

कोटद्वार (उत्तराखंड)।उत्तराखंड के कोटद्वार शहर में जिम संचालक दीपक कुमार इन दिनों सुर्खियों में हैं। वजह कोई खेल उपलब्धि या सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक वायरल वीडियो और उसके बाद खड़ा हुआ राजनीतिक–सांप्रदायिक विवाद है। 26 जनवरी को कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार के साथ कथित तौर पर कुछ लोगों द्वारा की जा रही बदसलूकी के दौरान दीपक कुमार बीच में आए और दुकानदार का पक्ष लेने का दावा किया। दुकानदार एक बीमारी से पीड़ित बताया जा रहा था और उससे दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने को कहा जा रहा था।
इसी दौरान हुई बहस में जब दीपक से उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते दीपक राष्ट्रीय स्तर की बहस का हिस्सा बन गए। कुछ लोगों ने उन्हें साहस का प्रतीक बताया तो कुछ ने इसे उकसावे की कार्रवाई करार दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
बजरंग दल से टकराव और पुलिस介入
वीडियो वायरल होने के बाद 31 जनवरी को बजरंग दल के कुछ सदस्यों और दीपक कुमार के बीच दोबारा बहस की स्थिति बनी। मामला बढ़ता देख पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। हालात को देखते हुए दीपक को पुलिस सुरक्षा दी गई और शहर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है, हालांकि इस मामले में दर्ज मुकदमों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
हीरो बना, लेकिन कीमत ज़मीनी स्तर पर चुकानी पड़ी
विवाद का सबसे बड़ा असर दीपक कुमार के जिम व्यवसाय पर पड़ा है। कोटद्वार में किराए की इमारत में चलने वाला ‘हल्क जिम’ कभी 150 सदस्यों का भरोसा जीत चुका था। आज हालात यह हैं कि रोज़ाना सिर्फ 15 लोग ही जिम पहुंच रहे हैं।
दीपक के मुताबिक, लोग डरे हुए हैं और वह इसे समझते भी हैं। जिम का मासिक किराया करीब 40 हजार रुपये है। परिवार की यही एकमात्र आय है। हाल ही में घर बनवाने के बाद 16 हजार रुपये की मासिक लोन किस्त भी चल रही है।
दीपक कहते हैं, “आधे शहर के लोग मेरे साथ हैं, लेकिन अच्छे काम की तारीफ़ कम और उसकी कीमत ज़्यादा चुकानी पड़ती है।”
शहर दो हिस्सों में बंटा, बाहर से समर्थन—अंदर सन्नाटा
यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति या एक जिम तक सीमित नहीं रहा। कोटद्वार शहर साफ़ तौर पर दो ध्रुवों में बंटता दिख रहा है—एक वर्ग दीपक को समर्थन दे रहा है, दूसरा उनके व्यवहार से नाराज़ है। दिलचस्प बात यह है कि जिस समर्थन की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वह ज़्यादातर शहर के बाहर से आ रहा है।
रविवार को CPI(M) की संसदीय दल के नेता और राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने दुकानदार वकील अहमद और दीपक कुमार से मुलाकात की। CPI(M) ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि उन्होंने जिम का दौरा कर मेंबरशिप ली क्योंकि ‘सांप्रदायिक तत्वों की धमकियों के कारण जिम खाली पड़ा है’। पार्टी ने कोटद्वार पुलिस स्टेशन में भी विरोध दर्ज कराने की बात कही और दीपक को ‘फासीवादी ताकतों के खिलाफ खड़े होने वाला साहसी नागरिक’ बताया।
कटाक्ष: पोस्ट से हीरो, भुगतान ज़मीन पर
यह पूरा घटनाक्रम एक कड़वा सवाल छोड़ जाता है—क्या सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक दौरे और प्रतीकात्मक मेंबरशिप किसी की रोज़ी-रोटी बचा सकते हैं? दीपक को ‘हीरो’ कहने वालों की तस्वीरें और बयान तो सामने हैं, लेकिन जिम का किराया, लोन की किश्त और खाली होती मशीनें भी एक सच्चाई हैं।
यह हमारे समय का विरोधाभास है कि संघर्ष को ट्रेंड और साहस को अवसर में बदलने वाले लोग नैतिक जीत का जश्न मनाते हैं, जबकि असली कीमत वही व्यक्ति चुकाता है जो ज़मीन पर खड़ा होता है।
दीपक का कहना
दीपक कुमार का कहना है कि उन्हें अब भी नहीं लगता कि उन्होंने कुछ गलत किया। “बाहर के लोग मेरा साथ दे रहे हैं, शहर के लोग धीरे-धीरे आगे आ रहे हैं। हालात आसान नहीं हैं, लेकिन उम्मीद है सब ठीक होगा।”
कोटद्वार की यह घटना अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जहाँ हीरो बनाना आसान है, लेकिन हीरो के साथ खड़ा होना सबसे कठिन।




