अंधकार से प्रकाश की ओर : हनुमान और कालभैरव आराधना का दिव्य संगमलेखक : अवतार सिंह बिष्ट

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कभी-कभी समय स्वयं साधना का आमंत्रण देता है — एक ऐसा क्षण जब ब्रह्मांड की ऊर्जाएँ एक साथ सक्रिय होकर मनुष्य को भीतर से रूपांतरित करती हैं। अगहन मास का कृष्ण पक्ष — जब चंद्रमा घटता है, पर भीतर का प्रकाश बढ़ता है — ऐसे ही एक दिव्य काल का द्योतक है। इसी काल में आती है कालभैरव जयंती, और इस वर्ष यह पर्व विशेष रूप से शुभ संयोग लेकर आ रहा है, क्योंकि इसके पूर्व दिवस, मंगलवार 11 नवंबर 2025, हनुमान आराधना का पावन दिन होगा।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

अर्थात — यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि दो शक्तियों के संगम का उत्सव है :
एक ओर भय-भंजन हनुमान — जो भक्त को राक्षसी प्रवृत्तियों से मुक्त करते हैं,
और दूसरी ओर भैरवनाथ — जो अधर्म, मोह और अहंकार के संहारक हैं।

यह संगम दर्शाता है कि साधना के दो मार्ग — भक्ति और तंत्र — जब एक बिंदु पर मिलते हैं, तो साधक केवल पूजा नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के भय, भ्रम और अंधकार का नाश करता है।


हनुमान से भैरव तक : निर्भयता का क्रम

मंगलवार का दिन मंगल ग्रह का प्रतीक है — शौर्य, बल, और ऊर्जा का प्रतीक। जो व्यक्ति इस दिन हनुमान की उपासना करता है, उसके जीवन से दुर्बलता और संशय मिटने लगता है।
हनुमान वह शक्ति हैं जो ‘भीम रूप धरे असुर संहारे’ — यानी राक्षसी प्रवृत्तियों, मोह और भय को निगलने वाली ऊर्जा हैं।

दूसरी ओर, कालभैरव भगवान शिव का रौद्र रूप हैं — जो अहंकार और अधर्म का नाश करते हैं।
जहाँ हनुमान हमें आत्मबल देते हैं, वहीं भैरव हमें आत्मसंयम सिखाते हैं।
हनुमान भक्त को शक्ति देते हैं,
भैरव उस शक्ति का सदुपयोग करना सिखाते हैं।

इसीलिए इन दोनों की साधना को एक साथ करने से शक्ति और संतुलन दोनों की प्राप्ति होती है।


अष्टमी की रात्रि — जब भय का अंत होता है

अगहन मास की अष्टमी तिथि — यह रात्रि ब्रह्मांडीय ऊर्जा की चरम अवस्था मानी जाती है। जब चंद्रमा क्षीण होता है, तब मन की गहराई जाग्रत होती है। यही समय है जब साधक अपने भीतर उतर सकता है।

भैरव जयंती उसी अष्टमी की रात्रि में मनाई जाती है।
कहते हैं, जब ब्रह्मा ने अपने अहंकार में कहा “मैं सृष्टिकर्ता हूँ,” तब शिव ने कालभैरव रूप धारण कर उनके अहंकार का संहार किया।
इस कथा का अर्थ स्पष्ट है — भैरव वह शक्ति हैं जो हमें हमारे अहंकार से मुक्त करती हैं।

अष्टमी की रात्रि में जब भक्त दीप जलाता है, तो वह केवल भगवान को नहीं, अपने भीतर के अंधकार को भी प्रकाशित करता है।
कुत्तों को भोजन कराना, भैरव चालीसा का पाठ, और दीपदान — ये सब प्रतीक हैं आत्म-नियंत्रण, करुणा, और आत्मशक्ति के जागरण के।


साधना का अर्थ — भय से मुक्ति, आत्मा से जुड़ाव

आज का युग भय का युग है — भय भविष्य का, भय असफलता का, भय समाज का।
परंतु भैरव साधना यही सिखाती है कि “भय वही करता है, जो स्वयं से दूर है।”
जब साधक अपने भीतर के हनुमान को जगाता है, तब उसके भीतर साहस जन्म लेता है;
और जब वह भैरव को पुकारता है, तब वह साहस स्थिर होकर विवेक में बदल जाता है।

इसलिए यह पर्व केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साहस, और करुणा का साधनात्मक अवसर है।
हनुमान की आराधना हमें शक्ति देती है,
और कालभैरव की उपासना हमें उस शक्ति के उपयोग की बुद्धि।


जब ग्रह, योग और नक्षत्र बनाते हैं दिव्य संतुलन

इस वर्ष अष्टमी की रात्रि में ब्रह्म योग और शुक्ल योग का संगम बनेगा — यह वह काल है जब मन सात्त्विक होता है और ध्यान स्थिर।
आश्लेषा नक्षत्र रहस्यमय ज्ञान और तांत्रिक सिद्धि का कारक है।
बुधवार का दिन — बुद्धि और विचार का प्रतीक — जब अष्टमी पर आता है, तो भैरव साधना की सिद्धि को कई गुना बढ़ा देता है।

इस प्रकार 11 और 12 नवंबर का यह द्विदिनीय काल केवल कैलेंडर का योग नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय समरसता का प्रतीक है।


साधक के लिए संदेश

इन दोनों दिनों का संयोग कहता है —
यदि तुम भय से मुक्त होना चाहते हो, तो हनुमान की भक्ति करो।
यदि तुम अज्ञान से मुक्त होना चाहते हो, तो भैरव की उपासना करो।
और यदि तुम स्वयं से जुड़ना चाहते हो, तो इन दोनों को अपने जीवन का आधार बनाओ।

हनुमान तुम्हारे भीतर की शक्ति हैं,
भैरव तुम्हारे भीतर की मर्यादा।
जब यह दोनों मिलते हैं, तो साधक केवल भक्त नहीं, बल्कि सिद्ध बन जाता है — जो न किसी से भय खाता है, न किसी को भय दिखाता है।


उपसंहार

11 और 12 नवंबर 2025 — ये दो दिन केवल तिथियाँ नहीं, आत्मजागरण के द्वार हैं।
हनुमान तुम्हें साहस देंगे,
भैरव तुम्हें दिशा देंगे।
हनुमान तुम्हें भय से बचाएंगे,
भैरव तुम्हें अहंकार से।

अतः इन पवित्र दिनों में दीप प्रज्वलित करें, मन को संयमित करें, और भीतर की चेतना को जाग्रत करें।
क्योंकि जब भीतर का भय समाप्त होता है,
तभी सच्ची भक्ति प्रारंभ होती है।
और जब भीतर का अंधकार मिटता है,
तभी कालभैरव मुस्कुराते हैं —
“अब तू अपने भीतर का देवत्व पहचान चुका है।”

अंधकार से प्रकाश की साधना : हनुमान और कालभैरव आराधना का दिव्य संगम
— अवतार सिंह बिष्ट,अगहन मास का कृष्ण पक्ष जब अष्टमी तिथि पर पहुंचता है, तब सम्पूर्ण सृष्टि में एक अद्भुत ऊर्जा प्रवाहित होती है — यह कालभैरव जयंती का समय है। इस वर्ष 12 नवंबर को पड़ने वाली यह जयंती विशेष है, क्योंकि इसके पूर्व दिवस 11 नवंबर मंगलवार को हनुमान आराधना का शुभ अवसर रहेगा। यह दो दिवसीय काल भक्ति, साधना और आत्मजागरण का अपूर्व संगम लेकर आया है।

हनुमान जी मंगल के अधिष्ठाता हैं, जो शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक हैं। मंगलवार को उनकी उपासना से भय, दुर्बलता और संकट दूर होते हैं। वहीं कालभैरव भगवान शिव का रौद्र रूप हैं, जो अहंकार, मोह और अंधकार का नाश करते हैं। जब साधक हनुमान की भक्ति और भैरव की आराधना को एक साथ करता है, तो उसे शक्ति के साथ विवेक और संयम का वरदान प्राप्त होता है।

अगहन अष्टमी की रात्रि को बनने वाले शुक्ल योग और ब्रह्म योग मन को सात्त्विक बनाते हैं, जबकि आश्लेषा नक्षत्र साधना और भैरव उपासना के लिए अत्यंत अनुकूल रहता है। यह काल साधक के भीतर की गहराई को जगाता है, जिससे आत्मबल और अंतर्ज्ञान प्रबल होता है।

भैरव आराधना का तात्पर्य केवल भय से मुक्ति नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की ओर यात्रा है। दीपदान, भैरव चालीसा पाठ और कुत्तों को अन्नदान इस साधना के प्रतीक हैं — जो करुणा, संयम और आत्मबल का संदेश देते हैं।

हनुमान शक्ति के प्रतीक हैं, भैरव संतुलन के। जब ये दोनों भाव एक साथ जागृत होते हैं, तब साधक के जीवन में भय, अज्ञान और अहंकार का अंत होकर प्रकाश, विवेक और भक्ति का आरंभ होता है।
जय श्री हनुमान। जय कालभैरव।

जय श्री हनुमान। जय कालभैरव।


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