संपादकीय | यमुनोत्री से उठी मूल निवास 1950 की आवाज़, सरकार की नीयत की होगी असली परीक्षा

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उत्तराखंड की राजनीति में मूल निवास और भू-कानून का प्रश्न केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि राज्य निर्माण की आत्मा से जुड़ा मुद्दा है। विधानसभा यमुनोत्री क्षेत्र में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में भ्रमण कर रहे माननीय राज्य मंत्री गीता राम गोड के समक्ष चमियारी न्याय पंचायत शिविर में जो स्वर गूंजा, वह साफ संदेश देता है कि जनता अब आधे-अधूरे आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है।
मूल निवास भू-कानून समिति द्वारा मूल निवास 1950 लागू करने की मांग को लेकर दिया गया ज्ञापन केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व की पुकार है। समिति अध्यक्ष विजेंद्र जगूड़ी, उपाध्यक्ष व जिला पंचायत सदस्य शिवराज बिष्ट, विभिन्न ग्राम प्रधानों, राज्य आंदोलनकारियों और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि यह मांग किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि सामूहिक जनचेतना की अभिव्यक्ति है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)


संपादकीय दृष्टि से यह सवाल अहम है कि सरकार जन-जन तक पहुंचने के इन शिविरों को केवल ‘सुनवाई कार्यक्रम’ बनाकर छोड़ देगी या फिर जनता की पीड़ा को नीति और कानून में बदलेगी। मूल निवास 1950 की मांग सीधे तौर पर रोजगार, जमीन, संसाधन और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़ी है। यदि सरकार सचमुच उत्तराखंड को न्याय देना चाहती है, तो उसे इस मुद्दे पर स्पष्ट और निर्णायक कदम उठाने होंगे।
यमुनोत्री से उठी यह आवाज़ बताती है कि राज्य आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ है, वह केवल नए रूप में फिर जाग उठा है। अब जिम्मेदारी सरकार की है—या तो वह इस चेतना को सम्मान दे, या फिर इतिहास उसे जनता की अनदेखी करने वाली सरकार के रूप में याद रखेगा।


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