उत्तराखंड में आधे वाहन अब भी ट्रैकिंग सिस्टम से बाहर, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

Spread the love


उत्तराखंड,आपात स्थिति में यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वाहनों की रियल टाइम निगरानी के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा सभी सार्वजनिक एवं व्यावसायिक वाहनों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) और इमरजेंसी बटन को अनिवार्य किया गया था। यह व्यवस्था खास तौर पर महिलाओं, बच्चों और यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लागू की गई, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में वाहन की तुरंत पहचान और लोकेशन ट्रैक की जा सके। लेकिन उत्तराखंड में इस महत्वपूर्ण योजना का क्रियान्वयन अब भी अधूरा और सवालों के घेरे में है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि जमीनी हकीकत केंद्र सरकार के उद्देश्यों से कोसों दूर है। प्रदेश में इस समय 2,18,741 सक्रिय व्यावसायिक यात्री वाहन सेवा में हैं, लेकिन इनमें से केवल 1,09,724 वाहनों में ही वीएलटीडी डिवाइस लग पाई है। यानी करीब 51 प्रतिशत वाहन ही ट्रैकिंग सिस्टम से जुड़े हैं। वहीं मालवाहक वाहनों की स्थिति और भी चिंताजनक है। प्रदेश में कुल 1,18,208 मालवाहक वाहन पंजीकृत हैं, जिनमें से मात्र 46,685 वाहनों में वीएलटीडी डिवाइस लगी हुई है। यह संख्या कुल का लगभग 40 प्रतिशत ही है। शेष अधिकांश वाहन अब भी सुरक्षा व्यवस्था से बाहर हैं।
यह स्थिति तब है, जब केंद्र सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी पंजीकृत व्यावसायिक वाहनों में वीएलटीडी और इमरजेंसी बटन अनिवार्य रूप से लगाए जाएं, ताकि पुलिस और आपात सेवा एजेंसियों को संकट के समय तत्काल सूचना मिल सके। इसके बावजूद प्रदेश में आदेशों का पालन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पा रहा है। सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह लापरवाही वर्षों से जारी है?
यह सही है कि नए वाहनों में वीएलटीडी डिवाइस पहले से इंस्टॉल होकर आ रही है, लेकिन पुराने वाहनों को इस दायरे में लाने की प्रक्रिया बेहद सुस्त रही है। पूर्व में भी सभी वाहनों में वीएलटीडी लगाने के प्रयास किए गए, लेकिन कभी तकनीकी कारणों का हवाला दिया गया, तो कभी वाहन स्वामियों की अनिच्छा और विभागीय ढिलाई आड़े आती रही। नतीजा यह हुआ कि एक बेहद संवेदनशील सुरक्षा योजना कागजों और फाइलों में ही सिमटकर रह गई।
अब केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को इस विषय को गंभीरता से लेते हुए सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इसी क्रम में उत्तराखंड परिवहन विभाग ने बड़े स्तर पर अभियान चलाने की तैयारी शुरू की है। विभागीय योजना के तहत वाहनों की जांच, वीएलटीडी इंस्टालेशन की निगरानी और नियमों का पालन न करने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही वाहन मालिकों और चालकों को वीएलटीडी के महत्व के बारे में जागरूक करने की भी बात कही जा रही है।
अपर आयुक्त परिवहन एसके सिंह का कहना है कि सड़क सुरक्षा के दृष्टिगत अब वाहनों में वीएलटीडी लगाना सख्ती से सुनिश्चित किया जाएगा। यह बयान स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह सख्ती सिर्फ अभियान और बयानबाजी तक सीमित रहेगी, या वास्तव में जमीनी स्तर पर इसका असर दिखाई देगा?
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां सड़क दुर्घटनाएं, वाहन फंसने और आपात स्थितियां आम हैं, वहां आधे से अधिक व्यावसायिक वाहनों का ट्रैकिंग सिस्टम से बाहर होना बेहद गंभीर चिंता का विषय है। यदि किसी महिला, बच्चे या यात्री के साथ आपात स्थिति उत्पन्न होती है और वाहन वीएलटीडी से लैस नहीं है, तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था निष्प्रभावी हो जाती है।
यह संपादकीय तौर पर स्पष्ट कहना जरूरी है कि वीएलटीडी कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि यात्रियों की जान से जुड़ा मसला है। अब जरूरत है कागजी अभियानों से आगे बढ़कर समयबद्ध, पारदर्शी और सख्त कार्रवाई की। जब तक प्रदेश का हर व्यावसायिक वाहन ट्रैकिंग सिस्टम से नहीं जुड़ता, तब तक सुरक्षा के दावे अधूरे और खोखले ही माने जाएंगे।


Spread the love