

रुद्रपुर की शिक्षिका सुषमा पंत की असमय और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवेदनहीनता का गंभीर दस्तावेज है। यह घटना हमें झकझोरती है — और सबसे पहले कटाक्ष करती है उस तथाकथित “राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन” पर, जो रुद्रपुर में बड़े उत्साह से7,8 9 नवंबर को आयोजित किया जा रहा है।
जहां लगभग 300 शिक्षित लोग — डॉक्टर, प्रिंसिपल, प्रोफेसर, बैंक अधिकारी, पूर्व कमांडेंट — एकत्र होंगे “कुमाऊनी भाषा बचाने” के नाम पर। पर क्या विडंबना नहीं कि इसी शहर में कुमाऊनी बोलने वाली शिक्षिका सुषमा पंत संदिग्ध परिस्थितियों में जलकर मर गईं और इन भाषा के ठेकेदारों में से एक भी व्यक्ति न उनके अंतिम संस्कार में गया, न शोक संदेश लिखा, न संवेदना जताई?
भाषा तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक उसमें बोलने वाले लोग संवेदना से भरे न हों। जब कुमाऊनी बोलने वाली की चिता पर कुमाऊनी समाज मौन रहे, तो सम्मेलन का औचित्य केवल दिखावा रह जाता है।

दूसरा प्रश्न शिक्षक संघ से — जहां सुषमा पंत सक्रिय सदस्य थीं। उनके पिता जनता इंटर कॉलेज रुद्रपुर के सम्मानित प्रिंसिपल रहे, जिन्होंने हजारों छात्रों को शिक्षा दी। लेकिन जिस संघ के लिए वह दिन-रात समर्पित रहीं, उसी संघ से उनके अंतिम संस्कार में कोई नहीं पहुंचा। शिक्षकों का संगठन तब बेमानी हो जाता है जब वह अपने ही साथी की अंतिम यात्रा में अनुपस्थित रहे। श्रद्धांजलि सभा और भोज का आयोजन बाद में औपचारिकता है, संवेदना नहीं।
तीसरा आघात पार्वतीय समाज पर — रुद्रपुर में इस समाज के तीन से चार संस्थाएं सक्रिय हैं, जो मंचों और आयोजनों में “सामाजिक एकता” के नारे लगाते हैं। पर जब पार्वतीय समाज की ही एक बेटी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुई, तो कोई संस्था, कोई प्रतिनिधि अंतिम संस्कार तक नहीं पहुंचा। यह वही समाज है जो देवी-देवताओं की आरती में तो भावुक हो जाता है, पर अपने ही समुदाय की बेटी की चिता के सामने पत्थर बन जाता है।
और अब श्रद्धांजलि —
सुषमा पंत, एक सरल, सुसंस्कृत और आत्मनिर्भर शिक्षिका, जिनकी पहचान केवल उनकी नौकरी नहीं, बल्कि उनकी विनम्रता, कुमाऊनी संस्कृति और शिक्षा के प्रति समर्पण थी। वह अपनी 80 वर्षीय माता की एकमात्र संबल थीं। अपने विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श और सहयोगियों के लिए प्रेरणा। पर आज वह नहीं हैं — केवल इसलिए नहीं कि कोई अपराध हुआ, बल्कि इसलिए भी क्योंकि समाज सो गया।
आज हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स और रुद्रपुर की जनता उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
हम यह प्रण लेते हैं कि सुषमा पंत जैसी बेटियों की स्मृति हमें बार-बार याद दिलाएगी —
भाषा का सम्मान, संगठन की एकता और समाज की संवेदना तभी सार्थक हैं जब हम अपने ही लोगों की पीड़ा में साथ खड़े हों।
रुद्रपुर, उधम सिंह नगर — यह केवल एक शिक्षिका की मृत्यु नहीं थी, यह एक समाज की आत्मा के जलने की कहानी थी। प्राथमिक विद्यालय की सरकारी शिक्षिका सुषमा पंत, जो कौशल्या एन्क्लेव फेज–2 में रहती थीं, संदिग्ध परिस्थितियों में अपने ही केयरटेकर के साथ रह रही थीं। वह वहीं अपने घर में जलकर मृत्यु को प्राप्त हो गईं। जब आग की लपटें बुझीं तो समाज की संवेदनाओं की चिंगारियां भी ठंडी हो चुकी थीं।
कॉलोनीवासियों ने जब पुलिस को सूचना दी, तो मौके पर पहुंची टीम ने दरवाज़े के भीतर एक शिक्षिका का जला हुआ शरीर पाया। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि वह अपने केयरटेकर अजय कुमार मिश्रा के साथ रहती थीं, जो अब इसी प्रकरण में गिरफ्तार है और धारा 108 आईपीसी (संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु, आत्महत्या या हत्या से संबंधित जांच) के तहत मामला दर्ज किया गया है। शव का पोस्टमार्टम हुआ, पुलिस ने कार्रवाई की, और फिर सब खत्म — जैसे समाज ने राहत की सांस ली कि “अब यह खबर खत्म हो जाए।”
पर क्या सुषमा पंत की कहानी इतनी भर थी?
कुमाऊं की बेटी, कुमाऊं की भाषा, और कुमाऊं का मौन?सुषमा पंत मूल रूप से रुद्रपुर अल्मोड़ा, कुमाऊं क्षेत्र की निवासी थीं — एक पहाड़ी बेटी, जो कुमाऊनी भाषा बोलने में गर्व महसूस करती थीं। वह अपने हर मिलने-जुलने वाले से कुमाऊनी में बात करती थीं, अपनी संस्कृति और बोली के प्रति सहज भाव रखती थीं। लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई, तो रुद्रपुर का कुमाऊं समाज — वही समाज जो आजकल “राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन” की तैयारियों में व्यस्त है — मौन रहा।
एक तरफ रुद्रपुर में7,8 ,9 नवंबर को होने वाले राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन में लगभग 300 लोग जुटने वाले हैं — डॉक्टर, प्रिंसिपल, टीचर, बैंक अधिकारी, बीएसएफ के रिटायर्ड कमांडेंट — सभी “उच्च शिक्षित” और “संवेदनशील” माने जाने वाले लोग। वहीं, उसी शहर में जब एक कुमाऊनी शिक्षिका सुषमा पंत संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु को प्राप्त हुईं, तो इनमें से एक भी व्यक्ति न तो उसके अंतिम संस्कार में गया, न किसी ने श्रद्धांजलि दी, न किसी ने सोशल मीडिया पर दो शब्द संवेदना के लिखे।
और जब हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने इस खबर को “राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा ग्रुप” में साझा किया — तो उसे डिलीट कर दिया गया।
नीचे एक ठंडा-सा नोटिस डाला गया —यह ग्रुप केवल कुमाऊनी भाषा सम्मेलन के लिए है, कृपया समाचार पोस्ट न करें।”
कितना आसान है, संवेदना से बचना!जब भाषा का उत्सव, संवेदना का अंत हो जाए
?यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है कि जो लोग “कुमाऊनी भाषा” के संरक्षण की बात करते हैं, वही लोग कुमाऊनी बोलने वाली एक बेटी की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सके?
भाषा केवल शब्द नहीं होती — वह संवेदना, संस्कृति और सहअस्तित्व की आत्मा होती है।
जब भाषा बोलने वाला ही सुरक्षित न रहे, जब उसके जीवन और मृत्यु दोनों पर समाज मौन रहे, तो फिर उस भाषा के सम्मेलन का क्या अर्थ रह जाता है?
कुमाऊनी भाषा सम्मेलन के आयोजकों से यह प्रश्न पूरा समाज पूछ रहा है —> जब कुमाऊनी लोग ही एक कुमाऊनी महिला की अंतिम यात्रा में नहीं पहुंचे, तो “कुमाऊनी भाषा सम्मेलन” का औचित्य क्या है?
शिक्षक संघ की चुप्पी — एक और नैतिक पतन
सुषमा पंत केवल एक शिक्षिका नहीं थीं — वह शिक्षक संघ की सक्रिय सदस्य भी थीं।
उनके पिता, जनता इंटर कॉलेज रुद्रपुर के पूर्व प्रिंसिपल, शहर के शिक्षित समाज का एक सम्मानित नाम थे। हजारों छात्र, जो कभी उनके शिष्य रहे, आज विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं।
फिर भी, जब बेटी की अंतिम यात्रा निकली, तो ना शिक्षक संघ के लोग पहुंचे, ना उनके सहकर्मी।
जो लोग रोज़ “शिक्षक एकता” की बातें करते हैं, वही लोग अपने साथी के अंतिम संस्कार में शामिल न होकर उस एकता की परिभाषा को खुद जला बैठे।हालांकि बाद में शिक्षक संघ ने कुछ औपचारिक जिम्मेदारी निभाई — बीआरसी में श्रद्धांजलि सभा का प्रस्ताव और भोज आयोजन की घोषणा की।
पर क्या यह पश्चाताप था या दिखावा?
यह प्रश्न भी उठता है।
पार्वतीय समाज का विभाजन — संवेदना की कब्र पर संगठन?सुषमा पंत पार्वतीय समाज से थीं — रुद्रपुर में पार्वतीय समाज के कई संगठन सक्रिय हैं, तीन से चार संगठन अलग-अलग बैनरों में “सामाजिक कार्यों” में लगे हैं। पर जब पार्वतीय समाज की ही एक शिक्षिका की असामयिक मृत्यु हुई, तो कोई कोई संस्था, कोई प्रतिनिधि अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचा।
यह विडंबना नहीं, यह संवेदना का दिवालियापन है।
कोरोना काल में जब लोग शवों को छूने से डर रहे थे, तब यह भय समझ में आता था।
लेकिन अब?
अब तो यह डर नहीं, यह बेहिसी की महामारी है।
रुद्रपुर की सांस्कृतिक चेतना — एक गहरी नींद में?रुद्रपुर, जो कभी शिक्षा, समाजसेवा और भाईचारे के लिए जाना जाता था, आज संवेदनहीनता के नए अध्याय लिख रहा है।
सुषमा पंत जैसी महिलाएं, जो न किसी मंच की शोरगुल में रहीं, न राजनीति में, बस शिक्षा के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाना चाहती थीं — आज उनकी चिता की राख से भी कोई सबक लेने को तैयार नहीं।
पार्वतीय कुमाऊंनी समाज, जो अपने पर्व, अपनी भाषा और अपने खान-पान पर गर्व करता है, अब संवेदना से निर्वासित समाज बन चुका है।
जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि भाषा का सम्मान उसके बोलने वाले के सम्मान से शुरू होता है, तब तक “कुमाऊनी भाषा सम्मेलन” केवल एक मंच, एक फोटो सेशन और एक प्रोटोकॉल का आयोजन बनकर रह जाएगा।
धारा 108 के तहत — एक कानूनी नहीं, सामाजिक मामला भी,
सुषमा पंत प्रकरण में पुलिस ने धारा 108 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया है, जो संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु से संबंधित है। यह प्रावधान आत्महत्या, हत्या या असामान्य मृत्यु की परिस्थितियों में जांच सुनिश्चित करता है।
लेकिन यह केवल कानूनी पहलू नहीं, यह सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है —> क्या हम अपनी बेटियों, अपनी बहनों, अपने साथ काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं?
जब समाज लावारिस बन जाए…सबसे दुखद पहलू यह था कि सुषमा पंत का अंतिम संस्कार लगभग लावारिस की तरह हुआ।
कॉलोनी के कुछ लोगों ने साथ दिया, पुलिस ने प्रक्रिया निभाई —
पर कुमाऊं के लोग, पार्वती समाज, शिक्षक संघ, भाषा सम्मेलन के आयोजक — कोई नहीं आया।
यह दृश्य रुद्रपुर की आत्मा के लिए शर्म की बात है।
कुमाऊंनी बोलने वाली एक बेटी, जो अपने माता- स्वर्गीय पिता की संतान थी, जो 80 वर्षीय मां की उम्मीद थी,
जिसके पिता ने इस शहर के हजारों बच्चों को शिक्षा दी —
वह अकेली जल गई।
और समाज ने अपनी नज़रों के सामने से एक और आत्मा को खो दिया, बिना एक आँसू के।
भाषा बचाने से पहले, इंसान बचाइए?राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन के आयोजकों, और समाज के हर उस व्यक्ति के नाम यह कटाक्ष —
भाषा के सम्मान का अर्थ मंच पर भाषण देना नहीं होता,
बल्कि तब होता है जब आप अपने ही समुदाय की पीड़ा में साथ खड़े हों।
यदि कुमाऊनी लोग एक कुमाऊनी महिला के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सकते,
तो कुमाऊनी भाषा का सम्मेलन एक खोखला उत्सव है।
जब तक संवेदना जीवित नहीं, तब तक कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती।
समापन: सुषमा पंत का मौन प्रश्न?सुषमा पंत अब नहीं हैं।
पर उनका मौन सवाल हम सबके दिलों में गूंजना चाहिए —
क्या मेरी मृत्यु केवल पुलिस केस थी, या समाज की आत्मा की मृत्यु भी?”
यदि रुद्रपुर के कुमाऊंनी लोग, शिक्षक संघ, और भाषा सम्मेलन के सदस्य इस सवाल का जवाब नहीं खोज सके,
तो आने वाली पीढ़ियां हमें यही कहेंगी —
“जब सुषमा पंत अकेली जल रही थीं, तब पूरा समाज राख में बदल रहा था।”
✍️ लेखक:
अवतार सिंह बिष्ट, वरिष्ठ संपादक
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स / रुद्रपुर (उधम सिंह नगर) उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी




