

पहाड़ों की खड़ी होली: लोकधुनों में बसंत, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना का उत्सव
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में जैसे ही बसंत दस्तक देता है, ढोल-दमाऊ की थाप पर एक सांस्कृतिक यात्रा शुरू हो जाती है—खड़ी होली की। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि लोकसंगीत, सामूहिकता और सामाजिक संवाद का जीवंत मंच है। ब्रज के बाद यदि कहीं होली अपनी परंपरा, शास्त्रीयता और लोकधुनों के अनूठे संगम के लिए पहचानी जाती है, तो वह है कुमाऊं और गढ़वाल की धरती।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: चंद राजाओं से लोक तक
खड़ी होली की परंपरा का संबंध 16वीं सदी के कुमाऊं नरेश कल्याण चंद के काल से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि उनके शासनकाल में दरबारों में होली गायन की परंपरा प्रारंभ हुई, जिसे बाद में चंद वंश के अन्य शासकों ने संरक्षण दिया। समय के साथ यह परंपरा राजदरबार से निकलकर गांव-गांव पहुंची और लोकजीवन का हिस्सा बन गई।
18वीं सदी में प्रद्युमन शाह द्वारा बाहर से संगीतज्ञों को आमंत्रित करने के बाद बैठकी होली में शास्त्रीय रागों का प्रभाव बढ़ा, लेकिन खड़ी होली ने अपनी लोकधारा को कायम रखा। यही कारण है कि खड़ी होली को गांवों की आत्मा कहा जाता है।
गढ़वाल में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मातृभाषा गढ़वाली के संरक्षण का जीवंत माध्यम है। यहां होली के गीत शुद्ध गढ़वाली में गाए जाते हैं, जिनमें लोकजीवन, प्रकृति, प्रेम और भक्ति की झलक मिलती है। ढोल-दमाऊ की थाप पर जब होल्यार पारंपरिक धुनों में स्वर मिलाते हैं, तो यह केवल संगीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति बन जाता है। बदलते दौर में जहां स्थानीय भाषाएं उपेक्षा का शिकार हो रही हैं, वहां गढ़वाली होली अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देती है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि भाषा ही हमारी पहचान और विरासत की सबसे मजबूत कड़ी है।
खड़ी होली क्या है?
‘खड़ी’ शब्द का अर्थ ही है—खड़े होकर गाना। इसमें होल्यार गोल घेरा बनाकर खड़े होते हैं, ढोल-दमाऊ, हुड़का और मंजीरों की संगत में गीत गाते हैं। एक मुख्य गायक मुखड़ा उठाता है और शेष टोली उसे सामूहिक स्वर में दोहराती है। यह शैली केवल संगीत नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा का संचार है।
बसंत पंचमी से इसकी शुरुआत होती है। आंवला एकादशी को चीर बंधन के साथ औपचारिक शुभारंभ होता है। पूर्णिमा तक यह उत्सव गांव-गांव घूमता है और चीर दहन के साथ समापन होता है। इस दौरान हर घर में होल्यार पहुंचते हैं, आशीर्वाद देते हैं और रंग-गुलाल से उल्लास साझा करते हैं।
बैठकी और खड़ी: दो धाराएं, एक संस्कृति
जहां बैठकी होली शास्त्रीय रागों—काफी, झिंझोटी, श्यामकल्याण—में बैठकर गाई जाती है, वहीं खड़ी होली लोकधुनों पर आधारित है। बैठकी को ‘नागर होली’ भी कहा जाता है, जबकि खड़ी होली ग्रामीण आत्मा की अभिव्यक्ति है। दोनों मिलकर उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को पूर्णता देते हैं।
स्वांग और सामाजिक व्यंग्य
खड़ी होली केवल गीत-संगीत नहीं; इसमें ‘स्वांग’ और ‘ठेठर’ की परंपरा भी शामिल है। लोक कलाकार हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर चोट करते हैं। महिलाएं भी अपनी बैठकी होली में अंग्रेज, साहब या समकालीन पात्रों का रूप धरकर सामाजिक संदेश देती हैं। यह परंपरा बताती है कि पहाड़ की संस्कृति केवल भावुक नहीं, बल्कि सजग और आलोचनात्मक भी है।
नेपाल और प्रवासी समाज तक प्रभाव
कुमाऊं की खड़ी होली का प्रभाव नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों तक दिखाई देता है। देहरादून, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों में बसे प्रवासी उत्तराखंडी भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। देहरादून स्थित गढ़वाल मंडल की टीम इन दिनों सक्रिय है, जबकि एक टोली दिल्ली रवाना हो चुकी है। यह सांस्कृतिक निरंतरता बताती है कि खड़ी होली केवल भौगोलिक नहीं, भावनात्मक विरासत है।
रुद्रपुर और हल्द्वानी में आयोजन
इस वर्ष 27 फरवरी 2026 को रुद्रपुर में जगदीश बिष्ट और राजेंद्र बोहरा के आवास पर खड़ी होली का आयोजन प्रस्तावित है। वहीं 1 मार्च को शैल प्ल सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल के नेतृत्व में भव्य कार्यक्रम होगा। प्रत्येक वर्ष रुद्रपुर में यह परंपरा पूरे उत्साह से निभाई जाती है, जिसमें शहर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में होल्यार भाग लेते हैं।
हल्द्वानी में देवभूमि व्यापार मंडल के अध्यक्ष हुकम सिंह कुमाऊँ द्वारा भी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर खड़ी होली के आयोजन की घोषणा की गई है। इससे स्पष्ट है कि यह पर्व अब केवल ग्रामीण उत्सव नहीं, बल्कि शहरी सांस्कृतिक कैलेंडर का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
सामाजिक एकता का सूत्र
गोरखा आक्रमण के कठिन काल में भी खड़ी होली की परंपरा बाधित नहीं हुई। यह उत्सव संकट के समय सामूहिकता और मनोबल का प्रतीक बना रहा। आज जब समाज जाति, वर्ग और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है, खड़ी होली एक साझा मंच प्रदान करती है जहां सभी भेद मिट जाते हैं।
आधुनिकता और चुनौती
डिजिटल युग में जब त्योहार ‘इंस्टाग्राम स्टोरी’ तक सीमित होते जा रहे हैं, खड़ी होली सामूहिक उपस्थिति और प्रत्यक्ष संवाद का महत्व याद दिलाती है। हालांकि चुनौतियां भी हैं—युवाओं का पलायन, पारंपरिक वाद्ययंत्रों का अभाव, और सांस्कृतिक आयोजनों में घटती भागीदारी। फिर भी प्रवासी समाज और स्थानीय समितियों के प्रयास इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
रंगों से परे एक सांस्कृतिक संकल्प
खड़ी होली पहाड़ की जीवंत विरासत है—जहां गीतों में राधा-कृष्ण की लीलाएं हैं, तो स्वांग में समकालीन राजनीति पर कटाक्ष भी। यह पर्व बताता है कि संस्कृति स्थिर नहीं होती; वह समय के साथ संवाद करती है।
रुद्रपुर, हल्द्वानी, देहरादून से लेकर दिल्ली तक गूंजती खड़ी होली की धुनें इस बात का प्रमाण हैं कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा आज भी जीवित है। बसंत की यह बयार केवल रंग नहीं लाती, बल्कि एक संदेश भी देती है—एकता, उल्लास और लोक परंपरा को संजोए रखने का।
जब ढोल की थाप पर होल्यार स्वर मिलाते हैं—“आजु ब्रज में होली रे रसिया”—तो पहाड़ की वादियां सचमुच आत्मविभोर हो उठती हैं। यही है खड़ी होली का असली रंग।




