modi Government Deputy PM: बैसाखियों पर टिकी केंद्र सरकार ने अपने को मज़बूत बनाने का फ़ैसला कर लिया है। इसके लिए पार्टी जल्द ही अटल बिहारी वाजपेयी की राह पर चलती नज़र आये तो कोई हैरत नहीं होना चाहिए।

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पार्टी ने अगले कैबिनेट विस्तार या उलटफेर में उप प्रधानमंत्री बनाने का मन बना लिया है। पर अभी इस विचार को अंतिम रूप महज़ इसलिए नहीं दिया जा सका है क्योंकि गठबंधन की गाँठों के चलते उसे यह तय करने में समय लग रहा है कि उप प्रधानमंत्री के पद से गठबंधन के किस साथी को नवाज़ा जाए, नीतीश कुमार को या फिर चंद्र बाबू नायडू को। हालाँकि संख्या बल के अनुसार इस पद पर टीडीपी की दावेदारी मज़बूत मानी जानी चाहिए पर जिस तरह भाजपा बिहार में कमल के फूल वाली सरकार बनाना चाहती दिख रही है उससे तो यह लगता है कि यह नया पद नीतीश कुमार के लिए ही तैयार किया जा रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

बिहार कार्ड और नीतीश कुमार

भाजपा ने जिस तरह बिहार में अचानक अपने पासे को फेंक कर बहुमत की सरकार चला रहे सुशासन बाबू को राज्य सभा का पर्चा दाखिल करने के हालात में लाकर खड़ा किया है, उससे तो यही लगता है कि उनके लिए कोई बड़ी कुर्सी गढ़ी जा रही है। सुशासन बाबू केंद्र में कृषि, परिवहन व रेल सरीखे महत्वपूर्ण विभाग बहुत पहले ही सँभाल चुके हैं।

अगर भाजपा नीतीश कुमार को उप प्रधानमंत्री का ओहदा दे देती है, तो बिहार से उनको हटाये जाने को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दिया जा सकेगा। सच्चाई ये भी है कि आज बिहार में और केंद्र में भाजपा जिस पायदान पर खड़ी है उसमें नीतीश कुमार के साथ छोड़ जाने से कोई नुक़सान नहीं होने वाला हैं। क्योंकि नीतीश के पास लोकसभा में बारह और राज्य सभा में चार सासंद हैं। जबकि चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के पास लोकसभा में सोलह व राज्य सभा में दो सासंद हैं। ऐसे में यदि चंद्रबाबू नायडू को उप प्रधानमंत्री के पद से नवाज़ा जाये तो शायद केंद्र की सरकार के साथ ही साथ दक्षिणी राज्यों में होने वाले चुनाव में भी फायदा उठाया जा सकता हैं।

आंकड़ों का फार्मूला तो एनडीए के पक्ष में

वैसे, संसद का एक फ़ार्मूला यह भी बताता है कि अगर चंद्रबाबू नायडू भी भाजपा का साथ छोड़ दें तो भी केंद्र की सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। क्योंकि एनडीए के पास अभी बहुमत के आँकड़ों के हिसाब से 293 सांसदों का गणित है। टीडीपी के सोलह सांसद ही हैं। इसके बाद भी संसद में भाजपा बहुमत के आँकड़े 273 से ऊपर ही नज़र आ रही है। यही नहीं, दिलचस्प यह है कि टीडीपी व जदयू दोनों के कुल 28 सांसद भी अगर एनडीए गठबंधन से अलग हो जायें तब भी इस गठबंधन के पास 265 सासंद बचे रहेंगे। केंद्र सरकार को बहुमत के लिये सात सासंदों की और ज़रूरत पड़ेगी। यह तो तब है जब सभी सांसद सदन में मौजूद हों।

इससे भी दिलचस्प यह है कि यदि टीडीपी व जदयू, दोनों इंडिया गठबंधन में चले भी जाते हैं, तब भी इस गठबंधन की सरकार नहीं बन सकती है। संसद में इंडिया गठबंधन की संख्या 234 है। टीडीपी व जदयू के साथ जाने के बाद यह संख्या बढ़ कर 264 तक ही पहुँच पाती है। अब इस गठबंधन को कम से कम नौ -दस सांसद और चाहिए होंगे।

ऐसे गणित में भाजपा अगर किसी को भी उप प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाती है तो वह भाजपा की कृपा होगी, किसी की दावेदारी नहीं। चूँकि दक्षिण के चार राज्यों में आने वाले महीनों में विधानसभा चुनाव हैं। ऐसे में उम्मीद यह की जानी चाहिए कि भाजपा की कृपा चंद्रबाबू नायडू पर बरसने की गुंजाइश ज्यादा है। क्या होगा, यह तो समय बतायेगा पर यह तय है कि भाजपा अपने दल में जिस परिवारवाद की मुख़ालफ़त करती आ रही है, उसने अपने तमाम बड़े नेताओं के परिजनों को राजनीति से दूर रखा, चंद्रबाबू नायडू व नीतीश कुमार के मामले में उसे इसी परिवारवाद को ही हवा देनी होगी।


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