

गुलज्यू मंदिर रुद्रपुर और काशीपुर में आयोजित होली मिलन समारोह केवल पारंपरिक उत्सव भर नहीं रहे, बल्कि वे उत्तराखंड की जीवंत लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और विकास के संकल्प का सशक्त प्रतीक बनकर उभरे। एक ओर काशीपुर नगर निगम परिसर में आयोजित भव्य रंगोत्सव में प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनसमुदाय के साथ होली की खुशियाँ साझा कीं, वहीं दूसरी ओर रुद्रपुर के गोल्ज्यू मंदिर परिसर में पर्वतीय समाज द्वारा शैल सांस्कृतिक समिति के माध्यम से आयोजित होली मिलन समारोह ने अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रेरक संदेश दिया।
काशीपुर में रंग, परंपरा और विकास का समागम
काशीपुर में मुख्यमंत्री का स्वागत पुष्पवर्षा और उत्साहपूर्ण जनभागीदारी के साथ हुआ। कार्यक्रम में पारंपरिक कुमाऊँनी होली, शास्त्रीय होली और भजन गायन की प्रस्तुतियों ने वातावरण को आध्यात्मिक उल्लास से भर दिया। मुख्यमंत्री ने स्वयं भी होली गायन में भाग लेकर यह संदेश दिया कि नेतृत्व केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति के साथ सहभागी होने में भी है।
अपने संबोधन में उन्होंने होली को केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक बताया। उन्होंने अपने बचपन की होली की स्मृतियाँ साझा करते हुए ग्रामीण सामूहिकता की उस भावना को याद किया, जहाँ ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं था और ढोल-दमाऊँ की थाप पर पूरा गांव एक रंग में रंग जाता था। यह स्मरण केवल भावनात्मक प्रसंग नहीं था, बल्कि बदलते समय में सामाजिक समरसता को बनाए रखने की आवश्यकता का संकेत भी था।
मुख्यमंत्री ने काशीपुर के विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए 133 एकड़ में विकसित हो रहे इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर, औद्योगिक हब, अरोमा पार्क, चार लेन सड़क परियोजना, मिनी बाईपास और पेयजल-सीवरेज जैसी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास केवल कागज़ी घोषणाओं तक सीमित न रहकर धरातल पर दिखना चाहिए। सांस्कृतिक मंच से विकास का यह संदेश इस बात को पुष्ट करता है कि उत्तराखंड में परंपरा और प्रगति को समानांतर आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
रुद्रपुर में लोकसंस्कृति का आत्मीय उत्सव
दूसरी ओर रुद्रपुर के गोल्ज्यू मंदिर में पर्वतीय समाज द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह ने सांस्कृतिक आत्मीयता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। शैल सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल, भरत लाल शाह, एडवोकेट लीलांबर जोशी, राजेंद्र सिंह बोहरा, जगदीश बिष्ट, दीपक पांडे, मोहिनी बिष्ट सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि पर्वतीय समाज अपनी लोकधरोहर को जीवित रखने के लिए सजग है। कुमाऊँनी होली केवल गीतों का क्रम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक साधना है—जहाँ राग, भक्ति और सामाजिक संवाद का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। होलियारों की सामूहिक प्रस्तुति ने यह दर्शाया कि आधुनिकता की दौड़ में भी लोकसंस्कृति का स्वर मद्धिम नहीं पड़ा है।
संस्कृति: पहचान और सामाजिक एकता का आधार
इन दोनों आयोजनों को यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि होली जैसे पर्व समाज को जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। आज जब सामाजिक विभाजन, राजनीतिक मतभेद और वैचारिक टकराव बढ़ते दिखते हैं, तब ऐसे सांस्कृतिक आयोजन सामूहिकता का नया आधार निर्मित करते हैं।
होली का संदेश केवल रंग लगाने तक सीमित नहीं है। यह मन के विकारों को दूर कर आपसी विश्वास को पुनर्स्थापित करने का अवसर है। मुख्यमंत्री द्वारा युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का आह्वान और रुद्रपुर में पर्वतीय समाज द्वारा लोकगीतों के माध्यम से सांस्कृतिक संरक्षण—दोनों प्रयास एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं।
विकास और विरासत का संतुलन
काशीपुर को ‘देवभूमि का प्रवेश द्वार’ बताते हुए उसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने की बात कही गई। यह दृष्टिकोण केवल आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन और आध्यात्मिक पहचान को भी महत्व देता है। यदि औद्योगिक हब और अरोमा पार्क स्थानीय युवाओं को रोजगार देंगे, तो चैती मंदिर और सांस्कृतिक आयोजन उन्हें अपनी पहचान से जोड़ेंगे।
यह संतुलन ही उत्तराखंड की विशिष्टता है—जहाँ पहाड़ की सादगी और आधुनिक विकास साथ-साथ चलते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि विकास योजनाओं में स्थानीय संस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
जनभागीदारी ही सफलता की कुंजी
दोनों आयोजनों में जनता की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि समाज केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि सहभागी बनकर आगे बढ़ना चाहता है। जब आम नागरिक, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि एक मंच पर मिलते हैं, तभी लोकतंत्र की वास्तविक भावना प्रकट होती है।
रुद्रपुर और काशीपुर के ये होली मिलन समारोह हमें याद दिलाते हैं कि उत्सव केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि संवाद, चिंतन और सामूहिक संकल्प का भी माध्यम हो सकते हैं। यदि हम इन आयोजनों की आत्मा को समझें, तो पाएँगे कि यह केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने की गंभीर प्रक्रिया है।
होली का पर्व हमें यह सिखाता है कि विविधताओं के बीच भी एकता संभव है। काशीपुर में मुख्यमंत्री की सहभागिता और रुद्रपुर में पर्वतीय समाज का सांस्कृतिक समर्पण—दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि उत्तराखंड की पहचान उसकी संस्कृति, सामूहिकता और विकास के संतुलित दृष्टिकोण में निहित है।
अब चुनौती यह है कि इन आयोजनों से निकले संदेश केवल मंचीय भाषणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज के व्यवहार में उतरें। जब रंगों के साथ विश्वास भी घुलेगा, जब विकास के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ेगी, तभी उत्तराखंड वास्तव में समृद्ध, स्वच्छ और सांस्कृतिक रूप से सशक्त राज्य बन सकेगा।





