

अंकिता भंडारी अब सिर्फ़ एक नाम नहीं रही। वह उत्तराखंड की उस सामूहिक पीड़ा, आक्रोश और असंतोष का प्रतीक बन चुकी है, जो सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनमानस तक गूंज रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
देहरादून में रविवार को आयोजित महापंचायत ने यह साफ़ कर दिया कि अंकिता की हत्या का मामला अदालत के फ़ैसले तक सीमित नहीं है—यह न्याय, नैतिकता और सत्ता की जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।
2022 में एक रिसॉर्ट में काम करने वाली अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। आरोपी कोई सामान्य अपराधी नहीं, बल्कि एक पूर्व बीजेपी नेता का बेटा और उसके सहयोगी थे। अदालत द्वारा तीनों को दोषी ठहराए जाने के बावजूद यह सवाल आज भी ज़िंदा है—क्या सच में पूरी सच्चाई सामने आई?
क्या इस जघन्य अपराध के पीछे छिपे ‘VIP चेहरे’ अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं?
महापंचायत: न्याय की पुकार या सत्ता के लिए चुनौती?
देहरादून की महापंचायत कोई सामान्य सभा नहीं थी। लगभग 40 संगठनों और 500 से अधिक लोगों की मौजूदगी ने यह संकेत दे दिया कि अंकिता के माता-पिता अकेले नहीं हैं। यह भी स्पष्ट हो गया कि जनता अब सिर्फ़ दोषियों की सज़ा से संतुष्ट नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की भूमिका पर सवाल उठा रही है।
महापंचायत में पारित प्रस्तावों ने सीधे-सीधे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को कटघरे में खड़ा कर दिया। सीएम को पद से हटाने और उन्हें CBI जांच के दायरे में लाने की मांग कोई छोटी राजनीतिक मांग नहीं है। यह उस अविश्वास का प्रतीक है, जो सरकार की नीयत और निष्पक्षता पर पैदा हो चुका है।
CBI जांच या ‘कंट्रोल्ड इन्वेस्टिगेशन’?
CBI जांच की मांग आमतौर पर तब उठती है, जब स्थानीय जांच एजेंसियों पर भरोसा टूट जाता है। लेकिन इस मामले में विवाद यहीं खत्म नहीं होता—बल्कि यहीं से शुरू होता है।
पर्यावरणविद् और पद्म पुरस्कार विजेता डॉ. अनिल प्रकाश जोशी की शिकायत पर दर्ज FIR को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जब अपराध ऋषिकेश में हुआ, ट्रायल कोटद्वार में चला, तो FIR देहरादून में क्यों?
और वह भी उसी दिन, जब CBI जांच की सिफ़ारिश की गई?
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह FIR CBI जांच की दिशा और दायरा नियंत्रित करने की कोशिश हो सकती है। यही वजह है कि महापंचायत में अनिल जोशी की FIR रद्द करने का प्रस्ताव पास किया गया।
यहां सवाल FIR दर्ज करने वाले व्यक्ति की प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता का है।
अंकिता के पिता की आवाज़: सत्ता से बड़ी संवेदना
वीरेंद्र भंडारी का वाक्य—
“जब मेरी बेटी नहीं झुकी, तो मैं कैसे झुक सकता हूं?”
सिर्फ़ भावनात्मक बयान नहीं है, यह उस पिता की चेतावनी है, जो अब डरने या थकने वाला नहीं।
उन्होंने साफ़ कहा कि उनका डॉ. अनिल जोशी की FIR से कोई संबंध नहीं है और वे पहले ही मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में जांच की मांग कर चुके हैं।
उनकी मांग बिल्कुल स्पष्ट है—VIP एंगल की निष्पक्ष जांच और कॉल डिटेल रिकॉर्ड की गहन पड़ताल।
यदि सरकार और जांच एजेंसियों के पास छिपाने को कुछ नहीं है, तो फिर इन मांगों से डर क्यों?
राजनीतिक समर्थन या राजनीतिक अवसर?
महापंचायत को इंडिया गठबंधन में शामिल दलों का समर्थन मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस तरह सरकार समर्थित व्यक्ति की FIR पर सवाल उठाए, वह सत्ता के लिए असहज करने वाला है। CPI (ML) नेता इंद्रेश मैखुरी द्वारा इसे “उत्तराखंड वर्ज़न ऑफ़ एपस्टीन फाइल” कहना भले ही तीखा हो, लेकिन यह तुलना उस आशंका को दर्शाती है कि शक्तिशाली लोगों को बचाने का खेल कहीं यहां भी न खेला जाए।
यह सच है कि राजनीति हर आंदोलन में प्रवेश करती है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि न्याय के आंदोलन को राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
उत्तराखंड की असली परीक्षा
यह मामला अब अदालत से बाहर, सड़कों और सभाओं में लड़ा जा रहा है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह आरोपों का जवाब दे, बल्कि यह है कि वह जनता का विश्वास कैसे लौटाए।
अगर CBI जांच सच में निष्पक्ष है, तो उसे किसी एक FIR तक सीमित क्यों किया जाए?
अगर VIP एंगल नहीं है, तो उसे साबित करने से परहेज़ क्यों?
अंकिता भंडारी की हत्या उत्तराखंड के पर्यटन मॉडल, महिला सुरक्षा और राजनीतिक संरक्षण—तीनों पर सवाल है।
यदि इस मामले में आधा सच सामने आया, तो यह सिर्फ़ एक लड़की के साथ अन्याय होगा।
और अगर पूरा सच सामने आया, तो शायद सत्ता के कई चेहरे बेनकाब होंगे।
निष्कर्ष
अंकिता के माता-पिता की लड़ाई व्यक्तिगत नहीं रही। यह लड़ाई अब उस हर बेटी की है, जिसे सत्ता, पैसा और रसूख के सामने झुकने को कहा जाता है।
उत्तराखंड की जनता देख रही है।
इतिहास भी देख रहा है।
सवाल यह नहीं कि अंकिता को न्याय मिलेगा या नहीं,
सवाल यह है कि उत्तराखंड की आत्मा ज़िंदा रहेगी या सत्ता के बोझ तले दब जाएगी।
और शायद यही वजह है कि एक पिता की आवाज़ आज पूरे प्रदेश की आवाज़ बन चुकी है—मेरी बेटी नहीं झुकी, मैं कैसे झुकूं?




