“युद्ध की आहट में फिर जलेगी लालटेन, चूल्हों पर लौटेगा स्टोव”“ईंधन संकट की आहट और 80 के दशक की वापसी – केरोसिन फिर चर्चा में”

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उत्तराखंड,देश एक बार फिर ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां, खासकर मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, तेल आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

इसी बीच केंद्र सरकार का हालिया फैसला—राशन की दुकानों के साथ-साथ पेट्रोल पंपों पर भी केरोसिन उपलब्ध कराने का—कई संकेत देता है। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि आने वाले समय की संभावित चुनौतियों का पूर्व संकेत भी है।
पहले के समय में, खासकर 80 और 90 के दशक में, केरोसिन आम आदमी की जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करता था। खाना बनाने से लेकर रोशनी तक, यह ईंधन हर घर की जरूरत था। लेकिन समय के साथ LPG, बिजली और आधुनिक साधनों ने इसकी जगह ले ली। अब जब सरकार फिर से केरोसिन की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या हम फिर उसी दौर की ओर लौट रहे हैं?
सरकार का तर्क है कि LPG की किल्लत और संभावित आपूर्ति संकट को देखते हुए यह कदम उठाया गया है, ताकि आम नागरिकों को खाना बनाने और रोशनी जैसी मूलभूत जरूरतों में कोई परेशानी न हो। हर जिले में सीमित पेट्रोल पंपों पर केरोसिन उपलब्ध कराने का निर्णय इस बात का संकेत है कि सरकार आपातकालीन विकल्प तैयार कर रही है।
जनता के लिए चेतावनी और संदेश
यह समय केवल खबर पढ़ने का नहीं, बल्कि समझने और तैयार होने का है।
अगर आपके घर में पुराना केरोसिन स्टोव, लालटेन या अन्य उपकरण मौजूद हैं, तो उन्हें नजरअंदाज न करें।
उनकी सफाई, मरम्मत (डेंट-पेंट) और उपयोग के लायक बनाना समझदारी होगी।
अगर आपके पास ऐसे साधन नहीं हैं, तो बाजार से खरीदकर रखना भी एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
यह घबराने का नहीं, बल्कि सजग रहने का समय है। इतिहास गवाह है कि संकट अचानक नहीं आता—उसकी आहट पहले सुनाई देती है।
क्या यह युद्ध की तैयारी का संकेत है?
सीधे तौर पर ऐसा कहना अतिशयोक्ति हो सकता है, लेकिन वैश्विक हालात को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। ईंधन की वैकल्पिक व्यवस्था हमेशा उन परिस्थितियों में की जाती है जब आपूर्ति बाधित होने की आशंका हो।

“चलो लौट चलें 80 के दशक में”—यह सिर्फ एक भावनात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि एक वास्तविकता की ओर इशारा हो सकता है। आधुनिकता के इस दौर में भी हमें पुराने साधनों की अहमियत समझनी होगी।
सरकार अपना काम कर रही है, अब जिम्मेदारी जनता की है कि वह समय रहते खुद को तैयार रखे।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें — क्योंकि आने वाला समय केवल तकनीक नहीं, तैयारी भी मांगेगा।


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