राम गोपाल मिश्रा मर्डर मामला और बहराइच हिंसा मामले में नजदीक से गोली मारने वाले को फाँसी की सजा, 9 लोगों को उम्रकैद की सजा दी गई ।

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बहराइच कोर्ट ने 11 दिसंबर 2025 को राम गोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या करने वाले सरफराज को फाँसी की सजा दी है।

हत्या करने में साथ देने वाले सरफराज के पिता अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब समेत 9 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

13 अक्टूबर 2024 को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान हुई इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह फैसला फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज पवन कुमार शर्मा ने सुनाया। फैसले में कोर्ट ने न सिर्फ आरोपितो के गुनाह या बेगुनाही को दर्ज किया, बल्कि बारी-बारी से यह भी बताया कि कैसे एक धार्मिक जुलूस पर हमला किया गया और उसे बहुत बेरहमी, आतंक और पूरे जिले में लंबे समय तक कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की स्थिति में बदल दिया गया। ऑपइंडिया ने इस फैसले को पढ़ा है।

चूंकि राम गोपाल मिश्रा के छत से हरा झंडा फाड़ने के वीडियो थे, इसलिए इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हत्या को सही ठहराया था। हालाँकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर बहस के लिए यह मान भी लिया जाए कि राम गोपाल ने अब्दुल हमीद के घर पर लगे धार्मिक झंडे को जबरन हटाया था, तो भी ऐसा काम आरोपितो को बेरहम और बर्बर हिंसा करने का कोई हक नहीं दे सकता।

फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि अब्दुल हामिद को दिया गया लाइसेंस वाला हथियार सिर्फ सेल्फ़-डिफेंस के लिए था, इसका इस्तेमाल करना साफ तौर पर कानून का उल्लंघन था। कोर्ट ने कहा कि कानूनी सिस्टम में ऐसी किसी भी मामले की शिकायत करने का रास्ता है, और किसी भी व्यक्ति या ग्रुप को लिंचिंग करके कानून अपने हाथ में लेने का हक नहीं देता है।

राम गोपाल मिश्रा शाम को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस देखने महाराजगंज बाजार गए थे। उनके साथ उनके भाई हरिमिलन मिश्रा और दूसरे रिश्तेदार और गाँव वाले भी थे। जुलूस में गाँव की कई मूर्तियां ट्रैक्टर और गाड़ियों पर रखी गई थीं और यह तय रास्ते से होते हुए बाजार से गुजरे।

जैसे ही जुलूस महाराजगंज में अब्दुल हमीद के घर के सामने पहुँचा, तो जुलूस के साथ बज रहे DJ के गानों पर एतराज जताया गया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि इससे पहले गणेश चतुर्थी विसर्जन जुलूस को भी इसी जगह पर रोका गया था। हालाँकि घटना हिंसक नहीं हुई, क्योंकि स्थानीय लोगों के दखल के बाद जुलूस को आगे बढ़ने का रास्ता दे दिया। गवाहों के बयानों के मुताबिक, म्यूजिक बंद करने की माँग की गई थी। जब हिंदुओं ने DJ बंद करने से मना कर दिया, तो DJ का तार खींच दिया गया, जिससे तुरंत झगड़ा शुरू हो गया।

– सेशंस कोर्ट

कोर्ट के मुताबिक, टकराव जल्द ही अफरा-तफरी में बदल गया। छत से जुलूस पर पत्थर, ईंटें और बोतलें फेंकी गईं। जुलूस में दहशत फैल गई, क्योंकि लोग सुरक्षित जगह की ओर भागे। जैसे ही इलाके में डर का माहौल बना, दुकानदारों ने जल्दी से अपनी दुकानें बंद कर दीं।

इस अफरा-तफरी के बीच राम गोपाल मिश्रा को ज़बरदस्ती पकड़कर अब्दुल हमीद के घर के अंदर घसीटा गया। कोर्ट के मुताबिक, कई चश्मदीदों ने बताया कि उन्हें अंदर खींचने के बाद दरवाजा बंद कर दिया गया था। कुछ देर बाद, घर के अंदर से गोलियों की आवाज सुनाई दी।

गवाहों के मुताबिक, एक के बाद एक कई राउंड गोलियाँ चलाई गईं। कोर्ट ने कहा कि इस बात पर कोई शक नहीं है कि फायरिंग घर के अंदर से हुई थी और राम गोपाल मिश्रा को पास से गोली मारी गई थी।

जब राम गोपाल मिश्रा को आखिरकार उनके रिश्तेदारों ने बाहर निकाला, तो वह गंभीर रूप से घायल थे। खास बात यह है कि जब राजन और किशन राम गोपाल को अब्दुल हमीद के घर से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे, तो उन पर भी दो राउंड गोलियाँ चलाई गई।

राम गोपाल मिश्रा को बहराइच के जिला अस्पताल ले जाया गया। हालाँकि चोट की वजह से उनकी मौत हो गई। इस घटना से इलाके में बहुत ज्यादा डर फैल गया। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज बाजार में पूरी तरह से अफरा-तफरी मच गई। लोग इलाके से भाग गए। घर और दुकानें बंद हो गईं। गवाहों ने माहौल को डर और दहशत का बताया।

Bahraich District Court

भाई हरि मिलन मिश्रा ने कराई थी FIR

इस मामले में FIR राम गोपाल मिश्रा के भाई हरि मिलन मिश्रा की शिकायत पर दर्ज की गई थी। उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और एक ऑफिशियल शिकायत दर्ज कराई कि कैसे उनके भाई को अब्दुल हामिद के घर में घसीटा गया और गोली मार दी। अपनी शिकायत में उन्होंने हामिद, उसके बेटों और अन्य को हमलावर बताया। उन्होंने यह भी बताया कि मौके पर कुछ लोग मौजूद थे जिन्हें वह नहीं जानते थे।

ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने बार-बार FIR की टाइमिंग पर शक जताने की कोशिश की और दावा किया कि यह ‘गलत समय पर’ की गई थी। घटना को ही मनगढ़ंत बताया। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि हालात को देखते हुए ये स्वाभाविक था कि हरिमिलन मिश्रा पहले अपने घायल भाई को अस्पताल ले गए, उसके बाद एफआईआर दर्ज कराई।

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि इस घटना से जिले में अफरा-तफरी मच गई थी। बहराइच में कई दिनों तक इंटरनेट सर्विस बंद कर दी गई थीं। जिले के बाहर से RAF और PAC समेत और पुलिस फोर्स तैनात की गई थी। ऐसे में FIR के फॉर्मल रजिस्ट्रेशन में देरी होना भी था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपित के खिलाफ पूरी जाँच और ट्रायल के दौरान एक जैसे रहे। बचाव पक्ष कथित देरी से पैदा होने वाला कोई भी बड़ा उलटफेर या हेरफेर दिखाने में नाकाम रहा।

राम गोपाल मिश्रा कौन थे ?

हालाँकि जजमेंट मुख्य रूप से केस के तथ्य पर आधारित हैं, लेकिन इसने राम गोपाल मिश्रा को सिर्फ एक आँकड़ा नहीं माना। सजा सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि राम गोपाल की शादी घटना से कुछ महीने पहले ही हुई थी। उनकी अचानक और हिंसक मौत ने न सिर्फ एक जिंदगी खत्म कर दी, बल्कि एक पूरे परिवार को तोड़ दिया, जिससे उनकी पत्नी का भविष्य भी प्रभावित हुआ।

कोर्ट ने कहा कि जब राम गोपाल को घर के अंदर घसीटा गया तो वह बिना हथियार के और बेबस थे। जुलूस की अफरा-तफरी के दौरान बाहर जो भी हुआ हो, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक बार जब वह घर के अंदर थे, तो पास से कई राउंड फायरिंग करने की घटना ने सारी हदें पार कर दी।

बचाव पक्ष की शुरुआती कहानी और वीडियो का जिक्र

बहस के दौरान, बचाव पक्ष ने एक अलग कहानी पेश करने की कोशिश की। उन्होंने उन वीडियो का जिक्र किया, जिनमें कथित तौर पर राम गोपाल मिश्रा को अफरा-तफरी के दौरान छत पर चढ़ते या झंडा फाड़ते हुए दिखाया गया था। ये बातें कोर्ट के सामने उकसावे या घटनाओं के एक अलग क्रम का सुझाव देने की कोशिश के तौर पर रखी गईं।

ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने न सिर्फ हमलावरों की पहचानने, बल्कि राम गोपाल को कैसे मारा गया, इसको लेकर भी बड़ी संख्या में गवाहों से पूछताछ की। फैसलों में काफ़ी जगहों पर उन चश्मदीदों के बयानों को समीक्षा भी की गई, जो दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान मौजूद थे और घटना वाले दिन हिंसा को होते हुए देखा था।

हरिमिलन ने अपनी शपथ के साथ गवाही में कोर्ट को बताया कि वह, राम गोपाल, राजन और किशन समेत दूसरे रिश्तेदारों के साथ, मूर्ति विसर्जन देखने के लिए महाराजगंज बाजार गए थे। उसने साफ-साफ कहा कि जब जुलूस वहाँ पहुँचा, तो अब्दुल हमीद, उसके बेटे सरफ़राज़ उर्फ़ रिंकू और फ़हीम, और दूसरे लोग उनके घर के सामने मौजूद थे। उसने बताया कि कैसे राम गोपाल को जबरदस्ती घर के अंदर घसीटा गया।

हरिमिलन ने बताया कि जब उनके भाई को अंदर घसीटा गया, तो दरवाजा बंद कर दिया गया, और उन्होंने अंदर से कई राउंड गोलियों की आवाज सुनी। अचानक हुई गोलीबारी और फैली घबराहट के कारण वह और दूसरे लोग तुरंत बीच-बचाव नहीं कर पाए।

राम गोपाल के चचेरे भाई राजन मिश्रा ने हरिमिलन मिश्रा की गवाही की पुष्टि की। वह भी राम गोपाल को ज़िला अस्पताल ले गए थे, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

इस मामले के एक और चश्मदीद अभिषेक मिश्रा ने सरकारी वकील के केस को और मजबूत किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने राम गोपाल को जुलूस से घसीटते हुए देखा था और उन्हें घर के अंदर खींचने में कई आरोपित शामिल थे। उन्होंने आगे कहा कि जब राम गोपाल को बाहर लाया गया, तो उनके शरीर के ऊपरी हिस्से और सिर पर गोली लगने के निशान साफ दिख रहे थे।

मामले के एक और चश्मदीद गवाह शशिभूषण अवस्थी ने कोर्ट को बताया कि कैसे DJ का तार खींचा गया, जिससे झगड़ा शुरू हुआ। उन्होंने कोर्ट को बाज़ार में फैले डर के बारे में भी बताया। खास बात यह है कि उन्होंने गवाही दी कि हिंसा सिर्फ फायरिंग तक ही नहीं रुकी, बल्कि जिस तरह से राम गोपाल मिश्रा पर हमला हुआ, उससे पता चलता है कि बहुत ज्यादा क्रूरता हुई।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि सभी चश्मदीद गवाह एकतरफा गवाह देने वाले थे, क्योंकि वे उसी गाँव के थे या मरने वाले राम गोपाल के रिश्तेदार थे। तय कानूनी सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ रिश्ता होने से कोई गवाह भरोसे के लायक नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि पब्लिक जुलूसों के दौरान होने वाली घटनाओं में, यह आम बात है कि वहाँ मौजूद और प्रभावित लोग रिश्तेदार या जान-पहचान वाले होंगे। मायने यह रखता है कि उनकी गवाही एक जैसी, भरोसेमंद और अलग सबूतों से सही है या नहीं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बताया गया गोलियों से हुई मौत

शायद फैसले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा मेडिकल सबूत था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हिंसा का ऐसा लेवल सामने आया जिसे कोर्ट ने बार-बार बेरहम, क्रूर और आत्मा को झकझोरने वाला बताया।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, राम गोपाल के शरीर पर बंदूक घुसने के चालीस घाव थे। ये सिर्फ़ एक जगह तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि शरीर के जरूरी हिस्सों में फैले हुए थे। छाती, गर्दन, चेहरे और ऊपरी अंगों पर अंदर घुसने के कई घावों के साथ-साथ बाहर निकलने के भी दो घाव थे। घावों के किनारों पर कालापन दिख रहा था, जिससे पता चलता है कि गोलियां पास से चलाई गई थीं। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि पास से गोली चलाने से गलती से या भटकी हुई गोलियों के लगने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

Source: Bahraich District Cour

मेडिकल जाँच में दोनों पैरों की उंगलियों पर गहरे जलने के निशान मिले। कोर्ट ने बताया कि पैर की उंगलियाँ इतनी जल गई थीं कि नाखून निकल आए थे। आँखों के ऊपर एक कटा हुआ घाव था, जो किसी सामान से हुआ था। अंदर से दोनों फेफड़े क्षतिग्रस्त पाए गए। इनमें कई गड्ढे थे, जिसमें लगभग 2.5 लीटर खून और थक्के थे। दिल में भी खून का थक्का जमा हुआ था। मौत गोली लगने से हुए शॉक और ब्लीडिंग से हुई थी।

कोर्ट ने देखा कि मेडिकल सबूतों ने बचाव पक्ष की इस बात को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया कि राम गोपाल को शायद एक बार या अफरा-तफरी के दौरान गलती से गोली लगी होगी। इतने सारे घाव, पास से गोली लगने के निशान, और दूसरी चोटों से यह साबित हो गया कि हमला जानबूझकर किया गया था, लगातार किया गया था, और इसका मकसद मौत पक्की करना था।

बचाव पक्ष की दलीलें बनाम मेडिकल सच्चाई

बचाव पक्ष की एक मुख्य दलील यह थी कि पोस्टमॉर्टम में तलवार या धारदार हथियार से लगी चोटों का साफ तौर पर पता नहीं चला। कोर्ट ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि कुछ खास तरह की चोटों का न होना

बचाव पक्ष का केस कमजोर नहीं करता, अगर मौत का कारण साफ तौर पर फायरआर्म से लगी चोटों से जुड़ा होता। कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही कुछ चोटें किसी कुंद चीज या जलने से लगी हों, लेकिन कई गोलियों के घावों बिना किसी शक के मर्डर साबित करने के लिए काफी थे।

कोर्ट ने डिफेंस के उन दावों पर भी ध्यान दिया कि राम गोपाल छत पर चढ़ गया था या झंडे को हटा दिया था, जिससे किसी अनजान आदमी ने फायरिंग की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी दलीलें अंदाज पर आधारित हैं और भरोसेमंद सबूतों का समर्थन नहीं करते हैं।

इससे भी जरूरी बात यह है कि कोर्ट ने माना कि जुलूस के दौरान अफरा-तफरी या उकसावे की बात मानकर भी, किसी बिना हथियार वाले व्यक्ति पर पास से कई राउंड फायरिंग करने को कोई भी वजह या सही नहीं ठहरा सकता।

कोर्ट मौत की सजा के नतीजे पर कैसे पहुँचा

राम गोपाल मिश्रा की हत्या के बाद पुलिस तुरंत एक्शन में आ गई। इस घटना ने न सिर्फ क्रिमिनल जाँच शुरू कर दी थी, बल्कि पूरे जिले में लॉ एंड ऑर्डर इमरजेंसी भी लगा दी थी। इंटरनेट सर्विस रोक दी गई थीं, और फोर्स बुलाई गई थी। पूरा जिला कई दिनों तक कानून व्यवस्था से जुड़ा रहा। इस बैकग्राउंड में, पुलिस ने FIR में नामजद आरोपितों की इंटेंसिव तलाश शुरू की।

जाँच के दौरान, पुलिस टीमों को खास इंटेलिजेंस इनपुट मिले, जिससे पता चला कि कुछ आरोपी नेपाल बॉर्डर की ओर भागने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने जानकारी पर एक्शन लिया, और आरोपितों को पकड़ने के लिए लोकल पुलिस और SOG यूनिट्स समेत कई टीमें बनाई गईं।

17 अक्टूबर 2024 को ऑफिसर एक आइसक्रीम फैक्ट्री और उससे सटे एक आराम करने की जगह के पास के इलाके में पहुँचे। अब्दुल हामिद और उसके बेटों सरफराज, फहीम और तालिब समेत चार आरोपितों को पकड़ लिया गया। पूछताछ के दौरान, आरोपितों ने पुलिस को हत्या में इस्तेमाल हथियार के बारे में बताया, जो अब्दुल हमीद की लाइसेंसी 12-बोर SBBL गन थी। इसे नहर पुल के पास छिपाया गया था। जानकारी के आधार पर एक रिकवरी ऑपरेशन की योजना बनाई गई।

जब पुलिस सरफराज और तालिब को हथियार बरामद करने के लिए ले गई, तो उन्होंने भागने की कोशिश की। उन्होंने पुलिस वालों को धक्का दिया, छूट गए, और छिपे हुए हथियार से पुलिस टीम पर फायरिंग की। पुलिस ने खुद के बचाव में जवाबी कार्रवाई की, और उनके पैरों में गोली लगी। मौके से पुलिस ने गन, बैरल में फँसा एक फायर किया हुआ कारतूस, और एक जिंदा कारतूस बरामद किया।

कोर्ट ने कहा कि फोरेंसिक साइंस लैब ने बाद में कन्फर्म किया कि राम गोपाल मिश्रा के शरीर से मिली गोलियां उसी हथियार से चलाई गई थीं। फैसले के मुताबिक, इस रिकवरी ने आरोपितों को सीधे हत्या से जोड़ा और गोली के सोर्स के बारे में किसी भी शक को खत्म कर दिया।

कोर्ट का गैर-कानूनी जमावड़े और एक जैसे मकसद का आकलन

फैसले में कोर्ट ने समीक्षा किया कि क्या आरोपी ने गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा बनकर काम किया और क्या मर्डर एक जैसे मकसद को पूरा करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जुलूस पर एतराज, DJ का तार खींचना, पत्थरबाज़ी, राम गोपाल को घर के अंदर घसीटना, कई राउंड फायरिंग, और बाद में एक साथ भागने की कोशिशें, इन सबने घटनाओं का एक लगातार सिलसिला बनाया।

कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह घटना अचानक हुई थी या किसी एक व्यक्ति का अकेला काम था। कोर्ट ने माना कि सबूतों से पता चलता है कि कई आरोपितों ने मिलकर काम किया और हिस्सा लिया, भले ही हर किसी की सही भूमिका अलग-अलग थी।

आरोपी को सजा सुनाते हुए, कोर्ट ने माना कि हत्या के तरीके से मौत पक्की करने का ‘कोल्ड-ब्लडेड’ इरादा पता चलता है। जरूरी अंगों पर बार-बार गोली चलाना, क्रूरता के और काम, और जिस माहौल में हत्या की गई, इन सब बातों को देखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि सरफराज का रोल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ कैटेगरी में आता है और उसे मौत की सजा दी गई।

सजा के नियमों पर बात करते हुए कोर्ट ने सोशल ऑर्डर बनाए रखने में सजा के रोल पर क्लासिकल ज्यूरिसप्रूडेंशियल सोच का भी जिक्र किया। कोर्ट ने मनुस्मृति का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सजा न्याय और सोशल बैलेंस बनाए रखने के लिए ज़रूरी है।

कोर्ट ने यह लाइन कोट की, ‘दंड शास्ति प्रजाः सर्वा दंड आवभाभिरक्षती। दंड सुपतेश जागर्ति, दंड धर्म विद्वरध॥’ इसका मतलब है “सजा सभी जीवों पर राज करती है; सजा ही उनकी रक्षा करती है; सज़ा तब जागती है जब सब सो रहे होते हैं, समझदार लोग सजा को ही कानून मानते हैं”।

कोर्ट ने फैसले में इस बात की भी समीक्षा की कि क्या आरोपित ने गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा बनकर काम किया और क्या मर्डर एक जैसे मकसद को पूरा करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जुलूस पर एतराज़, DJ का तार खींचना, पत्थरबाज़ी, राम गोपाल को घर के अंदर घसीटना, कई राउंड फायरिंग, और बाद में एक साथ भागने की कोशिशें, इन सबने घटनाओं का एक लगातार सिलसिला बनाया।

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला

आरोपी को सज़ा सुनाते हुए, कोर्ट ने माना कि हत्या के तरीके से मौत पक्की करने का “कोल्ड-ब्लडेड” इरादा पता चलता है। ज़रूरी अंगों पर बार-बार गोली चलाना, क्रूरता के और काम, और जिस माहौल में हत्या की गई, इन सब बातों को देखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि सरफराज का रोल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ कैटेगरी में आता है और उसे मौत की सजा दी गई।

कोर्ट ने मनुस्मृति का ज़िक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सजा न्याय और सोशल बैलेंस बनाए रखने के लिए जरूरी है।

कोर्ट ने यह लाइन कोट की, “दंड शास्ति प्रजाः सर्वा दंड आवभाभिरक्षती। दंड सुपतेश जागर्ति, दंड धर्म विद्वरध॥”, जिसका मतलब है ‘सजा सभी जीवों पर राज करती है; सज़ा ही उनकी रक्षा करती है; सजा तब जागती है जब सब सो रहे होते हैं, समझदार लोग सजा को ही कानून मानते हैं।’

कोर्ट ने आयत का हवाला देते हुए कहा कि सज़ा समाज को अनुशासित करती है, बेगुनाहों की रक्षा करती है, और तब भी रोकती है जब लोग कानून तोड़ने की कोशिश करते हैं। कोर्ट ने कहा कि मनुस्मृति में बताए गए सजा के कॉन्सेप्ट को बदला नहीं माना है, बल्कि इसे अराजकता और नैतिक पतन को रोकने के लिए शासन का एक जरूरी तरीका माना गया है।

बहराइच हिंसा के संदर्भ में, कोर्ट ने माना कि इतने क्रूर अपराध के लिए सही सज़ा न देने से न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा कम होगा और हिंसा के और कामों को बढ़ावा मिलेगा।

कोर्ट का निर्देश और 10 लोगों को सजा

कोर्ट ने सरफराज को हत्या का दोषी पाया और उसे फाँसी की सज़ा सुनाई, जबकि अब्दुल हामिद और कई दूसरे आरोपितों को भारतीय न्याय संहिता और आर्म्स एक्ट के अलग-अलग नियमों के तहत उम्रकैद के साथ-साथ कड़ी सज़ा और जुर्माने की सज़ा सुनाई गई। कुछ आरोपितों को बरी कर दिया गया क्योंकि कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और वारंट तैयार करने के आदेश जारी किए। मौत की सज़ा के मामले में, कोर्ट ने आदेश दिया कि रिकॉर्ड को कन्फर्मेशन के लिए हाई कोर्ट भेजा जाए, जैसा कि कानून के तहत जरूरी है।

मौत की सजा, उम्रकैद और सश्रम कारावास

सरफराज को मौत की सज़ा के साथ-साथ कुल आठ साल की सश्रम कारावास और 1,30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। अब्दुल हामिद को 1,81,000 रुपये के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई गई। तालिब, फ़हीम, सैफ़ अली, जावेद ख़ान, मोहम्मद जिशान, शोएब ख़ान, ननकऊ और मारूफ़ अली को भी उम्रकैद और 1,50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

कोर्ट ने माना कि भले ही उनकी भूमिकाएँ अलग-अलग थीं, लेकिन गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने में उनकी भागीदारी, जिसके कारण हत्या हुई, बिना किसी शक के साबित हुई। खुर्शीद, शकील अहमद और मोहम्मद अफ़ज़ल को बरी कर दिया गया, क्योंकि प्रॉसिक्यूशन क्राइम में उनकी भूमिका को बिना किसी शक के साबित नहीं कर सका। दोषी लोग लागू प्रोविज़न के तहत तब तक ज्यूडिशियल कस्टडी में रहेंगे जब तक इलाहाबाद हाई कोर्ट सज़ा को कन्फर्म या कम नहीं कर देता।

राम गोपाल मिश्रा के मर्डर केस में आया फ़ैसला इस बात की कड़ी याद दिलाता है कि उकसावा, भले ही उसे धार्मिक बताया जाए, किसी को भी मर्डर जैसा बड़ा कदम उठाने का हक नहीं दे सकता। कोर्ट ने साफ किया कि भले ही राम गोपाल मिश्रा ने बचाव पक्ष के आरोप के मुताबिक धार्मिक झंडा हटाया या छुआ हो।

ऐसे काम को कभी भी हत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि कानून ऐसे किसी भी काम के लिए साफ़ कानूनी उपाय देता है, न कि हिंसक बदले का लाइसेंस। सिर्फ़ ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर लाइसेंसी बंदूक का गलत इस्तेमाल करके आरोपी ने हर कानूनी हद पार कर दी, और एक छोटे से झगड़े को गैर-कानूनी हत्या में बदल दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


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