

आज मंगलवार है — और समूचा भारत “जय बजरंगबली” के उद्घोष से गूंज रहा है। यह दिन केवल आराधना या व्रत का नहीं, बल्कि आत्मबल के जागरण का प्रतीक है। हमारे धर्मग्रंथों ने हनुमानजी को केवल एक महाकाव्य नायक या भक्ति के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि वेदों के प्राणतत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
हनुमान शक्ति के नहीं — संयम के प्रतीक हैं। वे वेदों में वर्णित “मारुत” हैं, जो प्राणशक्ति का अधिपति है।

हनुमान — आत्मबल का वैदिक स्वरूप
वेद कहते हैं —प्राणो हि जीवितं सर्वं।”
प्राण ही समस्त जीवन का सार है।
हनुमान इसी प्राणशक्ति का मूर्त स्वरूप हैं। जब वे सीता की खोज में लंका पार करते हैं, तो यह केवल भौतिक छलांग नहीं, बल्कि मानव की सीमाओं से परे आत्मशक्ति की उड़ान का प्रतीक है। आज के भारत को इसी उड़ान की आवश्यकता है — जहाँ हम भय, भ्रम और भोग से ऊपर उठकर धर्म, सेवा और सत्य के मार्ग पर लौटें।
हनुमानजी की भक्ति में किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि कर्मनिष्ठा और समर्पण की ऊर्जा छिपी है। उन्होंने कभी चमत्कार दिखाने के लिए शक्ति नहीं दिखाई, बल्कि धर्म की रक्षा और प्रभु के कार्य की सिद्धि के लिए। यही उन्हें वैदिक काल का सबसे आधुनिक चरित्र बनाता है।
आज का भारत और बजरंग चेतना।उत्तराखंड जैसे देवभूमि राज्य में, जहाँ प्रत्येक पर्वत और धारा किसी न किसी देवत्व से जुड़ी है, वहाँ हनुमानजी का महत्व और भी गहरा है। यह भूमि त्याग, सेवा और बलिदान की है — वही गुण जो बजरंगबली के जीवन की आत्मा हैं।
आज जब समाज में युवाओं के मन में भ्रम, निराशा और नकारात्मकता घर करती जा रही है, तब हनुमानजी का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है —
“श्रद्धा रखो, कर्म करो, और भय को त्यागो।”
हनुमान हमें यह सिखाते हैं कि भक्ति केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा का विज्ञान है।
आज के प्रशासक, नेता, शिक्षक और युवा — यदि वे हनुमान की तरह अपनी जिम्मेदारी को ईश्वर-सेवा समझें, तो यह समाज स्वतः मंगलमय बन सकता है।
मंगलवार का वैदिक अर्थ : कर्म का दिवस।मंगलवार शब्द ‘मंगल’ से बना है — जिसका अर्थ है शुभता।
ज्योतिष में यह दिन मंगल ग्रह का है, जो पराक्रम और अनुशासन का कारक है। वैदिक दृष्टि से यह दिन व्यक्ति के भीतर छिपे आत्मबल को जागृत करने का अवसर देता है।
इसीलिए कहा गया —
मंगलवारं हनुमतः पूजनं सर्वसिद्धिदम्।”
मंगलवार को हनुमानजी का पूजन सर्वसिद्धि प्रदान करता है।
जब व्यक्ति मंगलवार को उपवास रखता है, तो वह केवल शरीर को नहीं, बल्कि इच्छाओं की जड़ता को भी वश में करता है। यही साधना का सार है — शरीर और मन का संयम।
आधुनिक भारत में हनुमान — एक सामाजिक दर्शन।आज के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य में, जहाँ छल, लोभ और स्वार्थ का विस्तार हो रहा है, वहीं हनुमानजी का आदर्श हमें सिखाता है —
कि शक्ति का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि सेवा होना चाहिए।
हनुमानजी ने कभी स्वार्थ नहीं साधा; उन्होंने केवल रामकार्य को साधा। यही सिद्धांत आज की राजनीति, प्रशासन और समाज के लिए सबसे बड़ा वैदिक संदेश है।
यदि आज का भारत “रामराज्य” की बात करता है, तो उसे पहले “हनुमान चरित्र” अपनाना होगा —
जहाँ कर्म में समर्पण, शक्ति में संयम और भक्ति में विवेक हो।
केवल यही वह मार्ग है जो धर्मनिष्ठ राज्य की ओर ले जाएगा।
उत्तराखंड के लिए विशेष संदेश।उत्तराखंड का प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक मंदिर “सेवा और भक्ति” की कथा कहता है। यह वही भूमि है जहाँ आंदोलनकारियों ने त्याग और समर्पण से राज्य की नींव रखी।
आज उसी उत्तराखंड में यदि बजरंग चेतना को फिर से जागृत किया जाए —
तो यह राज्य केवल देवभूमि नहीं, बल्कि धर्मभूमि और कर्मभूमि बन सकता है।
हनुमानजी हमें यही सिखाते हैं —
कि जब तक राष्ट्र और समाज के लिए निस्वार्थ कर्म नहीं होगा, तब तक सच्चा मंगल नहीं होगा।
अतः मंगलवार केवल पूजा का नहीं, बल्कि प्रतिज्ञा का दिन है —
धर्म की रक्षा, समाज की सेवा और सत्य की विजय की प्रतिज्ञा।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
मंगल का अर्थ कर्म में है, और कर्म का अर्थ सेवा में।
यही हनुमानजी की सबसे बड़ी शिक्षा है।
✍️ लेखक : अवतार सिंह बिष्ट
संपादक – हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी




