भारत की बेटी ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराया है। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए अपने क्रांतिकारी प्रयासों के लिए रूबल नागी भारतीय महिला शिक्षिका ने प्रतिष्ठित ‘ग्लोबल टीचर प्राइज 2026’ अपने नाम किया है।

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वर्की फाउंडेशन द्वारा दिए जाने वाले इस सम्मान के साथ उन्हें 1 मिलियन डॉलर (लगभग 8.3 करोड़ रुपये) की पुरस्कार राशि प्रदान की गई है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

इस जीत ने न केवल भारत के लिए गौरव का क्षण पैदा किया है, बल्कि दुनिया को यह भी दिखाया है कि समर्पण और इनोवेशन के साथ एक शिक्षक समाज की दिशा बदल सकता है।

कौन हैं यह शिक्षिका और क्या है उनकी उपलब्धि?

इस वर्ष का यह पुरस्कार जीतने वाली रूबल नागी ने वंचित क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा, लड़कियों के सशक्तिकरण और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उन्होंने पारंपरिक रटंत विद्या के बजाय खेल-कूद और व्यावहारिक प्रयोगों के माध्यम से सीखने की विधि को लोकप्रिय बनाया।

पुरस्कार समिति के अनुसार, उनके द्वारा विकसित की गई शिक्षण पद्धतियों ने न केवल छात्रों के परिणामों में सुधार किया, बल्कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर में भी भारी कमी लाने में सफलता पाई है।

पुरस्कार का सफर और वैश्विक पहचान

‘ग्लोबल टीचर प्राइज’ को शिक्षा जगत का ‘नोबेल पुरस्कार’ माना जाता है। इस बार की प्रतियोगिता में दुनिया भर के 120 से अधिक देशों के हजारों शिक्षकों ने आवेदन किया था। कड़े चयन चरणों के बाद, भारतीय शिक्षिका को शीर्ष 10 फाइनलिस्ट में चुना गया और अंततः उनके नाम की घोषणा विजेता के रूप में की गई।

समारोह के दौरान रूबल नागी की सराहना करते हुए कहा गया कि उन्होंने संसाधनों की कमी के बावजूद तकनीक का बेहतरीन उपयोग किया और यह साबित किया कि एक महान शिक्षक के लिए कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।

पुरस्कार राशि का क्या करेंगी?

जीत के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए रूबल नागी ने कहा, “यह सम्मान मेरा नहीं, बल्कि उन सभी शिक्षकों का है जो हर दिन क्लास में बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करते हैं।” उन्होंने घोषणा की कि वह पुरस्कार राशि का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार और शिक्षकों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने में खर्च करेंगी।

इससे पहले भी साल 2020 में महाराष्ट्र के रणजीतसिंह डिसले ने यह पुरस्कार जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। अब 2026 में एक भारतीय महिला की इस उपलब्धि ने देश की गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा को एक नई वैश्विक पहचान दी है।


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