सरस आजीविका मेला 2026 का भव्य समापन: सांस्कृतिक उत्कर्ष या मिशन 2027 की प्रस्तावना?

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रुद्रपुर, 23 फरवरी 2026।उधम सिंह नगर कार्निवाल सरस आजीविका मेला 2026 के समापन दिवस पर आयोजित “बॉलीवुड उत्तराखंड संध्या” ने सांस्कृतिक ऊर्जा, आधुनिक संगीत और पहाड़ी अस्मिता का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसने पूरे आयोजन को ऐतिहासिक आयाम दे दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


समापन दिवस पर उत्तराखंड के एम टीवी वाइड ग्रुप द्वारा आधुनिक संगीत की प्रस्तुतियों ने मेले में पहुंचे जनसमूह को उत्साह और रंगों से सराबोर कर दिया। इसके उपरांत उत्तराखंड की मिट्टी से जुड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके Pandavaas बैंड ने अपनी दमदार धुनों और लोकगायन से ऐसा समां बांधा कि पूरा पंडाल झूम उठा।
कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण रहे पांडवाज बैंड ने संध्या की शुरुआत ही ऐसी ऊर्जा से की कि युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सभी संगीत की लय पर थिरकते नजर आए। कुमाऊनी और गढ़वाली गीतों की श्रृंखला ने वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय बना दिया। लास्ट पंक्ति में खड़े लोग भी लगातार झूमते रहे। मंच से कलाकारों की एक के बाद एक प्रस्तुति आत्मविभोर कर देने वाली रही। निस्संदेह यह संध्या पूरे दस दिवसीय आयोजन में सबसे ऐतिहासिक और उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुई।
मुख्य अतिथियों द्वारा सम्मान
समापन अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथियों ने सभी कलाकारों का अंगवस्त्र एवं उपहार देकर सम्मान किया और सरस मेले की सफलता पर बधाई दी। उन्होंने उत्तराखंड सरकार एवं भारत सरकार का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया, महापौर विकास शर्मा, कुलपति गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय डॉ. मनमोहन सिंह चौहान, मुख्य विकास अधिकारी दिवेश शाशनी, अपर जिलाधिकारी पंकज उपाध्याय, मुख्य कोषाधिकारी डॉ. पंकज शुक्ल, पीडी हिमांशु जोशी, जिला विकास अधिकारी सुशील मोहन डोभाल, नगर आयुक्त शिप्रा जोशी, उपजिलाधिकारी ऋचा सिंह, गौरव पांडे, डॉ. अमृता शर्मा, मुख्य शिक्षा अधिकारी के.एस. रावत, जिला आयुर्वेद यूनानी अधिकारी डॉ. आलोक शुक्ला, जिला होम्योपैथिक अधिकारी डॉ. महेश जोशी, अधिशाषी अभियंता लघु सिंचाई सुशील कुमार, विद्युत उमाकांत चतुर्वेदी, तहसीलदार दिनेश कुटौला, गिरीश त्रिपाठी, जिला पंचायतराज अधिकारी विद्या सिंह सोमनाल, सहायक निदेशक मत्स्य संजय छिम्वाल, डीओपीआरडी बी.एस. रावत, जिला कार्यक्रम अधिकारी मुकुल चौधरी, प्रोबेशन अधिकारी व्योमा जैन, जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी नंदनी तोमर सहित विजडम पब्लिक स्कूल के एमडी गोपाल सिंह पटवाल, श्रीमती सुधा पटवाल, करम सिंह दानू, दीपा माटेला, प्रमुख समाजसेवी दिनेश बम, प्रमुख समाजसेवी दिनेश भट्ट, नागेंद्र शर्मा, राजेंद्र बोहरा, सतीश ध्यानी, छात्र संघ अध्यक्ष रजत बिष्ट, हरीश दानाई ,विनीत पांडे, रेनू शर्मा, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और भारी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे।
जिला प्रशासन एवं आयोजक मंडल ने जिस भव्यता और अनुशासन के साथ कार्यक्रम का संचालन किया, वह सराहनीय रहा। सुरक्षा एवं व्यवस्थाएं अंतिम दिन शांतिपूर्ण रहीं, जिससे कार्यक्रम गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इसके लिए जिला प्रशासन बधाई का पात्र है।
उपलब्धियां और कमियां — दोनों पर दृष्टि आवश्यक
जहां समापन दिवस का सांस्कृतिक आयोजन ऐतिहासिक रहा, वहीं पूरे दस दिवसीय मेले को लेकर कुछ प्रश्न भी उठे।
स्थानीय स्वयं सहायता समूहों और आजीविका मिशन से जुड़े स्टॉलों में बाहरी राज्यों—यूपी, बिहार, राजस्थान—के लोगों को प्राथमिकता दिए जाने की चर्चा रही। इससे स्थानीय प्रतिभाओं में नाराजगी देखी गई।
कई स्थानीय कलाकारों को मंच न मिल पाने की शिकायत सामने आई, जबकि बाहरी “पेड़ कलाकारों” को प्रमुख स्थान मिला।
विपक्षी जनप्रतिनिधियों को या तो आमंत्रित नहीं किया गया अथवा उनकी उपस्थिति नगण्य रही। आयोजन स्थल पर मुख्य रूप से सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधियों की ही सक्रियता दिखाई दी।
इन परिस्थितियों में पूरे मेले को “मिशन 2027” की तैयारियों के रूप में भी देखा गया। मंच से विकास, उपलब्धियों और योजनाओं का उल्लेख जिस प्रकार हुआ, उससे राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट झलकता रहा।
यह प्रश्न अब जनमानस के बीच है—क्या सरस मेला केवल सांस्कृतिक और आजीविका का उत्सव था, या 2027 के चुनावी शंखनाद की एक सुसंगठित पृष्ठभूमि?
ऐतिहासिक संध्या, लेकिन संतुलन जरूरी
यह स्वीकार करना होगा कि समापन दिवस का आयोजन सांस्कृतिक दृष्टि से अविस्मरणीय रहा। पांडवाज बैंड की प्रस्तुति ने उत्तराखंड की लोक आत्मा को जीवंत कर दिया। युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का जो प्रयास इस मंच से हुआ, वह प्रशंसनीय है।
लेकिन यदि सरस मेला सच में “आजीविका” और “स्वावलंबन” का प्रतीक है, तो स्थानीय कलाकारों, कारीगरों और विपक्षी जनप्रतिनिधियों शहर के गणमान्य व्यक्तियों पूर्व प्रतिष्ठित अधिकारियोंकी प्रतिष्ठित समावेशीयो भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र में सांस्कृतिक मंच राजनीतिक एकरूपता का माध्यम न बनकर जनसमावेश का उत्सव होना चाहिए।

उधम सिंह नगर का सरस आजीविका मेला 2026 अपने भव्य समापन के कारण इतिहास में दर्ज रहेगा। संगीत, संस्कृति और प्रशासनिक अनुशासन ने इसे सफल बनाया।
अब देखना यह है कि 2027 के राजनीतिक परिदृश्य में इस मेले की गूंज कितनी दूर तक सुनाई देती है।
फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है—
यह आयोजन सांस्कृतिक रूप से ऐतिहासिक था, प्रशासनिक रूप से सफल था, लेकिन राजनीतिक संकेतों से पूरी तरह मुक्त नहीं था।
और शायद यही इसकी सबसे बड़ी कहानी भी है।


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