संपादकीय | जब कैम्पस और समाज दोनों चुप रहे

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उत्तराखंड में एक ही दिन चार लोगों द्वारा आत्मघाती कदम उठाना केवल एक खबर नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। पंतनगर विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में दो बीटेक छात्रों का इस हद तक टूट जाना, और हरिद्वार में दो अन्य मामलों का सामने आना, यह बताता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, पारिवारिक संरचना और सामाजिक संवाद — तीनों में कहीं न कहीं बड़ी खामियाँ हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

अक्षत सैनी की डायरी के पन्ने समाज के लिए आईना हैं। खुद से सवाल-जवाब करता एक संवेदनशील युवा, जो भीतर ही भीतर घुटता रहा और किसी से खुलकर बात नहीं कर पाया। यह मात्र एक छात्र की त्रासदी नहीं, बल्कि उस मानसिक दबाव की कहानी है जो आज का युवा हर दिन चुपचाप झेल रहा है—असफलता का भय, अपेक्षाओं का बोझ, प्रतियोगिता की घुटन और “लोग क्या कहेंगे” की बेड़ियाँ।

विवेक आर्य का गंभीर हालत में बचाया जाना सिस्टम के लिए आख़िरी चेतावनी भी हो सकता है—यदि अब भी हमने समय रहते युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लिया, तो ऐसी खबरें संख्या में बढ़ती ही जाएँगी।

आज विश्वविद्यालयों में काउंसलिंग सेंटर सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं। छात्रावासों में रहने वाले हजारों छात्र भावनात्मक रूप से अकेले हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया ने संवाद के रास्ते तो दिए, लेकिन संवेदनशील संवाद छीन लिया। परिवार भी कई बार केवल परिणाम पूछते हैं, हालात नहीं।

अब समय आ गया है कि आत्महत्या को केवल “व्यक्तिगत कमजोरी” कहकर टालना बंद किया जाए। यह सामाजिक असफलता भी है। हर शिक्षण संस्थान में सक्रिय मानसिक स्वास्थ्य निगरानी, प्रशिक्षित काउंसलर, नियमित संवाद और भरोसे का वातावरण अनिवार्य होना चाहिए।

सबसे जरूरी बात—हम सबको यह समझना होगा कि हार से बड़ा जीवन है, और मदद माँगना कमजोरी नहीं, साहस है।
यदि एक अक्षत की डायरी हमें झकझोर नहीं पाई, तो अगला नाम शायद और भी निकट होगा।


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