“आय बढ़ी, विकास हुआ… फिर किराये पर क्यों ‘हाय-तौबा’? उत्तराखंड में अभिभावकों का दोहरा रवैया बेनकाब”

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हल्द्वानी/रुद्रपुर। उत्तराखंड में निजी स्कूलों की फीस और अब स्कूली बस-वान किराये में बढ़ोतरी को लेकर अभिभावकों का आक्रोश सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक दिखाई दे रहा है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या यह विरोध वास्तव में आर्थिक बोझ का है या फिर यह विरोध भी ‘सुविधानुसार राजनीति’ का हिस्सा बन चुका है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा 25 मार्च को जारी नई दरों के अनुसार स्कूली बसों का किराया 2200 से 3700 रुपये और वैन का किराया 2100 से 3500 रुपये तय किया गया है। हल्द्वानी, रुद्रपुर समेत पूरे उत्तराखंड में यह व्यवस्था लागू की गई है। अभिभावक इसे “मनमानी” और “लूट” बता रहे हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
किराया बढ़ा… पर क्यों?
जब भी वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है—जैसे कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका—तो उसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों पर पड़ता है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि वर्षों से यही ट्रेंड रहा है।
डीजल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ते ही परिवहन लागत बढ़ना तय है। स्कूल बसें हवा में नहीं चलतीं—उनका खर्च ईंधन, मेंटेनेंस, ड्राइवर वेतन और परमिट पर निर्भर करता है। ऐसे में पूरे उत्तराखंड में किराया बढ़ाया गया, न कि केवल हल्द्वानी या रुद्रपुर में।
क्या वाकई ‘लूट’ है या ‘समायोजन’?
सच यह भी है कि कई क्षेत्रों में वर्षों से स्कूल परिवहन शुल्क में कोई बड़ी वृद्धि नहीं हुई थी। वहीं दूसरी ओर—
महंगाई लगातार बढ़ी
ईंधन कीमतों में उछाल आया
वेतन संरचना बदली
सुरक्षा मानकों को सख्त किया गया
ऐसे में किराये का संशोधन एक प्रशासनिक आवश्यकता भी हो सकता है।
विरोध या ‘विरोधाभास’?
अब बात उस सबसे दिलचस्प पहलू की—दोहरा रवैया।
एक तरफ यही लोग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विकास मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते। कहते हैं—
“राज्य में विकास हुआ”
“हर व्यक्ति की आय बढ़ी”
“उत्तराखंड प्रगति के पथ पर है”
और जैसे ही 1000–1500 रुपये का किराया बढ़ा—उसी विकास के ‘ब्रांड एंबेसडर’ सड़क पर उतर आए!


“आय बढ़ी, अर्थव्यवस्था मजबूत—स्कूली परिवहन किराया संशोधन को समझने की जरूरत”
उत्तराखंड में हाल ही में स्कूली बसों और वैन के किराये में हुई वृद्धि को लेकर जहां कुछ स्थानों पर असंतोष देखने को मिल रहा है, वहीं राज्य की समग्र आर्थिक स्थिति पर नजर डालें तो यह बदलाव एक व्यापक विकास परिदृश्य का हिस्सा भी प्रतीत होता है।
राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर ₹2,73,921 हो गई है, जो वर्ष 2021-22 के ₹1,94,670 की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। यानी पिछले चार वर्षों में आम नागरिक की आय में अच्छा खासा उछाल दर्ज किया गया है। इसके साथ ही राज्य की सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में 7.23 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि उत्तराखंड आर्थिक रूप से लगातार मजबूती की ओर बढ़ रहा है।
सिर्फ आय ही नहीं, बल्कि सामाजिक संकेतकों में भी सुधार हुआ है। मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स के अनुसार राज्य में गरीबी दर घटकर 6.92 प्रतिशत रह गई है, जो सरकार की योजनाओं और नीतियों के सकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है। पर्यटन और होमस्टे जैसे क्षेत्रों में 6000 से अधिक इकाइयों का संचालन ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार और आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
ऐसे में परिवहन क्षेत्र में किराये का संशोधन भी उसी आर्थिक संतुलन का हिस्सा माना जा सकता है, जहां बढ़ती लागत, ईंधन मूल्य और सेवा गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए दरों का पुनर्निर्धारण किया गया है।
जरूरत इस बात की है कि इस बदलाव को केवल आर्थिक बोझ के रूप में न देखकर राज्य की बढ़ती क्षमता और विकास के संकेत के रूप में भी समझा जाए। उत्तराखंड आज विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है, और ऐसे में छोटे-छोटे समायोजन एक मजबूत भविष्य की नींव बन सकते हैं।


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