लिपुलेख दर्रा फिर खुलेगा: व्यापार, आस्था और कूटनीति का नया संगम

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लिपुलेख दर्रा को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हलचल तेज हो गई है, क्योंकि जून 2026 से भारत और चीन के बीच इस मार्ग से व्यापार पुनः शुरू होने जा रहा है। करीब 17,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह दर्रा केवल व्यापारिक रास्ता नहीं, बल्कि भारत, चीन और नेपाल के त्रिकोणीय भू-राजनीतिक समीकरण का अहम केंद्र है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


ऐतिहासिक रूप से यह मार्ग प्राचीन ‘सिल्क रूट’ की एक शाखा रहा है, जहां कुमाऊं के भोटिया समुदाय तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। 1954 में भारत-चीन समझौते के बाद इसे आधिकारिक मान्यता मिली, लेकिन भारत-चीन युद्ध 1962 के बाद इसे बंद कर दिया गया। 1992 में दोबारा खुलने के बाद यह सीमा व्यापार का प्रमुख केंद्र बना रहा, पर 2020 में कोविड और सीमा तनाव के कारण फिर ठप हो गया।
अब इसके पुनः खुलने से उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों को आर्थिक संजीवनी मिलने की उम्मीद है। भारत से मसाले, कपड़े और हस्तशिल्प निर्यात होंगे, जबकि तिब्बत से ऊन, नमक और जड़ी-बूटियां आयात होंगी। साथ ही कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए यह सबसे छोटा मार्ग होने से धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, नेपाल इस क्षेत्र पर दावा करता है और 2020 में नए नक्शे में इसे अपने क्षेत्र में दिखा चुका है, जिससे विवाद बना हुआ है। रणनीतिक रूप से भी यह दर्रा भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सैन्य दृष्टि से मजबूत स्थिति प्रदान करता है।
कुल मिलाकर, लिपुलेख दर्रा व्यापार, आस्था और कूटनीति के बीच संतुलन की एक अहम परीक्षा बनकर उभर रहा है।


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