चार साल बेमिसाल या चार साल बेमिसाल सवाल?” — विकास के दावों के बीच उठते जनसरोकार

Spread the love


रुद्रपुर,देहरादून के परेड ग्राउंड में आयोजित भव्य कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जहां अपनी सरकार की उपलब्धियों का लंबा-चौड़ा ब्योरा पेश किया, वहीं मदरसों, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख भी दिखाया। लेकिन इन दावों के समानांतर जमीनी हकीकत से उठती आवाजें सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल भी खड़े कर रही हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


विकास के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
401 करोड़ की 74 परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास—यह आंकड़ा सुनने में प्रभावशाली लगता है। जीएसडीपी वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय में इजाफा, और हजारों उद्योगों की स्थापना—ये सब विकास के चमकदार आंकड़े हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आंकड़ों का वास्तविक लाभ उत्तराखंड के मूल निवासियों तक पहुंच रहा है?
रुद्रपुर, काशीपुर और हल्द्वानी जैसे क्षेत्रों में लगातार यह शिकायत सामने आ रही है कि सरकारी नौकरियों में बाहरी राज्यों के लोगों को प्राथमिकता मिल रही है। स्वास्थ्य विभाग, उद्यान विभाग, पोस्ट ऑफिस और संविदा भर्तियों में स्थानीय युवाओं की अनदेखी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
क्या “30 हजार नौकरियां” वास्तव में उत्तराखंड के युवाओं के हिस्से आईं, या यह आंकड़ा सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ा रहा है?
बुलडोजर की राजनीति या न्याय का संतुलन?
सरकार की “अतिक्रमण हटाओ” कार्रवाई को कानून का पालन बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह कई परिवारों के लिए त्रासदी बन चुकी है।
रुद्रपुर रोडवेज और प्रस्तावित आईएसबीटी परियोजना इसका ताजा उदाहरण है, जहां 40-50 वर्षों से बसे लोगों के आशियाने उजाड़ दिए गए।
सवाल उठता है—
क्या विकास का मतलब सिर्फ कंक्रीट के ढांचे खड़े करना है?
या फिर उन लोगों के जीवन और सपनों को भी बचाना है, जो दशकों से इस जमीन से जुड़े हैं?
अगर मजार या धार्मिक स्थलों के नाम पर कार्रवाई होती है, तो समान रूप से हर अतिक्रमण पर सख्ती क्यों नहीं?
“छोटी मछली और बड़ा मगरमच्छ”—मुख्यमंत्री का यह बयान तब तक अधूरा लगता है, जब तक बड़े रसूखदारों पर भी समान कार्रवाई नजर न आए।
‘लखपति दीदी’ और पलायन—सच कितना, प्रचार कितना?
2.65 लाख “लखपति दीदी” और 44% रिवर्स पलायन—ये आंकड़े सुनने में प्रेरणादायक हैं।
लेकिन पहाड़ों के खाली होते गांव, बंद होते स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आज भी कड़वी सच्चाई हैं।
अगर वास्तव में पलायन रुका होता, तो
क्यों आज भी युवा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली और अन्य महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं?
स्मार्ट सिटी या स्मार्ट विस्थापन?
“स्मार्ट सिटी” परियोजनाओं के नाम पर कई जगहों पर पुराने बाजार, बस्तियां और छोटे व्यापारियों को हटाया गया है।
रुद्रपुर में आईएसबीटी के नाम पर मॉल निर्माण की चर्चा हो या देहरादून में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई—इन सबने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास आखिर किसके लिए हो रहा है?
क्या यह विकास आम जनता के लिए है, या फिर चुनिंदा कॉरपोरेट और बिल्डरों के लिए?
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस—लेकिन सवाल बाकी
सरकार ने 100 से अधिक नकल माफियाओं को जेल भेजने और भ्रष्टाचार पर सख्ती का दावा किया है।
लेकिन भर्ती घोटाले, जमीन घोटाले और विभागीय अनियमितताओं के आरोप अब भी सामने आ रहे हैं।
अगर “जीरो टॉलरेंस” वास्तव में लागू है, तो
बड़े स्तर के घोटालों में शामिल लोगों पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखती?
जवाबदेही का समय
चार साल का कार्यकाल केवल जश्न मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय होता है।
सरकार के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जनता के सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
उत्तराखंड की जनता अब सिर्फ घोषणाएं नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण विकास, स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता, और पारदर्शी शासन चाहती है।
अगर सरकार इन सवालों का जवाब नहीं देती, तो “चार साल बेमिसाल” का नारा धीरे-धीरे “चार साल बेमिसाल सवाल” में बदलता जाएगा।


Spread the love