“फेसबुकिया” से मंच तक – ललित शर्मा की आवाज़ ने लूटी होली की महफिल

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संपादकीय:रुद्रपुर में कार्यक्रमों की कमी नहीं है। यहां सांस्कृतिक संध्याएं भी होती हैं, होली मिलन समारोह भी, कवि सम्मेलन भी और राजनीतिक रंगों से सराबोर मंच भी। हर आयोजन में बड़े-बड़े पोस्टर, बाहर से बुलाए गए कलाकार और ऊँचे स्तर का साउंड सिस्टम देखने को मिलता है। लेकिन अक्सर एक कमी खटकती है—स्थानीय प्रतिभाओं को वह मंच नहीं मिल पाता, जिसके वे वास्तविक हकदार होते हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


पत्रकार यूनियन के होली मिलन समारोह में इस बार कुछ अलग देखने को मिला। मंच सजा हुआ था, साउंड सिस्टम उच्च कोटि का था, और माहौल में हल्की-सी राजनीति, हल्की-सी विचारधारा और बहुत सारा होली का रंग घुला हुआ था। ऐसे में जब ललित शर्मा का नाम गाने के लिए पुकारा गया, तो पहले तो उनके चेहरे पर झिझक साफ दिखाई दी। वजह भी स्पष्ट थी—अब तक उन्हें लोग “फेसबुक लाइव” गायक के रूप में जानते रहे हैं। मोबाइल स्क्रीन के उस छोटे से फ्रेम से निकलकर बड़े मंच पर आना किसी भी कलाकार के लिए आसान नहीं होता।
पर जैसे ही उन्होंने माइक थामा, माहौल बदलने लगा। शुरुआत में एक गीत की फरमाइश हुई थी, लेकिन जैसे-जैसे सुरों ने पकड़ बनाई, श्रोताओं की मांग बढ़ती चली गई। एक की जगह तीन गीत। और फिर वह क्षण आया जब उन्होंने “कोई ढूंढे मूंगा, कोई ढूंढे मोतियां…” गाना शुरू किया।
उस गीत ने केवल स्वर नहीं दिए, उसने वातावरण को एक अलग दिशा दे दी। जहां मंच के आसपास हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे विमर्शों की धीमी-धीमी चर्चाएं चल रही थीं, वहीं इस गीत ने मानो सबको एक सूत्र में बांध दिया। संगीत ने वह कर दिखाया, जो भाषण अक्सर नहीं कर पाते—दिलों को एक साथ धड़कने पर मजबूर कर दिया।
ललित शर्मा की आवाज़ में कोई बनावटीपन नहीं है। उसमें एक सादगी है, जो सीधे दिल तक जाती है। जब साउंड सिस्टम बेहतरीन हो और कलाकार की आवाज़ में सच्चाई हो, तो प्रस्तुति का स्तर स्वतः ऊंचा हो जाता है। उस शाम यही हुआ। एक क्षण के लिए ऐसा लगा कि यह वही रुद्रपुर है, जहां प्रतिभा की कोई कमी नहीं—सिर्फ मंच की जरूरत है।
हमारे शहर में अक्सर बाहर से कलाकार बुलाए जाते हैं। बाजार से सहयोग जुटाया जाता है, बड़े-बड़े नामों का प्रचार होता है। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमने अपने घर की आवाज़ों को पर्याप्त अवसर दिया? क्या कारण है कि स्थानीय कलाकारों को मंच देने में आयोजकों के मन में संकोच रहता है? क्या यह आशंका कि कहीं वे रातों-रात लोकप्रिय न हो जाएं? या यह धारणा कि “बाहर का” नाम ही कार्यक्रम को सफल बना सकता है?
ललित शर्मा की प्रस्तुति ने इन धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा को केवल एक अवसर चाहिए। जिस तरह श्रोताओं ने लगातार गीतों की फरमाइश की, वह इस बात का प्रमाण था कि लोग केवल नाम नहीं, गुणवत्ता सुनना चाहते हैं।
उनकी गायकी में एक और विशेषता है—भाव की स्पष्टता। शब्दों का उच्चारण साफ, सुरों पर नियंत्रण और प्रस्तुति में आत्मविश्वास। मंच पर यह शायद उनकी पहली या दूसरी बड़ी प्रस्तुति रही हो, लेकिन घबराहट कुछ ही पलों में आत्मविश्वास में बदल गई। यह बदलाव दर्शकों ने भी महसूस किया।
कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार राजेश शर्मा जैसे अनुभवी और शिक्षित व्यक्तित्व की उपस्थिति भी उल्लेखनीय थी। अक्सर देखा जाता है कि जिनके पास ज्ञान का भंडार होता है, वे शांत और संयमित रहते हैं। उसी तरह उस शाम भी वरिष्ठों की उपस्थिति में एक गरिमा बनी रही। और इसी गरिमा के बीच ललित शर्मा की आवाज़ ने एक नई ऊर्जा का संचार किया।
एक श्रोता के रूप में जब वह गीत कानों में पड़ा, तो यह केवल मनोरंजन नहीं था। उसमें एक अपनापन था। ऐसा लगा जैसे कोई अपना व्यक्ति, अपने शहर की मिट्टी से जुड़ा कलाकार, पूरे मन से गा रहा हो। उसमें दिखावे की चमक नहीं थी, लेकिन सच्चाई की चमक थी। और यकीन मानिए, सच्चाई की आवाज़ दूर तक जाती है।
रुद्रपुर के कार्यक्रमों में यदि भविष्य में ललित शर्मा दिखाई दें, तो —यह स्थानीय प्रतिभा के सम्मान का प्रतीक होगा। आयोजकों से यदि श्रोता स्वयं आग्रह करें कि “ललित शर्मा का एक गीत सुनाइए,” तो यह शहर की सांस्कृतिक सोच में बदलाव का संकेत होगा।
यह समय है जब हम अपने कलाकारों को पहचानें। बड़े शहरों और बड़े नामों के आकर्षण से बाहर निकलकर अपने बीच की प्रतिभा को सराहें। क्योंकि जब स्थानीय कलाकार मंच पर चमकता है, तो वह केवल अपनी पहचान नहीं बनाता—वह पूरे शहर की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
होली के उस रंगीन समारोह में ललित शर्मा ने यह साबित कर दिया कि मंच का आकार मायने नहीं रखता, कलाकार का हौसला और हुनर मायने रखता है। और जब साउंड सिस्टम बेहतरीन हो, श्रोता उत्साहित हों और कलाकार दिल से गा रहा हो, तो सच में—कोई हॉलीवुड या बॉलीवुड की तुलना करने की जरूरत नहीं रहती।
रुद्रपुर को अब तय करना है कि वह “फेसबुकिया” कहकर प्रतिभाओं को सीमित रखेगा या उन्हें मंच देकर अपने शहर की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई देगा।
उस शाम का निष्कर्ष साफ था—ललित शर्मा केवल गायक नहीं, एक संभावित सांस्कृतिक पहचान हैं। और ऐसी पहचान को संजोना रुद्रपुर शहर की जिम्मेदारी भी है,


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