

उत्तराखंड में आगामी विशेष समरी रिवीजन (SIR) से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू किया जा रहा प्री-एसआईआर अभियान तकनीकी रूप से जितना जरूरी है, व्यावहारिक रूप से उतना ही कठिन भी साबित होने जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है—राज्य से लगातार हो रहा पलायन और तेजी से बदलती जनसंख्या संरचना। पहाड़ों के सैकड़ों गांव पहले ही “घोस्ट विलेज” बन चुके हैं, जहां ताले लगे घर हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में अब भी नाम दर्ज हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
प्री-एसआईआर के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को हर मतदाता से व्यक्तिगत संपर्क कर उसकी मौजूदगी और दस्तावेजों का सत्यापन करना होगा। कागजों में यह प्रक्रिया सरल है, लेकिन जमीनी सच्चाई बिल्कुल उलट है। जिन गांवों में आधे से ज्यादा घर खाली हैं, वहां घर-घर जाकर सत्यापन करना किसी चुनौतीपूर्ण अभियान से कम नहीं। कई स्थानों पर तो पूरे के पूरे गांव सिर्फ बुजुर्गों के भरोसे चल रहे हैं, जबकि युवा रोजी-रोटी के लिए मैदानों और महानगरों में बस चुके हैं।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम द्वारा यह संकेत दिया जाना कि यूपी और दिल्ली में SIR पहले से चल रहा है और ये दोनों राज्य उत्तराखंड से पलायन के प्रमुख केंद्र हैं, इस चुनौती को और गहरा कर देता है। यदि वहां की फाइनल वोटर लिस्ट पहले आ जाती है, तो डुप्लीकेसी, नाम कटने और ट्रांसफर के मामलों में उत्तराखंड में सत्यापन और ज्यादा उलझ सकता है।
इसके साथ ही एक और सामाजिक पहलू भी सामने है—विदेश से आने वाली बहुएं, अंतर्राज्यीय विवाह और अस्थायी मजदूरी करने वाले परिवार। इन सभी की वोटर स्थिति तय करना BLO के लिए एक प्रशासनिक पहेली बनती जा रही है। सवाल यह भी है कि क्या सीमित संसाधनों और कम स्टाफ के साथ यह व्यापक और संवेदनशील काम समयबद्ध ढंग से पूरा हो पाएगा?
प्री-एसआईआर केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह उत्तराखंड की जनसांख्यिकीय सच्चाई का आईना भी है। अगर पलायन यूं ही जारी रहा तो भविष्य में न सिर्फ मतदान प्रतिशत गिरेगा, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भी पूरी तरह असंतुलित हो जाएगा। ऐसे में जरूरी है कि निर्वाचन आयोग के साथ-साथ राज्य सरकार भी पलायन जैसे मूल मुद्दे पर गंभीरता से काम करे, वरना हर SIR के साथ यह “सिरदर्द” और बढ़ता ही जाएगा।




