

राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन 7, 8 और 9 नवंबर को रुद्रपुर में कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, अल्मोड़ा द्वारा 17वां राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन आगामी 7, 8 और 9 नवंबर 2025 को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET), रामपुर रोड, रुद्रपुर में आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन की तैयारियों को लेकर शनिवार को नगर निगम सभागार में बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और सम्मेलन के मुख्य संयोजक डॉ. बी.एस. बिष्ट ने की।
बैठक में डॉ. हयात सिंह रावत ने बताया कि यह पहला अवसर है जब कुमाउनी भाषा सम्मेलन रुद्रपुर में हो रहा है, जिसमें देशभर से भाषाप्रेमी और साहित्यकार शामिल होंगे। सम्मेलन में भाषा के मानकीकरण और कवि सम्मेलन का भी आयोजन होगा।
पत्रकार महेश चंद्र पंत ने स्थानीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि डॉ. ललित उप्रेती ने आयोजन के लिए विभिन्न समितियाँ बनाने का सुझाव दिया। डॉ. किशोर चंदोला को मीडिया समन्वयक तथा योगेश वर्मा को आवास व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया।
,बैठक में प्रो. शंभू दत्त पांडे ‘शैलेय’, दयाल पांडे, हेम पंत, ललिता कापड़ी, लक्ष्मी चंद्र पंत, नवनीत, बी.डी. भट्ट सहित कई प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

✍️ संपादकीय लेख अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
संपादकीय:उत्तराखंड की भूमि केवल देवभूमि नहीं, बल्कि यह विविध भाषाओं, बोलियों, गीतों और संस्कारों की भूमि भी है। यहां की मिट्टी से जो स्वर निकलते हैं, वे केवल गीत नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति और अस्मिता के प्रतीक हैं। इन्हीं स्वरों में एक महत्वपूर्ण स्वर है — कुमाउनी भाषा। सदियों से हिमालय की गोद में पली यह भाषा अब अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत है। इसी भावना को केंद्र में रखकर “कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, अल्मोड़ा” द्वारा आगामी 7, 8 और 9 नवंबर 2025 को रुद्रपुर में आयोजित होने जा रहा है 17वां राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन।
इतिहास से वर्तमान तक कुमाउनी का सफर?कुमाउनी भाषा का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी स्वयं हिमालय की चट्टानें। यह भाषा न केवल कुमाऊँ की वादियों में बोली जाती रही, बल्कि इसने लोकगीतों, लोकनाट्यों और लोककथाओं के माध्यम से एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना का निर्माण किया। “बेडू पाको बारामासा” जैसा लोकगीत केवल गीत नहीं, बल्कि इस भाषा की आत्मा है।
लेकिन बीते दो दशकों में, जब आधुनिकता ने ग्रामीण जीवन की जगह मोबाइल की भाषा ले ली, तब यह भाषा धीरे-धीरे सार्वजनिक संवाद से पीछे हटती गई। बच्चे हिंदी और अंग्रेज़ी में शिक्षित हो रहे हैं, और कुमाउनी अब केवल दादी-नानी की कहानियों तक सीमित रह गई है।
रुद्रपुर में पहली बार — भाषा का पर्व?दिलचस्प तथ्य यह है कि 17वें सम्मेलन का आयोजन रुद्रपुर में पहली बार हो रहा है। प्रवासियों का शहर कहलाने वाला रुद्रपुर, जहां पहाड़ से आए लोग बस गए, वहां यह सम्मेलन अपनी मिट्टी से जुड़ने की पुकार बनकर गूंजेगा। आयोजन स्थल — जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET), रामपुर रोड, रुद्रपुर — को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में सजाया जाएगा।
शनिवार को नगर निगम सभागार में हुई तैयारियों की बैठक में कार्यक्रम के मुख्य संयोजक और पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बी.एस. बिष्ट ने कहा कि यह सम्मेलन केवल भाषा का नहीं, बल्कि आत्मपहचान का पर्व है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रुद्रपुर की धरती से यह संदेश पूरे उत्तराखंड और देशभर के कुमाउनी भाषाभाषियों तक जाएगा — “अपनी भाषा बोलना गर्व की बात है, शर्म की नहीं।”
पहरू” के संपादक का दृष्टिकोण — भाषा का पुनर्जागरण?इस अवसर पर उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य और प्रसिद्ध कुमाउनी पत्रिका “पहरू” के संस्थापक डॉ. हयात सिंह रावत ने कहा कि यह पहला अवसर है जब राष्ट्रीय स्तर पर भाषा प्रेमियों और साहित्यकारों का इतना बड़ा समागम तराई क्षेत्र में होगा। उन्होंने कहा —
कुमाउनी भाषा का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब हम इसे घरों से लेकर विद्यालयों तक पुनः स्थापित करें। यह सम्मेलन उसी जागृति की दिशा में एक बड़ा कदम है।”
उनके इस कथन में वह चेतावनी छिपी है जो हर सांस्कृतिक समाज के लिए जरूरी है — जब अपनी भाषा मरती है, तो उसके साथ पूरा एक सभ्यता-तंत्र भी लुप्त हो जाता है।
भाषा को संविधान की मान्यता — महेश चंद्र पंत का प्रस्ताव
वरिष्ठ पत्रकार महेश चंद्र पंत ने इस बैठक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि केवल सम्मेलन आयोजित कर लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि अब समय है कि कुमाउनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
उनके शब्दों में —जब तक हमारी भाषाओं को संवैधानिक दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इनकी रक्षा केवल भाषणों में ही होगी, धरातल पर नहीं।”
यह मांग नई नहीं है — लेकिन हर बार सरकारों की उदासीनता और नौकरशाही की लापरवाही ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। परंतु अब कुमाउनी समाज फिर से संगठित हो रहा है, और रुद्रपुर सम्मेलन इस आंदोलन को नया आयाम देगा।
तैयारियां और समितियाँ — संगठन में ही शक्ति है?पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. ललित उप्रेती ने सुझाव दिया कि सम्मेलन की सफलता के लिए जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया जाए। बैठक में इस पर सहमति बनी और विभिन्न समितियों का गठन किया गया।
डॉ. किशोर चंदोला को मीडिया समन्वयक की जिम्मेदारी दी गई।
युवा सामाजिक कार्यकर्ता योगेश वर्मा को आवास व्यवस्था का प्रभारी बनाया गया।
वरिष्ठ शिक्षाविद् आनंद सिंह धामी सहित अन्य प्रबुद्धजन स्वागत समिति में शामिल किए गए।
ये व्यवस्थाएँ यह दर्शाती हैं कि आयोजन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और व्यापक जनआंदोलन का रूप लेने जा रहा है।
कवि सम्मेलन और मानकीकरण पर मंथन?तीन दिवसीय इस सम्मेलन के दौरान न केवल साहित्यिक सत्र होंगे, बल्कि कुमाउनी भाषा के मानकीकरण (standardization) पर भी विस्तृत विचार-विमर्श होगा। साथ ही प्रसिद्ध कवियों द्वारा कवि सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें कुमाउनी लोकभाषा की विविध छटाएं दिखाई देंगी।
यह प्रयास न केवल भाषा को संरक्षित करेगा, बल्कि नई पीढ़ी के कवियों और लेखकों को प्रेरित करेगा कि वे अपनी सृजनात्मकता को अपनी मातृभाषा में व्यक्त करें।
भाषा का संरक्षण ही संस्कृति का संरक्षण?कुमाउनी भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं — यह उत्तराखंड की आत्मा की भाषा है। इसमें “झोला”, “छोला”, “घुघुत”, “भट” और “सौम्या” जैसे शब्दों में वह अपनापन है जो किसी और भाषा में नहीं। इस भाषा में “नमस्ते” की जगह “राम-राम”, “कै रैछो?” जैसे शब्द मानवीय भावनाओं की गहराई दिखाते हैं।
लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि आज हमारे युवा अपनी मातृभाषा को “देहाती” कहकर उससे दूर हो रहे हैं। सम्मेलन का यह मंच इस सोच को बदलने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकता है।
रुद्रपुर आज उस सांस्कृतिक संगम का प्रतीक बन गया है, जहां कुमाऊँ की परंपराएं और तराई का आधुनिक जीवन एक साथ चलते हैं। यहां बसे हजारों कुमाउनी परिवारों के लिए यह सम्मेलन “घर वापसी” का भाव लेकर आया है।प्रो. शंभू दत्त पांडे ‘शैलेय’, दयाल पांडे, हेम पंत, ललिता कापड़ी, लक्ष्मी चंद्र पंत, नवनीत, बी.डी. भट्ट और अन्य कई विद्वान इस आयोजन की तैयारी में सक्रिय रूप से जुड़े हैं। यह विविधता और एकजुटता इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत है।
कुमाउनी की ऊर्जा को जगाने की जरूरत?आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं होतीं — वे हमारी स्मृति, इतिहास और पहचान का आधार होती हैं। कुमाउनी भाषा को स्कूलों में वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल करने, विश्वविद्यालयों में शोध कार्यों को प्रोत्साहित करने और डिजिटल माध्यमों पर प्रसार बढ़ाने की तत्काल जरूरत है।
यदि यह सम्मेलन इन दिशा-निर्देशों पर ठोस निर्णय लेता है, तो आने वाले समय में यह आंदोलन एक भाषाई पुनर्जागरण (Linguistic Renaissance) बन सकता है।
भाषा से पहचान” — यही है रुद्रपुर सम्मेलन का संदेश?सम्मेलन का मूल संदेश यही है कि “भाषा से ही समाज की पहचान बनती है।” यदि हमारी बोली, हमारे लोकगीत और हमारे शब्द मर जाएंगे, तो हमारे पर्व, हमारी संस्कृति और हमारी पहचान भी खो जाएगी।
कुमाउनी भाषा का सम्मान केवल कुमाऊँ का नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड का सम्मान है। इस सम्मेलन के माध्यम से रुद्रपुर एक नई भूमिका निभाने जा रहा है — भाषा संरक्षण की राजधानी के रूप में।
अंत में — भाषा का दीप जलता रहे?जब-जब कोई अपनी मातृभाषा में बात करता है, वह अपनी संस्कृति को जीवित रखता है। कुमाउनी भाषा सम्मेलन हमें यही सिखाता है — कि जड़ों से जुड़ना कोई पुरातनता नहीं, बल्कि यह हमारी आत्मा की पुकार है।
इस सम्मेलन से यह आशा की जा रही है कि यह केवल तीन दिनों का आयोजन न होकर एक स्थायी आंदोलन का प्रारंभ बनेगा। यह सम्मेलन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगा कि —भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, यह जीने की पद्धति है — और जब तक हम अपनी भाषा में जीते हैं, तब तक हम जिंदा हैं।”




