

इसलिए लोग बिना किसी चिंता के होली की पूजा और दहन कर सकते हैं. परंपरा के अनुसार, सूरज ढलते ही होली की पूजा की जाती है और उसके बाद लकड़ियों का ढेर जलाया जाता है. यह बुराइयों पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा की शुरुआत शाम को हो रही है. इसलिए होलिका दहन इसी दिन शाम 6 बजे से होगा. पूजा के लिए लोग घर या चौराहे पर लकड़ियां इकट्ठा करते हैं. पूजा में गाय का गोबर, गुड़, अनाज और फूल चढ़ाए जाते हैं. होलिका दहन के बाद लोग अगले दिन रंगों से होली खेलते हैं. यह त्योहार खुशी, रंग और एकता का प्रतीक है.

होली पर पूजा करना आसान है. शाम को स्नान करके साफ कपड़े पहनें. होली के ढेर के सामने बैठकर गणेश-विष्णु का ध्यान करें. गुड़, चावल, फूल और दक्षिणा चढ़ाएं. ‘ओम होलिका देव्यै नमः’ मंत्र जपें. इसके बाद होली जलाएं. जलते ढेर की परिक्रमा करें और मनोकामना मांगें. पूजा खत्म होने पर प्रसाद बांटें.
वसंतोत्सव: होली पहले वसंत का उत्सव थी. फाल्गुन पूर्णिमा पर ठंड खत्म होती है और वसंत आता है. 7वीं सदी में सम्राट हर्ष के नाटक में इसका जिक्र है. अब यह रंगों की होली बन गई है.
दोलयात्रा: पूर्वी भारत में राधा-कृष्ण को झूले पर बिठाकर उत्सव मनाते हैं. मूर्तियों पर अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं और कीर्तन करते हैं. ओडिशा-बंगाल में यह दोल पूर्णिमा कहलाता है.
राधा-कृष्ण के फाग: ब्रज में होली राधा-कृष्ण की लीला का उत्सव है. फाग गाते हैं और भक्ति में डूबते हैं. मथुरा, वृंदावन, बरसाना में यह बहुत खास है.
किसानों का त्योहार: होली नई फसल का जश्न है. किसान गेहूं की बालियां और नई उपज होली में चढ़ाते थे. पूरा गांव मिलकर खुशी मनाता था.
रिश्ते सुधारने का पर्व: होली में पुरानी मनमुटाव भूल जाते हैं. लोग गले मिलते हैं और दोस्ती निभाते हैं. विदेशी अध्ययनकर्ताओं ने भी इसे रिश्तों को मजबूत करने वाला त्योहार बताया है.




