

नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला, भारत मण्डपम के हाल संख्या दो-तीन स्थित सेमिनार के लेखक मंच पर डॉ. सर्वेश उनियाल और हरीश भट्ट की ट्रैवलर्स हैंड बुक ‘प्रकृति पथ–नन्दा पथ’ का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर नन्दा देवी राजजात की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्ता पर गहन परिचर्चा भी हुई।
पुस्तक का लोकार्पण दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा, उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी के पूर्व उप निदेशक निशीथ कुमार, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’, शिक्षाविद एवं गढ़वाल हितैषिणी सभा के महासचिव डॉ. पवन मैठाणी तथा पुणे (महाराष्ट्र) से आए हिमालयन ट्रैवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप द्वारा किया गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
विनसर प्रकाशन और लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत करते हुए गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने कहा कि नन्दा देवी राजजात हिमालयी क्षेत्र की लगभग 280 किलोमीटर लंबी अद्भुत यात्रा है, जो हर बारह वर्ष में आयोजित होती है और आगामी वर्ष प्रस्तावित है। यह यात्रा गांवों, जंगलों, दर्रों और ग्लेशियरों से गुजरते हुए करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित होमकुंड में संपन्न होती है। उन्होंने बताया कि यह यात्रा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी विश्वभर में जानी जाती है और इसमें आस्था, प्रकृति, लोक एवं हिमालयी संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यात्रा के दौरान जागर, चांचड़ी, दांकुड़ी और झोड़ा जैसे लोकगायन इसकी विशेष पहचान हैं।
हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने पुस्तक को नन्दा देवी राजजात करने वाले यात्रियों के लिए एक संपूर्ण गाइड बताते हुए कहा कि यह पुस्तक यात्रा को अधिक सुगम और सार्थक बनाएगी। उन्होंने डॉ. सर्वेश उनियाल के लेखन की सराहना करते हुए लेखक गांव की परिकल्पना पर भी गंभीरता से कार्य किए जाने की आवश्यकता जताई।
पूर्व उपनिदेशक निशीथ कुमार ने कहा कि नन्दा देवी राजजात हिमालय के प्रति मानव की गहरी संवेदनशीलता, प्रकृति से लगाव और देवत्व की भावना का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने उल्लेख किया कि देवी नन्दा की डोली ले जाने वाले श्रद्धालु नंगे पांव इतनी लंबी यात्रा करते हैं, जो हिमालयी बुग्यालों और प्रकृति के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
शिक्षाविद डॉ. पवन मैठाणी ने राजजात से अपने व्यक्तिगत जुड़ाव का उल्लेख करते हुए बताया कि इसी विषय पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर से उन्हें अपनी पीएचडी की व्यावहारिक परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि यह यात्रा मातृशक्ति के सम्मान, बेटी के प्रति अनुराग और भक्ति में शक्ति की भावना को स्थापित करने वाला पर्व है।
पुणे से आए 70 वर्षीय हिमालयन ट्रैवलर रामचन्द्र बाबूराव जगताप ने भावुक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि वर्ष 2010 में एक अखबार की कतरन के माध्यम से उन्हें नन्दा देवी राजजात की जानकारी मिली, जिसने उन्हें इस यात्रा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि 2014 की राजजात उन्होंने अकेले पूरी की और उसी दौरान नन्दकेसरी पड़ाव से इस पुस्तक का दूसरा संस्करण खरीदा था, जिसे वे अब तक सैकड़ों लोगों को भेंट कर चुके हैं। उन्होंने इसे एक सुखद संयोग बताया कि आज वे उसी पुस्तक के तीसरे संस्करण के लोकार्पण समारोह में वक्ता के रूप में मंच पर उपस्थित हैं।
लेखक मंच पर आयोजित इस परिचर्चा में बड़ी संख्या में श्रोताओं ने सहभागिता की। नन्दा देवी राजजात के प्रति लोगों की जिज्ञासा और उत्साह पूरे कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट रूप से देखने को मिला।




