

रुद्रपुर। पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी की दिशा में एक सराहनीय कदम उठाते हुए टाटा मोटर्स लिमिटेड, पंतनगर के सप्लायर क्वालिटी विभाग के कर्मचारियों ने वॉलंटियरिंग पहल के तहत नगर निगम रुद्रपुर स्थित कंप्रेस्ड बायो-गैस प्लांट परिसर में विकसित प्लांटेशन साइट पर श्रमदान किया। इस दौरान कर्मचारियों ने मल्चिंग और पौधों को पानी देने जैसी गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
विशेष बात यह है कि जो स्थान कभी कचरा डंपिंग साइट के रूप में जाना जाता था, उसे अब एक हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। करीब 1 एकड़ भूमि पर 2000 से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं, जो इस पहल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रभावी उदाहरण बनाते हैं।
यह प्लांटेशन साइट टाटा मोटर्स की कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहल के अंतर्गत विकसित की गई है, जिसे इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल डेवलपमेंट के सहयोग से क्रियान्वित किया जा रहा है। मियांवाकी पद्धति पर आधारित इस परियोजना का शुभारंभ करीब छह माह पूर्व रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा, नगर आयुक्त और टाटा मोटर्स टीम द्वारा किया गया था।
इस अवसर पर टाटा मोटर्स से प्रदीप सांगवान, दीपक जैन, देव कुमार, वेंकट सई कुमार, अनिल वत्स, प्रीतम मोतीलाल, आराधना उनियाल, निशा, बीना चौहान, विनायक गुप्ता, पंकज गंगवार, राजेश कुमार, गौरव राजपूत, गौरव जोशी, विनोद कुमार, जय पंत, संदीप कुमार सहित अन्य कर्मचारी मौजूद रहे। साथ ही Rane Steering Systems Limited की टीम ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।
कार्यक्रम में शामिल अधिकारियों ने बताया कि यह केवल पौधारोपण नहीं, बल्कि एक हरित, स्वस्थ और सतत भविष्य की नींव रखने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि प्लांट हेड महेश सुगुरु और एचआर हेड विष्णु दत्त लगातार कर्मचारियों को ऐसे पर्यावरणीय कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दे रही है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है।
संपादकीय: हरियाली की ओर बढ़ता जिम्मेदार उद्योग,औद्योगिक विकास अक्सर पर्यावरणीय क्षति के आरोपों से घिरा रहता है, लेकिन रुद्रपुर में टाटा मोटर्स लिमिटेड की पहल इस धारणा को बदलने की दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है। कचरा डंपिंग साइट को हरित क्षेत्र में बदलना प्रतीकात्मक कदम नहीं, जिम्मेदार औद्योगिक संस्कृति का प्रमाण है।
मियांवाकी पद्धति के माध्यम से सीमित भूमि पर घने वन का निर्माण न जैव विविधता को बढ़ावा देता है, शहरी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधारने का प्रभावी माध्यम बनता है। यह पहल दिखाती है कि यदि उद्योग, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं मिलकर काम करें, तो पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जा सकता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी चुनौतियां गंभीर होती जा रही हैं, ऐसे प्रयास उम्मीद की किरण हैं। अन्य औद्योगिक इकाइयों को भी इससे प्रेरणा लेकर अपने CSR कार्यक्रमों को औपचारिकता तक सीमित न रखकर धरातल पर प्रभावी बनाना चाहिए।
अंततः, यह पहल एक संदेश देती है—विकास और पर्यावरण संरक्षण विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं, बशर्ते नीयत और नीति दोनों स्पष्ट हों।




