सूत्रों की मानें तो हरक सिंह रावत की चाबी भाजपा के बड़े नेता ने भरी!धामी सरकार और उत्तराखंड का राजनीतिक परिदृश्य

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सूत्रों की मानें तो हरक सिंह रावत की चाबी भाजपा के बड़े नेता ने भरी!पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के खनन फंड को लेकर दिए गए ताज़ा बयान ने उत्तराखंड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हरक सिंह रावत का यह अचानक “सत्योद्घाटन” महज़ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे भाजपा के ही किसी बड़े नेता की “चाबी” लगी हुई है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)

सूत्र बताते हैं कि भाजपा के भीतर ही कुछ दिग्गज नेता धामी सरकार की मजबूती से असहज हैं और ऐसे बयान दिलवाकर माहौल बनाने की कोशिश में लगे हैं। इसी वजह से हरक सिंह रावत का बयान “जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना” वाली कहावत पर सटीक बैठता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के अंदरूनी समीकरण और कांग्रेस की गुटबाज़ी—दोनों ने ही हरक को “बयानवीर” बनने का मौका दिया है। जनता में भी चर्चा यही है कि हरक सिंह रावत अब खुद से नहीं, बल्कि दूसरों के इशारों पर ही बोलते हैं। सवाल यह है कि आखिर भाजपा के भीतर से कौन-सा बड़ा नेता हरक सिंह की चाबी भरकर उन्हें बार-बार “सक्रिय” कर रहा है?


यह खबर केवल “आरोप–प्रत्यारोप” की नहीं बल्कि उत्तराखंड की राजनीति के बदलते चरित्र की भी गवाही है। पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत का खनन फंड प्रकरण को लेकर भाजपा पर हमला दरअसल वही पुराना “जितनी चाबी भरोगे उतना चलेगा खिलौना” वाला खेल है। हरक सिंह की राजनीति भी आज एक ऐसे स्प्रिंग वाले खिलौने जैसी लग रही है, जिसे बीच-बीच में कोई “राजनीतिक खिलौना निर्माता” चाबी भर देता है और फिर वे मंच से उछल-उछल कर बयान देने लगते हैं। सवाल यह है कि यह चाबी कौन भर रहा है और क्यों?

हरक सिंह अब उत्तराखंड की राजनीति के “बयानवीर” बन चुके हैं, जिनकी स्क्रिप्ट और टाइमिंग कोई और तय करता है।कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, और कभी अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश—असल में वे अवसरवादी राजनीति के “बार्टर सिस्टम” का ही हिस्सा हैं।उनका हर बयान इस बात का आईना है कि वे अब केवल सुर्खियां बटोरने के लिए सक्रिय हैं, न कि मुद्दों पर।”30 करोड़ की एफडी” का आरोप लगाने वाले हरक यह भूल जाते हैं कि खुद उन्होंने मान लिया कि उसी सिस्टम का हिस्सा वे भी थे।जनता में उनकी छवि अब “राजनीतिक प्रवासी पंछी” की बन चुकी है, जो मौसम देखकर दल बदलता है।ईडी जांच” की मांग भी जनता को मजाक लगती है, क्योंकि खुद को भी दोषी ठहराना एक तरह से “सफाई से ज्यादा खुद की गवाही” है।सोशल मीडिया पर उनके बयानों को लेकर जनता ने व्यंग्य कसना शुरू कर दिया है कि “हरक सिंह वही बोलते हैं जितनी चाबी भरी जाती है।

कौन भर रहा है चाबी?यह चाबी फिलहाल कांग्रेस की आंतरिक राजनीति भर रही है, जहां हरक सिंह खुद को फिर से “महत्वपूर्ण खिलाड़ी” साबित करना चाहते हैं। प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में सुर्खियां बटोरना उनका मकसद है। कांग्रेस के भीतर “हरीश रावत बनाम शेष नेतृत्व” की रस्साकशी में हरक सिंह खुद को वजनदार बनाना चाहते हैं।

जनता क्यों ले रही है हल्के में?क्योंकि उत्तराखंड की जनता जानती है कि हरक सिंह न तो कांग्रेस में स्थायी चेहरा हैं और न भाजपा में विश्वसनीय। उनकी राजनीति अवसरवाद की मिसाल रही है। यही कारण है कि उनके आरोपों को जनता मजाक से ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती।


आज धामी सरकार “युवाओं की ऊर्जा और विकास की दृष्टि” से पहचानी जाती है। उन्होंने नौजवानों की भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, महिला सुरक्षा, पर्यटन और धार्मिक आस्था से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम किया है।

जहां एक ओर हरक सिंह रावत जैसे नेता “आरोप और बयानवीरता” से अपनी प्रासंगिकता तलाश रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री धामी अपनी कामकाजी छवि से जनता के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। उनकी “फुटवर्क” शैली और जमीनी कार्यशैली ने उन्हें जनता के बीच “युवा, ईमानदार और कर्मशील मुख्यमंत्री” के रूप में स्थापित किया है।


उत्तराखंड की राजनीति में आज साफ अंतर दिखता है—एक तरफ हरक सिंह रावत जैसे नेता हैं, जो “चाबी वाले खिलौने” की तरह बयान देते रहते हैं।दूसरी ओर पुष्कर सिंह धामी जैसे युवा नेतृत्व हैं, जो भविष्य की ओर दृष्टि रखते हुए राज्य के विकास का एजेंडा चला रहे हैं।



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