

उत्तराखंड राज्य आंदोलन जब लहू, आंसू, संघर्ष और बलिदान के पन्नों पर लिखा जा रहा था, तब उस संघर्ष की अगली कतार में खड़े थे — वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी, पूर्व कैबिनेट मंत्री, जननायक स्वर्गीय दिवाकर भट्ट जी। उनका राजनीतिक जीवन सत्ता के शिखर पर पहुंचकर भी आंदोलन की जड़ों से अलग नहीं हुआ। वे उन विरल व्यक्तित्वों में थे जो कुर्सी नहीं, जनविश्वास के प्रतीक बने। आज, जब उनकी श्रद्धांजलि यात्रा 1 दिसंबर 2025 से प्रारंभ होकर 6 दिसंबर 2025 को प्रातः 10 बजे हर की पैड़ी, हरिद्वार पर समाप्त होगी, तब पूरा उत्तराखंड केवल एक नेता को नहीं, बल्कि राज्य के संघर्ष, अस्मिता और स्वाभिमान के जीवित प्रतीक को अंतिम प्रणाम देने जा रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
श्रद्धांजलि यात्रा के कुमाऊँ मंडल संयोजक प्रताप सिंह चौहान हैं और सहसंयोजकों की लंबी सूची इस बात का प्रमाण है कि दिवाकर भट्ट जी का संघर्ष किसी एक गांव, शहर या दल का नहीं—पूरे उत्तराखंड का था।
भुवन बिष्ट, भुवन जोशी, मोहन काण्डपाल, श्याम सिंह नेगी, एनडी तिवारी, हरीश मेवाड़ी, मदन सिंह मेर, इन्द्र सिंह मनराल, राम सिंह धामी, दिपेश शर्मा, जीवन सिंह नेगी—यह केवल नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा के ध्वजवाहक हैं जो राज्य निर्माण की भावना को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।

इस यात्रा में प्रदेश के कोने-कोने से वाहनों का अनुशासित और सम्मानजनक रूप से शामिल होना प्रस्तावित है। यह केवल एक अंतिम यात्रा नहीं — यह आदर्शों की विरासत को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प है। प्रत्येक कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक से अनुरोध है कि वे यात्रा में समय पर शामिल होकर अपने कर्तव्य और श्रद्धा का परिचय दें।
रुद्रपुर में बड़ा संकेत — उत्तराखंड क्रांति दल फिर उठ रहा है
आज रुद्रपुर के गांधी पार्क में जो दृश्य बना, वह केवल श्रद्धांजलि का आयोजन नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति के बदलते समीकरणों की घोषणा भी थी।
उधम सिंह नगर के साथ-साथ पूरे प्रदेश में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने अचानक नहीं, बल्कि निरंतर कार्य और वैचारिक प्रतिबद्धता के बल पर अपनी मजबूत पहचान पुनः निर्मित की है। आज की उपस्थिति में दूर-दराज के पहाड़, मैदानी शहर और ग्रामीण अंचलों से आए संघर्षशील चेहरे शामिल थे — जैसे कि:
आनंद सिंह असगोला, मोहन कांति भागुनी, दीपक कुमार अरोड़ा ,बबीता बोरा, इंदु बोरा, बबीता देवी, जानकी जोशी, अच्छाजीवन सिंह नेगी, भानु प्रताप मेहरा (जिला अध्यक्ष), श्याम सिंह नेगी, इंदर सिंह मनराल, हरीश कोटलिया, राजेंद्र जोशी, राजेंद्र गढ़िया, दीपक भाटी, उत्तम सिंह बिष्ट, मोहन सिंह नेगी, अनिल बोरा, प्रेम रैकवार, दीपक कुमार, तरुण पांडे, कमलेश असगोला, लकी उपाध्याय, अनमोल, रितिक चौधरी, विक्की पांडे और अनेक अन्य।
यह केवल नामों की सूची नहीं — यह एक संगठन के पुनर्जागरण की गवाही है।
आज गांधी पार्क में स्पष्ट संदेश दिया गया —
यूकेडी 2027 के चुनाव को भावनात्मक, वैचारिक और जनता के जनसमर्थन के आधार पर लड़ेगी।
कोई गठबंधन, कोई सौदा, कोई समझौता नहीं —
उत्तराखंड पहले — दल, नेता और स्वार्थ बाद में।
दिवाकर भट्ट जी की श्रद्धांजलि यात्रा की शुरुआत रुद्रपुर से होना भी अत्यंत प्रतीकात्मक है —
यही भूमि राज्य आंदोलन की गर्मी और संघर्ष की चेतना को आज भी जिंदा रखती है।
यही कारण है कि यहां से यात्रा के खटीमा के लिए प्रस्थान का संदेश मात्र कार्यक्रम नहीं — एक राजनीतिक व वैचारिक हुकुम है —
कि राज्य आंदोलन की अग्निशिखा धरती से नहीं, जन-जन के हृदय से पुनः उठेगी।
क्यों बढ़ रही यूकेडी की स्वीकार्यता? — जनता का धैर्य अब समाप्त
बीते 24 वर्षों में सत्ता के दोनों बड़े दलों — बीजेपी और कांग्रेस — ने सत्ता बदल-बदलकर शासन तो किया, लेकिन राज्य आंदोलनकारियों, युवाओं, किसानों, बेरोजगारों और पलायन पीड़ितों के दर्द को स्थायी समाधान नहीं दिया।
परिणाम —
✔ पहाड़ खाली हो रहे हैं
✔ युवा बेरोजगारी और माइग्रेशन के चक्र में फंसा है
✔ देवभूमि में जमीनों की लूट, भर्ती घोटाले, शिक्षा और स्वास्थ्य का पतन
✔ राज्य निर्माण के मूल लक्ष्य दरकते नजर आते हैं
ऐसे माहौल में जनता की नजर फिर एक बार अपने मूल दल — उत्तराखंड क्रांति दल की ओर जा रही है।
क्योंकि जनता जानती है कि—
यूकेडी सत्ता के लिए नहीं, आंदोलन के मूल सिद्धांतों की रक्षा के लिए पैदा हुई थी।
आज रुद्रपुर में उमड़ी भीड़ और उत्साह सन् 1994-2000 के दौर की याद दिलाता है —
जब संघर्ष विचार से नहीं, जनचेतना से चलता था।
दिवाकर भट्ट — दोनों पीढ़ियों के बीच सेतु
दिवाकर भट्ट जी की श्रद्धांजलि यात्रा में युवाओं की भागीदारी एक और अत्यंत सकारात्मक संकेत है।
पुरानी पीढ़ी ने संघर्ष देखा, नई पीढ़ी ने संघर्ष की कहानियां सुनीं —
और आज दोनों पीढ़ियां एक साथ चल रही हैं।
राजनीति के लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?
यूकेडी युवा प्रकोष्ठ की मेहनत विशेष रूप से उल्लेखनीय है —
क्योंकि 2027 के चुनाव की असली लड़ाई विचारधारा की नहीं, युवा उम्मीदों की होगी।
6 दिसंबर — केवल श्रद्धांजलि नहीं, एक संकल्प दिवस
जब हर की पैड़ी पर हजारों कार्यकर्ता जलधारा के बीच दिवाकर भट्ट जी को प्रणाम करेंगे, तब यह एक मौन घोषणा होगी —
“राज्य आंदोलन समाप्त नहीं — दिशा बदलकर आगे बढ़ रहा है।”
दिवाकर भट्ट जी की चिता की राख में से वही ऊर्जा उठेगी —
जिसने 1990 के दशक में दिल्ली की सड़कें और मुजफ्फरनगर की धरती को जनआंदोलन की ज्वाला से भर दिया था।
अंत में — यह यात्रा केवल एक नेता की नहीं, एक युग की विदाई है
लेकिन साथ ही यह एक नए युग की शुरुआत भी है।
यूकेडी संगठनात्मक शक्ति, समर्पण और राजनीतिक ईमानदारी के साथ आगे बढ़ रहा है।
गांधी पार्क रुद्रपुर से खटीमा की ओर प्रस्थान करने वाला कारवां केवल श्रद्धांजलि नहीं दे रहा —
वह एक राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक संदेश दे रहा है —
हम राज्य के लिए बने थे — और राज्य के लिए ही जिएंगे।”
यदि यह अनुशासन, एकजुटता, समर्पण और भावनात्मक शक्ति इसी रूप में कायम रही,
तो 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं —
इतिहास को पुनः लिखने का अवसर भी बन सकता है।
कुमाऊँ संयोजक प्रताप सिंह चौहान का बयान।
स्वर्गीय दिवाकर भट्ट जी केवल एक नाम नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जीवित चेतना थे। उनका संपूर्ण जीवन मातृभूमि के सम्मान, राज्य आंदोलनकारियों के अधिकारों तथा जनसंघर्षों को समर्पित रहा। उनके प्रति कृतज्ञता और आत्मिक श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह श्रद्धांजलि यात्रा संपूर्ण कुमाऊँ मंडल के 6 जिलों से होकर गुज़रेगी। यह यात्रा सिर्फ़ स्मरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने का संकल्प है कि जिन त्याग और बलिदानों के बदले हमें यह राज्य मिला, उसे सुरक्षित और सम्मानित रखना हम सबका कर्तव्य है।”
उन्होंने आगे कहा —
“श्रद्धांजलि यात्रा के दौरान सभी जिला मुख्यालयों, आंदोलन स्थलों एवं ऐतिहासिक पड़ावों पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जाएंगी। राज्य आंदोलनकारी, सामाजिक संगठन, युवा, महिलाएं, विद्यार्थी और विभिन्न जनप्रतिनिधि इसमें शामिल होंगे। हर पड़ाव पर हम दिवाकर भट्ट जी के विचारों, संघर्षों और उनके अधूरे सपनों को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे।”
अंत में संयोजक ने भावनात्मक अपील जारी करते हुए कहा —
“यह यात्रा किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, पूरे उत्तराखंड की आत्मा की यात्रा है। हम सभी राज्यप्रेमियों, आंदोलनकारियों और श्रद्धालुओं से निवेदन करते हैं कि अधिक से अधिक संख्या में सम्मिलित होकर दिवाकर भट्ट जी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करें और इस अभियान को सफल बनाएं।”




