

रुद्रपुर की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। जिस चेहरे को कभी राजकुमार ठुकराल के रूप में भाजपा की आक्रामक हिंदुत्व राजनीति का प्रतीक माना जाता था, वही चेहरा आज कांग्रेस के मंच से भी उतनी ही मजबूती से स्वीकार किया जा रहा है। यह बदलाव सिर्फ दल परिवर्तन नहीं है, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान और जनभावनाओं के गहरे समीकरण का संकेत है।
ठुकराल का भाजपा से निष्कासन 2017 में हुआ, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने अपने जनाधार को कमजोर नहीं होने दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
मंदिरों में उनकी सक्रिय उपस्थिति, धार्मिक आयोजनों में भागीदारी और आम जनता से सीधा संवाद—इन सबने उनकी “हिंदू हृदय सम्राट” वाली छवि को बरकरार रखा। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस जैसे दल में जाने के बाद भी उनकी यह पहचान खत्म नहीं हुई, बल्कि और अधिक व्यापक हो गई। अब स्थिति यह है कि रुद्रपुर के मंदिरों में उनके लिए स्वागत और मस्जिदों में उनके लिए दुआ—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
यहीं से शुरू होता है असली राजनीतिक दबाव।
रुद्रपुर में भाजपा के दो प्रमुख चेहरे—विकास शर्मा और शिव अरोड़ा—जो पहले अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को लेकर अलग-अलग नजर आते थे, अब एक मंच पर दिखाई देने लगे हैं। यह सिर्फ संगठनात्मक एकता नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक मजबूरी भी है।
सवाल उठता है—क्या यह एकता भाजपा की मजबूती है, या ठुकराल के बढ़ते प्रभाव का डर?
राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि जब विरोधी खेमे का एक नेता आपकी पारंपरिक विचारधारा (यहां हिंदुत्व) पर ही पकड़ बनाए रखे, तो वह सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। ठुकराल आज वही भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने हिंदुत्व का नैरेटिव छोड़ा नहीं, बल्कि उसे कांग्रेस के भीतर स्थापित करने की कोशिश की—और इसमें उन्हें स्थानीय स्तर पर स्वीकार्यता भी मिल रही है।
भाजपा के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसका मूल वोट बैंक—हिंदुत्व समर्थक मतदाता—अब विकल्प देखने लगा है। अगर वही भावनात्मक जुड़ाव ठुकराल के साथ बना रहता है, तो मिशन 2027 में भाजपा को रुद्रपुर सीट पर कठिन मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है।
विकास शर्मा और शिव अरोड़ा का एक मंच पर आना इसी खतरे की प्रतिक्रिया माना जा रहा है। यह संदेश देने की कोशिश है कि पार्टी एकजुट है और हिंदुत्व की असली धारा अभी भी भाजपा के पास है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ मंच साझा कर लेने से जनभावनाओं का रुख बदल जाएगा?
ठुकराल की सबसे बड़ी ताकत उनका “ग्राउंड कनेक्ट” है। वे सिर्फ भाषण देने वाले नेता नहीं, बल्कि हर छोटे-बड़े धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम में मौजूद रहने वाले चेहरे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस में जाने के बावजूद उनका प्रभाव कम नहीं हुआ—बल्कि भाजपा के भीतर हलचल बढ़ गई।
मिशन 2027 का निष्कर्ष साफ है: रुद्रपुर में लड़ाई अब सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रही। यह लड़ाई “ब्रांड हिंदुत्व” बनाम “व्यक्तिगत प्रभाव” की बन चुकी है। और इस समीकरण में राजकुमार ठुकराल एक ऐसे केंद्र बिंदु बन गए हैं, जिनके इर्द-गिर्द भाजपा को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी पड़ रही है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह “खौफ” वास्तव में चुनावी नतीजों में बदलता है या भाजपा की संगठनात्मक ताकत इस चुनौती को निष्प्रभावी कर देती




