गंगोत्री धाम, आस्था और राजनीति: हरीश रावत का भ्रम, कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन

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उत्तराखंड की आत्मा उसके चारधाम हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवित चेतना हैं। ऐसे में जब गंगोत्री धाम की मर्यादा, परंपरा और धार्मिक अनुशासन को लेकर समाज के भीतर विमर्श खड़ा होता है, तो यह स्वाभाविक है। लेकिन इस विमर्श को चुनावी एजेंडा, सांप्रदायिकता और बीजेपी की साजिश कहकर खारिज करना, न केवल धार्मिक आस्था का अपमान है, बल्कि यह हरीश रावत और कांग्रेस पार्टी की उस सोच को उजागर करता है, जो वर्षों से धर्म को वोट बैंक की तराजू पर तौलती रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का यह कहना कि “गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन बीजेपी का नया चुनावी एजेंडा है”, दरअसल उनके राजनीतिक दिवालियापन का प्रमाण है। सवाल यह नहीं है कि कौन किसे वोट देगा, सवाल यह है कि धार्मिक स्थलों की स्वायत्तता, परंपरा और मर्यादा तय करने का अधिकार किसका है? क्या यह अधिकार राजनीतिक दलों का है या उन परंपराओं का, जो सदियों से चली आ रही हैं?
कांग्रेस का धर्म-ज्ञान: चुनावी मौसम में ही क्यों जागता है?
कांग्रेस पार्टी का इतिहास उठाकर देखिए—जब-जब सनातन परंपरा, मंदिरों या हिंदू आस्था की बात आती है, कांग्रेस या तो मौन साध लेती है, या फिर उसे सांप्रदायिक राजनीति करार दे देती है। लेकिन यही कांग्रेस जब अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों, परंपराओं और नियमों की बात आती है, तो संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की दुहाई देने लगती है।
क्या हरीश रावत यह बताएंगे कि—
सऊदी अरब में गैर-मुस्लिमों की मक्का–मदीना में एंट्री क्यों प्रतिबंधित है?
वेटिकन सिटी में चर्च की मर्यादाएं क्यों सख्त हैं?
जैन मंदिरों, गुरुद्वारों और मस्जिदों में अपने-अपने धार्मिक अनुशासन क्यों लागू हैं?
अगर यह सब “चुनावी एजेंडा” नहीं है, तो गंगोत्री धाम की बात आते ही कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता की याद क्यों आती है?
“सबने मंदिर बनाए”—इतिहास की आड़ में भ्रम फैलाने की कोशिश
हरीश रावत का यह तर्क कि “मंदिरों और सांस्कृतिक इमारतों के निर्माण में सभी धर्मों के कारीगरों और श्रमिकों का योगदान रहा है”, तथ्यों का आधा सच है। निर्माण कार्य और पूजा-अर्चना, दोनों अलग विषय हैं। कोई भी समाज निर्माण में सबका योगदान स्वीकार करता है, लेकिन धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पद्धति और तीर्थ अनुशासन उसी धर्म की परंपराओं से तय होते हैं।
क्या किसी मस्जिद के इमाम की नियुक्ति पर गैर-मुस्लिम समुदाय सवाल उठा सकता है?
क्या किसी चर्च में पूजा-पद्धति बदलने की मांग बाहरी समाज कर सकता है?
फिर केवल हिंदू मंदिरों को ही “सर्वसमावेशी प्रयोगशाला” क्यों बनाया जाता है?
शंकराचार्य विवाद: कांग्रेस का चयनित आक्रोश
हरीश रावत ने शंकराचार्य के अपमान का मुद्दा उठाया—यह स्वागतयोग्य होता, यदि कांग्रेस का यह आक्रोश सिद्धांत आधारित होता, न कि राजनीतिक अवसरवाद। सवाल यह है कि जब-
मंदिरों की संपत्ति पर सरकारों का नियंत्रण बढ़ा,
पुजारियों को सरकारी कर्मचारी जैसा बना दिया गया,
मंदिर प्रशासन में राजनीतिक दखल बढ़ा,
तब कांग्रेस क्यों चुप रही?
आज जब सनातन परंपरा अपने अस्तित्व और स्वायत्तता की बात करती है, तब कांग्रेस को शंकराचार्य याद आते हैं। यह आस्था नहीं, अवसर की राजनीति है।
बीजेपी पर आरोप, लेकिन आत्ममंथन शून्य
हरीश रावत कहते हैं कि बीजेपी के पास मुद्दे नहीं बचे, इसलिए वह नए एजेंडे गढ़ रही है। लेकिन कांग्रेस यह नहीं बताती कि उसके पास खुद कौन से मुद्दे हैं?
बेरोजगारी पर वर्षों तक शासन के बावजूद समाधान क्यों नहीं?
पहाड़ों से पलायन कांग्रेस शासन में क्यों नहीं रुका?
उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण का सपना कांग्रेस ने क्यों अधूरा छोड़ा?
आज जब कांग्रेस सत्ता से बाहर है, तो उसे हर सामाजिक विमर्श में केवल बीजेपी की छाया ही दिखती है। यह राजनीतिक दल नहीं, बल्कि राजनीतिक परजीवीपन का लक्षण है।
2027 के गठबंधन का सपना: ज़मीन से कटा हुआ दावा
हरीश रावत का यह दावा कि 2027 में यूपी में सपा–कांग्रेस गठबंधन जारी रहेगा, अपने आप में एक राजनीतिक भ्रम है। कांग्रेस आज उस स्थिति में नहीं है कि वह किसी गठबंधन की शर्तें तय करे। वह अब केवल अनुयायी दल बनकर रह गई है—कभी सपा के पीछे, कभी राजद के, तो कभी किसी और के।
उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थिति और भी दयनीय है। न संगठन में ऊर्जा, न नेतृत्व में स्पष्टता, और न ही विचारधारा में स्थिरता।
निष्कर्ष: आस्था बनाम अवसरवाद
गंगोत्री धाम का मुद्दा न तो बीजेपी का एजेंडा है, न ही कांग्रेस के लिए बयानबाजी का मंच। यह सनातन परंपरा, धार्मिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक सम्मान का प्रश्न है। हरीश रावत और कांग्रेस पार्टी यदि हर धार्मिक विषय को केवल चुनावी चश्मे से देखेंगे, तो वे न केवल अपनी विश्वसनीयता खोते जाएंगे, बल्कि समाज से भी कटते चले जाएंगे।
आज देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो आस्था को राजनीति का हथियार नहीं, बल्कि संविधान और परंपरा के संतुलन का विषय समझें। दुर्भाग्य से, हरीश रावत और कांग्रेस पार्टी इस संतुलन में पूरी तरह विफल नजर आते हैं।
सनातन परंपरा किसी पार्टी की मोहताज नहीं है—
लेकिन जो पार्टियां आस्था का अपमान करती हैं,
इतिहास उन्हें माफ नहीं करता।


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