ईरान-इज़रायल संघर्ष अब अमेरिका-ईरान आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील

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मध्य-पूर्व में जारी तनाव अब केवल ईरान और इज़रायल के बीच सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच टकराव का रूप लेता दिख रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि इज़रायल अब इस संघर्ष में अपेक्षाकृत पीछे दिखाई दे रहा है, जबकि अमेरिका और ईरान मुख्य मोर्चे पर आमने-सामने हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


जानकारी के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच टकराव तेज़ हो गया है। अमेरिका ने क्षेत्र में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाते हुए करीब 6000 सैनिकों की तैनाती का अनुमान जताया है, जिससे हालात और गंभीर हो गए हैं। वहीं, ईरान ने भी अपनी आक्रामक रणनीति जारी रखते हुए अमेरिकी सैन्य ठिकानों और संसाधनों को निशाना बनाया है।
सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ऑपरेशन अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। इराक़ से नाटो देशों द्वारा सैनिकों की वापसी और बेस बंद किए जाने से अमेरिका की रणनीतिक स्थिति कमजोर हुई है। इसके चलते अमेरिका को डिएगो गार्सिया जैसे दूरस्थ सैन्य अड्डों पर निर्भर होना पड़ रहा है, जो खर्चीला और जोखिम भरा है।
इसी बीच ईरान द्वारा डिएगो गार्सिया तक मिसाइल दागने और आधुनिक F-35 लाइटनिंग II जैसे लड़ाकू विमान को निशाना बनाने के दावे ने अमेरिका को झटका दिया है। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाकर स्थिति को और गंभीर कर दिया है।
कूटनीतिक स्तर पर भी गतिरोध बना हुआ है। अमेरिका की ओर से नरम संकेतों के बावजूद ईरान की शर्तें सख्त बताई जा रही हैं। इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में ढील देने का संकेत दिया, लेकिन ईरान ने स्पष्ट किया कि वह अपने शर्तों के बिना तेल निर्यात नहीं करेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि इस संकट का समाधान किसी तीसरी बड़ी शक्ति के हस्तक्षेप से ही संभव है। चीन इस भूमिका में उभर सकता है, खासकर तब जब रूस के साथ बातचीत से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं।
वहीं, इज़रायल की रणनीति अमेरिका को इस संघर्ष में उलझाए रखने की बताई जा रही है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन उसके पक्ष में बना रहे। हालांकि, खाड़ी देशों को अपने पक्ष में लाने में उसे अब तक सफलता नहीं मिली है।
अमेरिका ने इस संघर्ष के लिए अतिरिक्त 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की है और अनुमान जताया है कि यह युद्ध 4 से 6 सप्ताह तक जारी रह सकता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर यह संघर्ष किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।


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