

उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना प्रश्न गूंज उठा है—राज्य आखिर किस दिशा में जा रहा है? जैसे ही गैरसैंण में विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ, सड़कों पर आंदोलन की आवाज भी तेज हो गई। उत्तराखंड क्रांति दल के कार्यकर्ताओं ने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, मूल निवास और सख्त भू-कानून लागू करने तथा रोजगार नीति बनाने की मांग को लेकर विधानसभा घेराव किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बैरिकेडिंग लगाकर रोका और पानी की बौछारें चलाकर कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया, जिनमें उक्रांद नेता आशीष नेगी भी शामिल थे।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उत्तराखंड राज्य का मूल सपना अब भी अधूरा है? राज्य निर्माण आंदोलन के समय जो कल्पना की गई थी—एक ऐसा पहाड़ी राज्य जो अपनी संस्कृति, संसाधनों और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित रखे—क्या वह सपना आज भी कहीं खो गया है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
उत्तराखंड क्रांति दल के शीर्ष नेता काशी सिंह एरी पूर्व केंद्रीय अध्यक्षएवं पूर्व विधायक नारायण सिंह जांतवाल, पुष्पेश त्रिपाठी पूर्व विधायक शांति प्रसाद भट्ट, आशीष नेगी, आशुतोष नेगी, आदि सभी नेताओं का कहना है कि जब तक गैरसैंण को स्थायी राजधानी नहीं बनाया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उनका आरोप है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय दल राजधानी के सवाल पर हमेशा ढुलमुल रवैया अपनाते रहे हैं। यह आरोप नया नहीं है। उत्तराखंड बनने के बाद से ही गैरसैंण को लेकर राजनीति होती रही है, लेकिन निर्णय की दिशा में ठोस कदम बहुत कम दिखाई दिए।
विधानसभा सत्र पर उक्रांद का सवाल, राज्य के मूल मुद्दों पर सरकार की चुप्पी क्यों?
गैरसैंण में शुरू हुए विधानसभा बजट सत्र को लेकर उक्रांद युवा प्रकोष्ठ के केंद्रीय अध्यक्ष आशीष नेगी ने सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि हर साल विधानसभा सत्र में बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन उत्तराखंड के मूल मुद्दे आज भी अधर में लटके हुए हैं।
आशीष नेगी ने सवाल किया कि आखिर स्थायी राजधानी गैरसैंण पर अब तक ठोस निर्णय क्यों नहीं लिया गया? राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी मजबूत भू-कानून और मूल निवास की स्पष्ट नीति लागू क्यों नहीं हो पाई? उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई स्पष्ट रोजगार नीति सामने नहीं आई है।
नेगी ने कहा कि यदि विधानसभा सत्र में इन बुनियादी मुद्दों पर चर्चा नहीं होती, तो यह राज्य आंदोलन की भावना के साथ अन्याय होगा। उन्होंने सरकार और विपक्ष दोनों से जवाब मांगते हुए कहा कि जनता अब केवल घोषणाएं नहीं बल्कि ठोस निर्णय चाहती है।
दरअसल, उत्तराखंड राज्य आंदोलन का एक बड़ा उद्देश्य यही था कि पहाड़ के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था बने और राजधानी ऐसी जगह हो जहां से पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को सीधे समझा जा सके। लेकिन आज भी राज्य की स्थायी राजधानी देहरादून ही बनी हुई है, जबकि गैरसैंण को केवल ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिया गया है। इससे आंदोलनकारियों और पहाड़ के लोगों में निराशा बनी हुई है।
उक्रांद का कहना है कि केवल राजधानी ही नहीं, बल्कि मूल निवास और भू-कानून का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पहाड़ों में लगातार बढ़ती बाहरी जमीन खरीद, रोजगार के सीमित अवसर और पलायन की समस्या को देखते हुए सख्त भू-कानून की मांग वर्षों से उठती रही है। सरकार ने हाल के वर्षों में भू-कानून में कुछ संशोधन किए हैं, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि ये संशोधन पर्याप्त नहीं हैं और इससे पहाड़ के मूल निवासियों के हित सुरक्षित नहीं हो पाएंगे।
रोजगार का मुद्दा भी उतना ही गंभीर है। उत्तराखंड में लंबे समय तक शिक्षा और सरकारी नौकरियां युवाओं के लिए मुख्य रोजगार का माध्यम रही हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई शिक्षण संस्थान बंद होने और नई भर्तियां न होने के कारण युवाओं में असंतोष बढ़ा है। उक्रांद नेताओं का आरोप है कि सरकार की नीतियों के कारण शिक्षण संस्थान कमजोर हो रहे हैं और इससे बेरोजगारी बढ़ रही है।
इसी तरह पहाड़ों में स्वास्थ्य, परिवहन और उच्च शिक्षा की सुविधाओं का अभाव भी लगातार पलायन को बढ़ावा दे रहा है। कई दूरदराज के गांवों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक सही ढंग से काम नहीं कर रहे। सड़क और परिवहन की स्थिति भी कई इलाकों में बेहद कमजोर है। नतीजा यह है कि युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार के लिए मैदानों की ओर पलायन कर रहे हैं और कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इस बजट को “संतुलन” के सिद्धांत पर आधारित बताते हुए विकास की नई दिशा का दावा किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार का कहना है कि यह बजट समावेशी विकास, आत्मनिर्भरता, नई सोच, तीव्र विकास, उन्नत गांव और शहर, लोक सहभागिता, आर्थिक शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था जैसे आठ स्तंभों पर आधारित है।
बजट में सामाजिक सुरक्षा पेंशन, स्वास्थ्य योजनाओं, महिला सशक्तिकरण, कृषि और उद्योग के लिए कई बड़े प्रावधान किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए लगभग 1327 करोड़ रुपये, अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना के लिए 600 करोड़ रुपये और आंगनबाड़ी तथा पोषण योजनाओं के लिए करीब 598 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
कृषि और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए मिशन एप्पल, ट्राउट प्रोत्साहन योजना, उच्च मूल्य वाले फलों की खेती और पशुपालन आधारित रोजगार योजनाओं के लिए भी बजट आवंटित किया गया है। वहीं एमएसएमई, स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाएं घोषित की गई हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भी सरकार ने बड़े बजट का प्रावधान किया है। लोक निर्माण विभाग को लगभग 2500 करोड़ रुपये, पेयजल विभाग को करीब 1827 करोड़ रुपये और ग्रामीण विकास विभाग को 1642 करोड़ रुपये का बजट दिया गया है। सरकार का दावा है कि इससे सड़कों, पेयजल और ग्रामीण विकास की योजनाओं को गति मिलेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल बजट घोषणाओं से पहाड़ की वास्तविक समस्याएं हल हो जाएंगी? राज्य आंदोलन के दौरान जो मुद्दे सबसे प्रमुख थे—गैरसैंण राजधानी, पलायन रोकना, स्थानीय युवाओं को रोजगार, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार—क्या इन पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई दे रही है?
उक्रांद और कई राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि उत्तराखंड की मूल अवधारणा कहीं न कहीं विकास की राजनीति में पीछे छूटती जा रही है। उनका कहना है कि यदि राज्य की नीतियां वास्तव में पहाड़ के लोगों के हित में बनें और राजधानी जैसे मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय हो, तभी उत्तराखंड राज्य निर्माण का सपना पूरा हो सकेगा।
आज जब राज्य गठन के पच्चीस वर्ष पूरे होने के करीब हैं, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उत्तराखंड उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जिसकी कल्पना राज्य आंदोलन के शहीदों ने की थी? या फिर राजनीति के संतुलन और बजट के आंकड़ों के बीच कहीं वह मूल भावना धुंधली पड़ती जा रही है?
सच्चाई यही है कि उत्तराखंड के सामने चुनौतियां आज भी उतनी ही बड़ी हैं—पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमजोर व्यवस्था, और पहाड़-मैदान के बीच बढ़ती असमानता। बजट चाहे जितना संतुलित बताया जाए, लेकिन यदि इन मूल प्रश्नों का समाधान नहीं होता तो राज्य की असली परिकल्पना अधूरी ही रहेगी।
गैरसैंण के शांत पहाड़ों में गूंजती आंदोलन की आवाज शायद यही याद दिला रही है कि उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि एक सपना है—जिसे अभी पूरी तरह साकार होना बाकी है।




