट है कि जिन परिवारों के घर और सामान पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं, उन्हें स्थायी रूप से पुनर्वासित करना ही होगा।

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स यह माँग करता है कि—
- प्रभावित हर परिवार को तुरंत आर्थिक सहायता पैकेज दिया जाए।
- जिनके घर पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, उन्हें स्थायी आवास उपलब्ध कराया जाए।
- बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए कॉपियाँ, किताबें और आवश्यक शैक्षणिक सामग्री सरकार की ओर से तुरंत उपलब्ध कराई जाए।
- प्रशासनिक स्तर पर इस आपदा की गंभीरता को देखते हुए दीर्घकालिक पुनर्वास योजना बनाई जाए।
आपदा की इस घड़ी में केवल तस्वीरें खिंचवाकर संवेदनशीलता का दिखावा करना आसान है, मगर असली संवेदनशीलता उन परिवारों को राहत पहुँचाने में है, जिनका सब कुछ इस जलप्रलय में बह गया है। जनता उम्मीद करती है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी को समझें और रुद्रपुर के पीड़ित परिवारों को नया जीवन देने के लिए ठोस कदम उठाएँ।
उत्तराखंड की पहचान देवभूमि और प्राकृतिक सौंदर्य के रूप में होती रही है, लेकिन पिछले दो दशकों में यह राज्य बार-बार भीषण आपदाओं की मार झेल रहा है। 2013 की केदारनाथ आपदा से लेकर हाल ही में रुद्रपुर की कल्याणी नदी के उफान तक, चमोली में ग्लेशियर फटने, जोशीमठ में धँसाव, टिहरी–उत्तरकाशी में बादल फटने, पौड़ी–चंपावत–पिथौरागढ़ में भूस्खलन और बागेश्वर–अल्मोड़ा में आई बाढ़ तक—हर बार आम जनता की पीड़ा ही सामने आई है।
दुःख की बात यह है कि जब पहाड़ का आम नागरिक घर, खेत, जान-माल और बच्चों की पढ़ाई तक खो बैठता है, तब हमारे जनप्रतिनिधि इन त्रासदियों को भी राजनीतिक अवसर में बदलने से नहीं चूकते। किसी आपदा स्थल पर हेलीकॉप्टर से उतरकर फोटो खिंचवाना, कैमरों के सामने रेनकोट पहनकर संवेदना जताना और सोशल मीडिया पर ‘आपदा सेवा’ का दिखावा करना आज राजनीति का नया चेहरा बन चुका है।
चमोली आपदा में भी यही हुआ था—राहत और पुनर्वास से ज्यादा चर्चा नेताओं के दौरों और बयानों की रही। रुद्रपुर की बाढ़ हो या कुमाऊँ–गढ़वाल के पहाड़ी गाँवों की तबाही, जनता को राहत शिविरों में लाइन लगानी पड़ती है, जबकि नेता कैमरे के सामने मदद बाँटकर वाहवाही लूटते हैं।
सच यह है कि आपदा केवल राहत बाँटने का अवसर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीतियों और स्थायी समाधान का सवाल है। उत्तराखंड की नाजुक भौगोलिक स्थिति को देखते हुए आपदा प्रबंधन को राजनीति का मंच नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकता बनाना होगा।
जनता नेताओं से फोटो नहीं, बल्कि ठोस राहत, पुनर्वास और सुरक्षा की अपेक्षा करती है। अब वक्त आ गया है कि देवभूमि में आपदाओं को राजनीतिक अवसर नहीं, बल्कि जनसेवा का धर्म समझा जाए।




