

रुद्रपुर की फिजाओं में इस समय जो स्वर गूंज रहे हैं, वे केवल होली के गीत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा की अनुगूंज हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
विजयलक्ष्मी क्षेत्र में खड़ी होली का पड़ाव जब त्रिभुवन जोशी जी के आवास पर पहुंचा, तो ऐसा लगा मानो पूरा इलाका लोकसंस्कृति के रंग में डूब गया हो। ढोलक और हुड़के की थाप पर गूंजते शास्त्रीय राग—पीलू, काफी, जोगिया और खमाज—ने वातावरण को भक्तिरस से भर दिया।
यह आयोजन अचानक नहीं हुआ। इसकी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत जगदीश बिष्ट, श्रीमती गीता बिष्ट के परिवार के आंगन से हुई। वहां से यह स्वरधारा आगे बढ़ी और गोपाल सिंह पटवाल के यहां पहुंची, फिर राजेंद्र बोहरा और दीपा पहाड़ी के घर पर श्रद्धा और उत्साह के साथ खड़ी होली महिला होली का गायन हुआ। हर पड़ाव पर भक्ति और लोकगायन की गरिमा बनी रही। और अब विजयलक्ष्मी में यह परंपरा अपने उत्कर्ष पर दिखाई दे रही है।
खड़ी होली: उत्सव नहीं, सांस्कृतिक चेतना बनी है
उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं और गढ़वाल की धरती पर गाई जाने वाली खड़ी होली रंगों का त्योहार शास्त्रीय परंपरा का जीवंत उदाहरण बना। ढोलक मंजीरा की ताल की संगत में जब खड़े होकर पद गाए जाते हैं, तो वह दृश्य मन को भीतर तक छू गया, पर्वतीय होली सामाजिक मिलन का माध्यम है और ईश्वर आराधना का सशक्त रूप भी।
आज की होली भगवान शिव को समर्पित रही। कैलाशपति, औघड़दानी, नटराज के जयघोष के साथ जब पद गूंजे—“आज बिराजे शिव शंकर, रंग बरसे कैलाश से”—तो श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति की चमक साफ दिखाई दी। “हर हर महादेव” के उद्घोष से पूरा वातावरण ऊर्जा से भर उठा।
इसी के साथ मां भगवती की आराधना भी हुई। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं जब अबीर-गुलाल लिए भक्ति गीतों में लीन दिखीं, तो यह दृश्य सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन गया। हर हर महादेव के जयकारों के साथ यह संदेश स्पष्ट हुआ कि होली बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है—अंदर की नकारात्मकता को जलाकर सकारात्मकता का दीप जलाने का अवसर।
त्रिभुवन जोशी: खड़ी होली के समर्पित साधक ,
विजयलक्ष्मी क्षेत्र में रहने वाले त्रिभुवन जोशी का नाम आज हर जुबान पर है। लोग पूछ रहे हैं—कौन हैं खड़ी होली के “सुपरस्टार” त्रिभुवन जोशी?
वास्तव में वे किसी मंचीय प्रसिद्धि के कारण नहीं, बल्कि अपने समर्पण और साधना के कारण चर्चित हैं। वर्षों से वे खड़ी होली का आयोजन कर रहे हैं। उन्होंने पार्वतीय समाज के माध्यम से होली को बढ़ावा देने के लिए एक संस्था बनाई, जिसमें युवाओं को होली के गीत, शास्त्रीय राग, ढोल की थाप और पारंपरिक स्टेप सिखाए । उनका प्रयास केवल कार्यक्रम करना नहीं, बल्कि संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
पिछले वर्ष भी उनके यहां खड़ी होली की धूम रही, लेकिन इस बार तो दूर-दराज से लोग इसे देखने पहुंचे। सोशल मीडिया पर हर पोस्ट वायरल हो रही है। लोग जानना चाहते हैं कि कैसे एक व्यक्ति अपने समर्पण से पूरी सांस्कृतिक चेतना को जागृत कर सकता है।
त्रिभुवन जोशी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हर आयु वर्ग को साथ लेकर चलते हैं। बुजुर्गों की गंभीर स्वर लहरियां, युवाओं का उत्साह और महिलाओं की श्रद्धा—इन सबको उन्होंने एक सूत्र में पिरो दिया है।
आज की खड़ी होली में गोपाल सिंह पटवाल, राजेंद्र बोहरा, एवं जगदीश बिष्ट, महेश कांडपाल, दान सिंह मेहरा, किशन मिश्रा, गोपाल अधिकारी, हरीश दानाई, मोहन उपाध्याय, प्रकाश देवपा सहित अनेक वरिष्ठजन देर रात तक होली के गीतों में लीन रहे। यह बताता है कि उम्र केवल संख्या है, संस्कृति के प्रति प्रेम ही असली ऊर्जा है।
महिलाओं की सहभागिता भी उल्लेखनीय रही। सुधा पटवाल, नीलम कांडपाल, गीता बिष्ट, चंदा बम, किरण बोहरा, मोहिनी बिष्ट, दीपा मटेला, सरोजिनी रावत, शोभा मिश्रा, मीनू जोशी, राधा बिष्ट, भावना मेहरा, विनीता लखेरा सहित अनेक मातृशक्ति ने पारंपरिक पहाड़ी गीतों पर नृत्य कर माहौल को जीवंत बना दिया। श्रीमती एवं श्रीमान त्रिभुवन जोशी ने एक-दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर शुभकामनाएं दी गईं और प्रेमपूर्वक रंग लगाया गया।
सामाजिक समरसता का संदेश
इस खड़ी होली ने एक बार फिर साबित किया कि उत्तराखंड की संस्कृति केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। मैदानी क्षेत्रों में भी यह उतनी ही जीवंत है। यहां जाति, वर्ग, उम्र या पृष्ठभूमि का कोई भेद नहीं दिखा—सभी एक स्वर में गा रहे थे, एक-दूसरे को रंग लगा रहे थे।
रात को सामूहिक रूप से डिनर के बाद सभी अपने-अपने घरों को लौटे, लेकिन मन में भक्ति और उल्लास की छाप लिए। यह केवल आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण था।
संपादकीय दृष्टि: अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स संस्कृति से जुड़े रहना क्यों जरूरी?
आज जब आधुनिकता की दौड़ में लोकपरंपराएं हाशिए पर जा रही हैं, ऐसे में खड़ी होली जैसे आयोजन सांस्कृतिक संजीवनी का काम करते हैं। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। युवा पीढ़ी जब शास्त्रीय रागों में होली गाती है, तो वह केवल गीत नहीं गा रही होती, बल्कि अपनी पहचान को सहेज रही होती है।
त्रिभुवन जोशी जैसे लोग हमें यह सिखाते हैं कि संस्कृति को बचाने के लिए बड़े मंच की जरूरत नहीं, बल्कि समर्पण की जरूरत है। यदि हर मोहल्ला, हर समाज अपनी परंपराओं को इसी तरह सहेजे, तो सांस्कृतिक विरासत कभी लुप्त नहीं होगी।
कल चंद्र ग्रहण के बाद शाम को फिर होली सजेगी। निमंत्रण आ चुका है—अगला पड़ाव किसके यहां होगा, इसकी जानकारी हम आपको कल देंगे। लेकिन आज विजयलक्ष्मी से जो संदेश गया है, वह स्पष्ट है—अपनी संस्कृति से जुड़े रहें, अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाएं, क्योंकि यही हमारी असली पहचान है।
रुद्रपुर की पावन धरती से खड़ी होली का यह सजीव प्रसारण भक्ति, संगीत और रंगों के साथ जारी है।
हर हर महादेव!
जय मां भगवती!
जय मां काली!




