

रुद्रपुर।रुद्रपुर रिंग रोड परियोजना, जो पहले ही भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते सुर्खियों में थी, अब एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। महापौर विकास शर्मा और रिंग रोड निर्माण कंपनी की संयुक्त प्रेस वार्ता के बाद कुछ मीडिया चैनलों ने अचानक अपना रुख बदलते हुए 1100 करोड़ रिंग रोड रुद्रपुर परियोजना को ‘क्लीन चिट’ दे दी है। यह वही मीडिया है जिसने कुछ दिन पहले तक इसी परियोजना में बड़े घोटाले के आरोपों को प्रमुखता से उठाया था।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
इस घटनाक्रम ने न केवल रिंग रोड परियोजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि मीडिया की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
आरोपों का दौर: जब मीडिया बना ‘जांच एजेंसी’
कुछ समय पहले तक रुद्रपुर रिंग रोड को लेकर मीडिया चैनलों और अखबारों में लगातार खबरें चल रही थीं कि इस परियोजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। 10 एमएम की बारिश में सड़क का क्षतिग्रस्त होना, निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल, और करोड़ों रुपये की लागत के बावजूद कमजोर संरचना—ये सब मुद्दे मीडिया ने जोर-शोर से उठाए।
इन रिपोर्ट्स में कई चैनलों ने बिना किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट के ही परियोजना को “महाघोटाला” करार दे दिया। जनता के बीच यह धारणा बनने लगी कि रिंग रोड परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है।
प्रेस वार्ता के बाद बदला सुर
लेकिन हाल ही में महापौर विकास शर्मा और निर्माण कंपनी द्वारा आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता के बाद तस्वीर अचानक बदल गई।
कुछ प्रमुख मीडिया चैनलों ने प्रेस वार्ता में दिए गए बयानों को आधार बनाते हुए यह निष्कर्ष निकाल लिया कि परियोजना में कोई घोटाला नहीं हुआ।
बिना किसी स्वतंत्र जांच या तकनीकी रिपोर्ट के, मीडिया के एक वर्ग ने न केवल आरोपों को खारिज कर दिया, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से परियोजना को ‘क्लीन चिट’ भी दे दी।
मीडिया की भूमिका पर सवाल
यह पूरा घटनाक्रम मीडिया की निष्पक्षता और उसकी जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या मीडिया का काम सिर्फ आरोप लगाना और फिर बिना जांच के क्लीन चिट देना है?
आज का मीडिया ट्रायल और कल का मीडिया सर्टिफिकेट—दोनों ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं।
जब आरोप लगे, तब क्या मीडिया के पास ठोस सबूत थे?
और जब क्लीन चिट दी गई, तब क्या कोई स्वतंत्र जांच रिपोर्ट सामने आई?
अगर दोनों ही स्थितियों में जवाब “नहीं” है, तो यह स्पष्ट रूप से ‘एजेंडा आधारित पत्रकारिता’ की ओर इशारा करता है।
जनता के विश्वास पर चोट
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन जब वही मीडिया बिना ठोस आधार के अपने रुख बदलता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान जनता के विश्वास को होता है।
रुद्रपुर की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि—
सच क्या है? घोटाला हुआ या नहीं?
और उससे भी बड़ा सवाल—
मीडिया सच दिखा रहा है या सिर्फ कहानी गढ़ रहा है?
“कौन होती है मीडिया ‘क्लीन चिट’ देने वाली? उत्तराखंड की परिकल्पना के विपरीत खड़ा होता मीडिया मैनेजमेंट”
रुद्रपुर रिंग रोड प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बिना निष्पक्ष जांच के मीडिया आखिर किस आधार पर ‘क्लीन चिट’ दे देती है। उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित पर आधारित थी, लेकिन जब मीडिया ही भ्रष्टाचार के आरोपों को कभी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करे और फिर अचानक बिना सवाल पूछे उसे सही ठहराने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है। यह प्रवृत्ति ‘मीडिया मैनेजमेंट’ की ओर इशारा करती है, जहां खबरों का रुख तथ्यों से नहीं बल्कि प्रभाव और दबाव से तय होता है। ऐसे माहौल में जरूरी है कि किसी भी परियोजना पर अंतिम निष्कर्ष केवल निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आए, ताकि जनता का भरोसा कायम रह
आवश्यकता निष्पक्ष जांच की
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है एक निष्पक्ष और तकनीकी जांच।
न तो केवल मीडिया ट्रायल के आधार पर किसी को दोषी ठहराया जा सकता है, और न ही प्रेस वार्ता के आधार पर किसी को क्लीन चिट दी जा सकती है।
सरकार और संबंधित एजेंसियों को चाहिए कि वे इस परियोजना की उच्च स्तरीय जांच कराएं, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जनता का विश्वास बहाल हो।
मीडिया को आत्ममंथन की जरूरत
रुद्रपुर रिंग रोड का यह मामला केवल एक परियोजना का विवाद नहीं है, बल्कि यह मीडिया की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।
आज जरूरत है कि मीडिया अपने दायित्व को समझे और बिना किसी दबाव या प्रभाव के निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता करे।
क्योंकि—
अगर मीडिया ही भ्रम फैलाने लगे, तो सच की आवाज कौन बनेगा?




