

रुद्रपुर/देहरादून/नई दिल्ली। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जयंती पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ मनाई गई। महावीर जयंती जैन समाज का प्रमुख पर्व है, मानवता को सत्य, अहिंसा और संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला सार्वभौमिक संदेश है।
महावीर जयंती का महत्व
यह पावन पर्व हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान महावीर के जन्मोत्सव के रूप में जुलूस, पूजा-अर्चना, प्रवचन और दान-पुण्य के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और रुद्रपुर में भी जैन समुदाय द्वारा भव्य शोभायात्राएं निकाली गईं।
भगवान महावीर का मूल संदेश
भगवान महावीर का जीवन और दर्शन आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उनके प्रमुख संदेश इस प्रकार हैं:
अहिंसा परमो धर्मः – किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुंचाना
सत्य – हर परिस्थिति में सत्य का पालन
अपरिग्रह – आवश्यक से अधिक संग्रह न करना
संयम – इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण
करुणा और प्रेम – सभी जीवों के प्रति दया भाव रखना
उत्तराखंड में विशेष आयोजन
उत्तराखंड के विभिन्न शहरों में जैन समाज ने धार्मिक आयोजन किए। मंदिरों को भव्य रूप से सजाया गया और सामाजिक एकता का संदेश दिया गया। रुद्रपुर में श्रद्धालुओं ने सुबह प्रभात फेरी निकाली और जरूरतमंदों के बीच फल व वस्त्र वितरण किया।
सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
आज के दौर में हिंसा, लालच और असहिष्णुता बढ़ रही है, ऐसे समय में भगवान महावीर के सिद्धांत समाज को नई दिशा देते हैं। उनका जीवन सिखाता है कि शांति, सहिष्णुता और आत्मसंयम ही सच्ची प्रगति का मार्ग है।
✍️ संपादकीय दृष्टिकोण
महावीर जयंती धार्मिक पर्व, आत्मचिंतन का अवसर है। उत्तराखंड जैसे शांतिप्रिय राज्य में इस पर्व का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां सामाजिक सौहार्द और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता बनी हुई है।
आज आवश्यकता है कि हम औपचारिकता तक सीमित न रहें, महावीर के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारें — तभी इस पर्व की सार्थकता सिद्ध होगी।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं — सत्य और अहिंसा का प्रकाश आपके जीवन में सदैव बना रहे।
आज के इस अशांत और भौतिकवादी युग में उनके विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार होना चाहिए।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
भगवान महावीर का जन्म लगभग 599 ईसा पूर्व बिहार के कुंडलपुर (वैशाली) के राजपरिवार में हुआ था। उनके पिता राजा सिद्धार्थ और माता रानी त्रिशला थीं। बचपन में उनका नाम वर्धमान था। राजसी वैभव और सुख-सुविधाओं के बीच पलने के बावजूद, वर्धमान का मन सांसारिक सुखों में नहीं लगा। उनके भीतर सत्य को जानने और दुखों से मुक्ति पाने की गहरी व्याकुलता थी।
राजसी सुख का त्याग और कठिन तपस्या
30 वर्ष की युवावस्था में, जब लोग संसार के भोग-विलास में डूबे रहते हैं, वर्धमान ने अपनी सुख-सुविधाओं और राजपाट का त्याग कर संन्यास धारण कर लिया। उन्होंने सत्य की खोज में 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने मौन धारण किया और घोर कष्ट सहे। अपनी इंद्रियों और मन पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के कारण ही उन्हें ‘महावीर’ और ‘जिनेन्द्र’ की उपाधि मिली। उन्हें 42 वर्ष की आयु में ‘केवल ज्ञान’ प्राप्त हुआ।
भगवान महावीर का जीवन सादगी और आत्मसंयम का प्रतीक था। उन्होंने भौतिक सुखों को त्यागकर आत्मिक सुख को अपनाया। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों साल पहले था। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव के बीच उनके विचार हमें शांति और संतुलन प्रदान करते हैं।
महावीर स्वामी के मुख्य सिद्धांत (पंचशील)
भगवान महावीर ने समाज को पांच महान व्रतों की शिक्षा दी, जो आज भी सफल जीवन का आधार हैं:
अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाना।
सत्य: कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का मार्ग न छोड़ना।
अस्तेय: बिना अनुमति के किसी की वस्तु न लेना या चोरी न करना।
ब्रह्मचर्य: पवित्रता और इंद्रिय संयम बनाए रखना।
अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।महावीर जयंती पर करें ये 5 कार्य, मिलेगा सुख और शांति का आशीर्वाद
‘जियो और जीने दो’ का अमर संदेश
महावीर स्वामी का सबसे क्रांतिकारी विचार ‘जियो और जीने दो’ था। उन्होंने सिखाया कि जैसे हमें अपने प्राण प्रिय हैं, वैसे ही संसार के छोटे-से-छोटे जीव को भी अपने प्राण प्रिय हैं। उन्होंने ‘अनेकांतवाद’ के माध्यम से यह भी समझाया कि सत्य के कई पहलू हो सकते हैं, इसलिए हमें दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना चाहिए।
भगवान महावीर का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची शांति बाहर की दुनिया को जीतने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को जीतने में है। उन्होंने ऊंच-नीच और जाति-पाति के भेदभाव को मिटाकर मानवता और समानता का मार्ग दिखाया। यदि हम उनके बताए मार्ग पर केवल एक कदम भी चलें, तो यह संसार हिंसा और घृणा से मुक्त होकर प्रेम और शांति का स्वर्ग बन सकता है। अंत में, यह कहा जा सकता है कि उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा सुख और शांति बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही निहित है।
‘स्वयं को जीतना, दूसरों को जीतने से कहीं अधिक कठिन और श्रेष्ठ है।’ – भगवान महावीर




