दीपा मटेला और नीलम कांडपाल को Uttarakhand Rajya Nirman Andolankari Parishad द्वारा स्वर्गीय Indramani Badoni स्मृति ‘उत्तराखंड गौरव सम्मान’

Spread the love

दीपावली की आलोकरेखा से उद्यमिता की उड़ान तक — दीपा मटेला और नीलम कांडपाल को ‘उत्तराखंड गौरव’

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


दीपों का पर्व दीपावली  रोशनी का उत्सव , परंपरा, श्रम, आस्था और सृजनशीलता का संगम है। जब देवभूमि उत्तराखंड में दीपावली आती है, तो घरों की चौखटों पर रंग और चावल से बने ऐपण की सजावट  होते हुवे—वे पीढ़ियों की स्मृतियों, स्त्रियों की साधना और संस्कृति की निरंतरता का प्रतीक होते हैं। इसी दीपोत्सव की आलोकरेखा को अपने सधे हाथों से जीवंत रखने वाली प्रसिद्ध ऐपण कलाकार दीपा मटेला और उद्यमिता की मिसाल नीलम कांडपाल को इस वर्ष “स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी स्मृति उत्तराखंड गौरव सम्मान” से सम्मानित किया जाना, अपने आप में एक सांस्कृतिक घोषणा है कि यह राज्य अपनी जड़ों को पहचानता भी है और उन्हें संवारने वालों को सम्मानित भी करता है।
रुद्रपुर नगर निगम सभागार में आयोजित समारोह में Indramani Badoni की स्मृति में दिए जाने वाले इस सम्मान ने न केवल परंपरा का स्मरण कराया, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को यह संदेश भी दिया कि राज्य निर्माण का स्वप्न केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था—वह सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी स्वप्न था। कार्यक्रम में Avtar Singh Bisht, अध्यक्ष, Uttarakhand Rajya Nirman Andolankari Parishad तथा उत्तराखंड सरकार में राज्य मंत्री Uttam Dutta की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और अधिक ऊँचा किया।
ऐपण: दीपावली की देहरी से वैश्विक पहचान तक
दीपावली के अवसर पर जब घर-आंगन में ‘लक्ष्मी चौकी’, ‘अष्टदल कमल’, ‘स्वस्तिक’ और ‘सरस्वती पीठ’ के पारंपरिक ऐपण बनते हैं, तब वे केवल शुभता का आमंत्रण नहीं होते—वे उस सांस्कृतिक निरंतरता का साक्ष्य होते हैं जो उत्तराखंड को देवभूमि बनाती है। दीपा माटेला ने इसी लोककला को घर की देहरी से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है।
उनके द्वारा निर्मित ऐपण केवल कागज़ या दीवार तक सीमित नहीं। पूजा थाली, चौकी, पारंपरिक घड़ी, व्रत-त्योहारों के विशेष अलंकरण, विवाह के मांगलिक चिह्न—हर वस्तु पर उन्होंने ऐपण की सजीव छाप छोड़ी है। उनके हस्तनिर्मित उत्पाद आज देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में बसे प्रवासी उत्तराखंडियों के घरों तक पहुँच रहे हैं। यह केवल कला का विस्तार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति का भी एक रूप है।
आज जब आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोककलाएँ हाशिए पर चली जाती हैं, ऐसे समय में दीपा माटेला जैसी कलाकार परंपरा को जीवित रखने के साथ-साथ उसे आर्थिक स्वावलंबन से भी जोड़ रही हैं। उनका कार्य यह स्थापित करता है कि ऐपण केवल त्योहारों की सजावट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है।
उद्यमिता की मिसाल: नीलम कांडपाल
जहाँ दीपा मटेला संस्कृति की संरक्षिका हैं, वहीं नीलम कांडपाल आर्थिक आत्मनिर्भरता की सशक्त प्रतीक बनकर उभरी हैं। वस्त्र उद्योग से जुड़ी उनकी पहल केवल व्यापार तक सीमित नहीं है; वह एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुकी है। सिले हुए स्कूल बैग से लेकर ब्रांडेड परिधानों तक की सिलाई—उनकी फैक्ट्री स्थानीय युवाओं, विशेषकर महिलाओं के लिए रोजगार का स्थायी स्रोत बनी है।
नीलम कांडपाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने उद्योग को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन केंद्र का रूप दिया है। सरकार या विभिन्न कंपनियों द्वारा चयनित प्रशिक्षार्थी यहाँ आकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। कई युवा, जो प्रशिक्षण के बाद अपना उद्यम शुरू करना चाहते हैं, वे नीलम कांडपाल के मार्गदर्शन में अपने सपनों को आकार देते हैं। उत्तराखंड ही नहीं, उत्तर प्रदेश से भी लोग समूहों में उनकी इकाई में प्रशिक्षण लेने आते हैं। यह दृश्य स्वयं में बताता है कि स्थानीय स्तर पर खड़ी की गई पहल किस प्रकार क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर सकती है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय नीलम कांडपाल दीपा मटेला ने अपने कार्यों को डिजिटल मंच तक भी पहुँचाया है। इससे न केवल उनके उत्पादों को बाजार मिला, बल्कि अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा मिली कि वे घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाएँ।
सम्मान का व्यापक अर्थ
“स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी स्मृति उत्तराखंड गौरव सम्मान”  पुरस्कार यह उन मूल्यों का स्मरण है जिन पर राज्य की नींव रखी गई थी: संस्कृति, स्वाभिमान, समाज सेवा और आत्मनिर्भरता। Uttarakhand Rajya Nirman Andolankari Parishad द्वारा दिया जाने वाला यह सम्मान उन व्यक्तित्वों को समर्पित है जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, खेल, संस्कृति रोजगार और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो।
दीपा मटेला को पुनः सम्मानित किया जाना इस बात का संकेत है कि निरंतरता और गुणवत्ता का मूल्यांकन होता है। वहीं नीलम कांडपाल का चयन यह दर्शाता है कि राज्य केवल सांस्कृतिक संरक्षण को ही नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण को भी समान महत्व देता है।
कार्यक्रम में अध्यक्ष Avtar Singh Bisht ने कहा कि उत्तराखंड की मूल अवधारणा केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं थी; वह सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक न्याय पर आधारित थी। राज्य मंत्री Uttam Dutta ने भी इस अवसर पर लोककलाओं और लघु उद्योगों को नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
दीपावली का संदेश और वर्तमान संदर्भ
दीपावली हमें यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीपक उसे चुनौती दे सकता है। दीपा माटेला की कला और नीलम कांडपाल की उद्यमिता—दोनों उसी दीपक की भाँति हैं। एक संस्कृति के अंधकार को दूर कर रही हैं, तो दूसरी बेरोजगारी और निर्भरता के अंधकार को।
आज उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती पलायन और बेरोजगारी है। ऐसे में यदि लोककला और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन मिले, तो यह दोहरा लाभ दे सकता है—सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक सुदृढ़ीकरण। दीपा माटेला और नीलम कांडपाल का कार्य इस दिशा में एक मॉडल प्रस्तुत करता है।
जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर
स्वर्गीय Indramani Badoni का सपना केवल एक प्रशासनिक राज्य का निर्माण नहीं था, बल्कि ऐसी सामाजिक संरचना का निर्माण था जहाँ स्थानीय प्रतिभा को सम्मान और अवसर मिले। आज जब ऐसे सम्मान समारोह आयोजित होते हैं, तो वे केवल मंचीय औपचारिकता नहीं रहते—वे राज्य के चरित्र का प्रतिबिंब बन जाते हैं।
दीपा मटेला की ऐपण रेखाओं में देवभूमि की आत्मा बसती है। नीलम कांडपाल की सिलाई मशीनों की आवाज़ में आत्मनिर्भर उत्तराखंड का भविष्य गूँजता है। एक संस्कृति को जीवित रख रही हैं, दूसरी उसे आर्थिक आधार दे रही हैं।
दीपावली की रोशनी में यह संदेश स्पष्ट है—जब परंपरा और प्रगति साथ चलती हैं, तभी राज्य सच्चे अर्थों में विकसित होता है। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद ने अपनी दो बेटियों को स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी स्मृति उत्तराखंड गौरव सम्मान से सम्मानित कर यह सिद्ध किया है कि वह अपनी जड़ों को पहचानता है, उन्हें सहेजता है और उन्हें भविष्य की ओर अग्रसर भी करता है।


Spread the love