

नैनीताल कोटाबाग,जब समाज अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए बच्चों को शिक्षकों के हाथ सौंपता है, तो विश्वास और मर्यादा की सबसे पवित्र परिभाषा जन्म लेती है। शिक्षक — जिसे समाज आदर्श, प्रेरणा और नैतिकता की प्रतिमूर्ति मानता है — वही यदि अपराध, ब्लैकमेल, चरित्रहनन और डिजिटल हिंसा का अपराधी बन जाए तो यह केवल एक महिला के सम्मान पर हमला नहीं बल्कि पूरे समाज के नैतिक ढांचे की हत्या है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
नैनीताल जिले के राजकीय जूनियर हाईस्कूल दोहनिया, कोटाबाग के शिक्षक कमल गिनती पर एक महिला द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि Uttarakhand के शिक्षा और प्रशासनिक तंत्र की विफलता पर बड़ा तमाचा हैं।
महिला ने राज्य महिला आयोग, नैनीताल पुलिस, साइबर क्राइम थाना, शिक्षा विभाग — सभी जगह शिकायत दर्ज कराई है।
धारा 66C आईटी एक्ट, BNS 308(2), 319(2) और 352 के तहत Zero FIR संख्या 061 साइबर पुलिस स्टेशन रुद्रपुर में दर्ज हो चुकी है।
फिर भी आरोपी खुलेआम घूम रहा है।
क्या यह कानून का मज़ाक नहीं?
क्या FIR होना अब गिरफ्तारी का आधार नहीं रह गया?
आरोप इतने गंभीर हैं कि समाज सिर्फ पढ़कर सिहर जाए!शिकायत के अनुसार शिक्षक कमल गिनती ने,
महिला के नाम से फर्जी फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाए!
महिला की तस्वीरों और निजी वीडियोज़ का दुरुपयोग किया!
अकाउंट से गंदे कमेंट लिखकर चरित्र हनन किया!
महिला और उसके परिचितों से पैसे वसूले — कम से कम ₹2000 की ठगी प्रमाणित!
अकाउंट हटाने के एवज में ₹27,000 की मांग की और ब्लैकमेल किया”
महिला द्वारा विरोध पर गालियां व जान से मारने की धमकी दी?इससे ज्यादा घिनौना और क्या हो सकता है?
और सबसे शर्मनाक बात — आरोपी शिक्षा विभाग में शिक्षक है!
शिक्षा विभाग पहले ही फर्जी नियुक्तियों, कुशासन और सिफारिशों के लिए चर्चा में रहा है।
अब महिलाओं की सुरक्षा भी शिक्षकों के हाथों खतरे में है?
क्या यह वही “शिक्षक समाज का निर्माता है” वाली परंपरा है?
या अब शिक्षक की परिभाषा ऐसी बदल रही है कि कक्षा में आदर्श, और सोशल मीडिया पर शिकारी?
FIR भी दर्ज — साक्ष्य भी मौजूद — महिला आयोग भी सक्रिय — फिर भी कार्रवाई नहीं,
जब तक सिस्टम अपराधियों को संरक्षण देता रहेगा, डर महिलाओं में नहीं, अपराधियों में कम होना चाहिए।

प्रश्न उठना जरूरी है — FIR दर्ज होने के बाद 24 घंटे के भीतर गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
Zero FIR दर्ज होने के बाद आरोपी को बचाने की कोशिश क्यों?
क्या शिक्षा विभाग आरोपी को सस्पेंड करने से डर रहा है?
क्या महिला की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है?
क्या यह तब तक इंतजार है, जब तक कोई अनहोनी न हो जाए?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विज़न पर भी सवाल?मुख्यमंत्री धामी ने बार-बार कहा है कि “अपराध मुक्त उत्तराखंड” और महिलाओं की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
तो फिर इस केस में प्रशासन क्यों ढुलमुल रवैया अपनाए हुए है?
यह मामला हल्द्वानी का नहीं, पूरे उत्तराखंड की प्रतिष्ठा का मामला है।
अगर FIR और महिला आयोग की शिकायत के बावजूद आरोपी गिरफ्तारी से बचता है तो अपराधियों के लिए यह खुली छूट है —
कि शिक्षक होना लाइसेंस है — सम्मान लूटने का, ब्लैकमेल करने का, धमकियां देने का।
इस मामले में क्या होना चाहिए — कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई?
आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी — डिजिटल अपराध में जमानत नहीं.
निलंबन और विभागीय जाँच — लंबी फाइलिंग नहीं, त्वरित कार्रवाई!
महिला को सुरक्षा — पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी!
साइबर फॉरेंसिक जांच — सारे डिवाइस जब्त किए जाएँ!
ब्लैकमेलिंग से वसूली गई धनराशि की रिकवरी?यदि यह नहीं होता, तो एक संदेश जाएगा कि —
उत्तराखंड में शिक्षा विभाग के दफ्तरों और स्कूलों में महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं।”
समाज को भ्रम में न रहना चाहिए?यह सिर्फ एक महिला का मामला नहीं
यह डिजिटल हिंसा और शिक्षक के वेश में छिपे अपराधी मानसिकता वाले लोगों की पहचान है।आज यह एक महिला थी,कल को — कोई भी बेटी, बहन, छात्रा, सहकर्मी हो सकती है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की चेतावनी,हम स्पष्ट कहना चाहते हैं —> यदि ऐसे आरोपी गिरफ्तार नहीं होते, शिक्षा विभाग सख्त नहीं होता, और पुलिस समय पर कार्रवाई नहीं करती — तो यह न्यायिक भ्रष्टाचार के बराबर है।
यह भी संज्ञान लिया जाए कि इस मामले में देर होगी तो आरोपी के हौसले बुलंद हो सकते हैं और किसी अनहोनी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
सरकार के लिए अंतिम संदेश?माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी,
आपके “सुरक्षित उत्तराखंड और अपराध मुक्त राज्य” के सपने को सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं — प्रणाली के भीतर बैठे ऐसे दरिंदों से है।
कानून दिखना भी चाहिए — और महसूस भी होना चाहिए।
यदि शिक्षक का नाम दागी होता है तो पूरे शिक्षक समाज की गरिमा को ठेस लगती है।
इस मामले में उदाहरणात्मक कार्रवाई ही उत्तराखंड की बेटियों का विश्वास बचाएगी।
इस अपराध को दफ्तरों की धूल में मत दबाइए।
उत्तराखंड जाग रहा है — और देख भी रहा है।

कोटाबाग का मामला” सिर्फ एक F.I.R नहीं —
यह चेतावनी है कि यदि सिस्टम दोषियों को बचाता रहा तो समाज अपराधियों से नहीं, सरकारों से डरने लगेगा।

अब समय है — अपराधी को सलाखों के पीछे भेजने का,
शिक्षा विभाग को जवाबदेह बनाने का”
महिला सुरक्षा को सिद्ध करने का, न कि सिर्फ घोषणाओं में लिखने का ,क्योंकि सम्मान खोने के बाद न्याय से कम कुछ स्वीकार नहीं किया जाएगा।




