संपादकीय | सोशल मीडिया, सस्ती लोकप्रियता और अंकिता को न्याय की पुकार

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“सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं”—यह पंक्ति आज के शोरगुल भरे सोशल मीडिया युग में और अधिक प्रासंगिक हो उठती है। आदर्श जीवन की पहचान टीआरपी या ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन, सादगी, कार्यशैली और संस्कारों से होती है। इसी संदर्भ में जब राष्ट्रीय स्तर के नेता दुष्यंत कुमार गौतम के विरुद्ध बिना ठोस तथ्यों के आरोपों को सोशल मीडिया पर उछाला गया, तो यह बहस व्यक्ति विशेष से आगे बढ़कर सार्वजनिक मर्यादा और जिम्मेदारी पर आकर ठहर गई।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


रुद्रपुर के विधायक शिव अरोड़ा द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई एक पोस्ट—जिसमें दुष्यंत कुमार गौतम का फोटो भी शामिल था—तेजी से वायरल हुई। इसके बाद यूजरों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। कई टिप्पणियों में विधायक से संयम बरतने, छवि की मर्यादा रखने और आरोपों के स्थान पर निष्पक्ष जांच की मांग की गई। कुछ यूजरों ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई पाक-साफ है, तो उच्च स्तरीय सीबीआई जांच से सच्चाई सामने आनी चाहिए—ताकि उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय मिले और संदेह का बादल छंटे।
यहां प्रश्न किसी व्यक्ति के सम्मान का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता का है। अंकिता भंडारी प्रकरण बीते वर्षों से जनभावनाओं का केंद्र रहा है। जनता आज भी न्याय की प्रतीक्षा में है। ऐसे संवेदनशील मामले में तथ्यहीन आरोप, संकेतों और सोशल मीडिया ट्रायल से न तो न्याय तेज होता है, न ही विश्वास बढ़ता है। उलटे, यह सस्ती लोकप्रियता की दौड़ को हवा देता है।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, पर उसका दुरुपयोग नहीं। सार्वजनिक पद पर बैठे जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा होती है कि वे राज्यहित, कानूनसम्मत प्रक्रिया और पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में ठोस पहल करें—न कि वायरल पोस्टों से भ्रम फैलाएं। सोशल मीडिया टीआरपी और टेलीविजन टीआरपी अलग-अलग हैं; पर जिम्मेदारी दोनों में समान होनी चाहिए।
अंततः, यदि आरोप हैं तो निष्पक्ष जांच हो; यदि सत्य है तो सामने आए; और यदि असत्य है तो कानून के माध्यम से उसका खंडन हो। यही देवभूमि की परंपरा है—जहां कठोर परिश्रम, सादगी और सत्य को कृपा का पात्र माना जाता है। जनता का संदेश स्पष्ट है: शोर नहीं, न्याय चाहिए; लोकप्रियता नहीं, पारदर्शिता चाहिए; और सबसे बढ़कर—अंकिता को न्याय चाहिए।

अवतार सिंह बिष्ट,अस्मिता के कटघरे में सत्ता
अंकिता भंडारी प्रकरण किसी व्यक्ति के सम्मान का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, न्याय और नैतिकता का प्रश्न है। सत्ता की चुप्पी और आधे-अधूरे सच राज्य की आत्मा को आहत करते हैं। जब तक निष्पक्ष जांच और पूर्ण न्याय नहीं होगा, जनआक्रोश थमेगा नहीं।

,आरोप-प्रत्यारोप से गर्माया उत्तराखंड,अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर प्रदेश की राजनीति में उबाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। कांग्रेस जहां सरकार पर जवाबदेही तय करने के लिए हमलावर है, वहीं भाजपा ने भी पलटवार करते हुए इसे अनुसूचित जाति और मातृशक्ति के अपमान से जोड़ दिया है। दोनों दलों के बीच बयानबाज़ी अब सड़क से लेकर सियासी मंचों तक पहुंच गई है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने शुक्रवार को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मीडिया से बातचीत करते हुए इंटरनेट मीडिया पर वायरल एक महिला नेत्री के वीडियो का उल्लेख किया और कहा कि सच सामने लाने के लिए वह महिला धन्यवाद की पात्र है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का किसी पूर्व विधायक की पत्नी से कोई संबंध नहीं है। कांग्रेस की प्राथमिकता केवल अंकिता को न्याय दिलाना है।
गोदियाल ने भाजपा द्वारा अनुसूचित जाति अपमान के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अपराध की कोई जाति नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति पर आरोप हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वीडियो में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं, जिनकी जांच से किसी को नहीं बचना चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पूरे प्रकरण को उत्तराखंड के स्वाभिमान से जोड़ते हुए कहा कि यदि कांग्रेस ने भाजपाई षड्यंत्र का भंडाफोड़ किया, तो वर्ष 2027 में सत्ता की राह स्वतः सुगम होगी। उन्होंने घोषणा की कि 16 जनवरी तक वह अपनी समस्त गतिविधियां प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा तय कार्यक्रमों को समर्पित करेंगे।
वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सदस्य महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर अनुसूचित जाति समाज और मातृशक्ति के अपमान का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास यदि कोई साक्ष्य है तो वह न्यायालय में प्रस्तुत करे। महिला को राजनीतिक हथियार बनाकर समाज को भड़काया जा रहा है, जिससे अनुसूचित जाति समाज में रोष है। इसके विरोध में भाजपा ने प्रदेशभर में कांग्रेस के पुतले फूंकने की घोषणा की है।
लेकिन असली सवाल अब भी कायम है…
अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए कांग्रेस या भाजपा के पुतलों की नहीं, निष्पक्ष सीबीआई जांच की जरूरत है।
यदि सरकार की नीयत साफ है तो जांच से डर क्यों?
रिमोट कंट्रोल से चलने वाली धामी सरकार को बयानबाज़ी छोड़कर सीबीआई जांच के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि सच सामने आए और उत्तराखंड की बेटी को न्याय मिल सके।


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