संपादकीय:उत्तराखंड की नई चेतना — पुनः जागृत होती उत्तराखंड क्रांति दल की पहचान

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उत्तराखंड राज्य गठन को अब पच्चीस वर्ष पूरे होने को हैं। इन पच्चीस वर्षों में पहाड़ की जनता ने जो सपना देखा था — अपना राज्य, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान, और अपने संसाधनों पर अपना अधिकार — वह सपना आज भी अधूरा है। राज्य आंदोलन के नायक बुजुर्ग हो गए, युवा निराश, और पहाड़ों की घाटियाँ खाली। इस बीच, सत्ता की कुर्सियों पर वे लोग विराजमान हो गए, जिन्होंने आंदोलन के समय उत्तराखंड के नाम तक का उच्चारण नहीं किया था।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

आज जब बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याएँ विकराल रूप ले चुकी हैं, तब जनता के मन में एक ही सवाल है — क्या हमने यह राज्य इन्हीं हालातों के लिए बनाया था? और इस सवाल का उत्तर अब जनता खुद तलाश रही है। यही कारण है कि उत्तराखंड की जनता, विशेषकर युवा वर्ग, अब राष्ट्रीय पार्टियों की खोखली राजनीति से ऊब चुका है और अपने घर की पार्टी — उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) — की ओर लौटने लगा है।

राष्ट्रीय पार्टियों की नीतियों से त्रस्त युवा?आज उत्तराखंड के युवा सबसे अधिक पीड़ा झेल रहे हैं। बीटेक, एमबीए या ग्रेजुएशन करने के बाद भी उन्हें ₹7,000 से ₹10,000 तक की नौकरी पर मजबूर होना पड़ रहा है। राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार का कोई पारदर्शी मानक नहीं रहा, और जो 70 प्रतिशत स्थानीय आरक्षण नीति कभी राज्य निर्माण के समय तय की गई थी, वह आज कागजों में ही कैद है।

सेवायोजन कार्यालयों की गतिविधियाँ केवल खानापूर्ति तक सीमित हैं। सरकारें रोजगार मेलों का आयोजन करती हैं, लेकिन उनमें रोजगार से अधिक राजनीति दिखाई देती है। ऐसे में उत्तराखंड का शिक्षित युवा अब अपनी मातृभूमि छोड़ने पर मजबूर है। पलायन, जो कभी भौगोलिक विवशता थी, आज सरकारी नीतियों की विफलता का प्रतीक बन चुकी है।

राष्ट्रीय पार्टियों की नीतियाँ न तो पहाड़ की ज़मीन समझती हैं, न यहाँ के युवाओं का संघर्ष। दिल्ली और लखनऊ से थोपे गए निर्णयों ने उत्तराखंड की पहचान को खोखला बना दिया है।
भ्रष्टाचार और घोटालों का ‘देवभूमि’ में अड्डा
उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, आज रिश्वतखोरी, घोटालों और भ्रष्टाचार का केंद्र बनता जा रहा है। नेताओं ने जनता की सेवा की जगह अकूत संपत्ति, रिज़ॉर्ट, और गोवा के कसीनो तक में निवेश कर लिया है। हर सरकार के कार्यकाल में कोई न कोई घोटाला खुलता है — भूमि घोटाला, भर्ती घोटाला, शिक्षा घोटाला या शराब घोटाला।

राजनीति अब सेवा नहीं, व्यवसाय बन चुकी है। जिन्होंने ग्राम पंचायत का चुनाव तक नहीं जीता, वे आज विधायक और मंत्री बन बैठे हैं। और जिन आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड राज्य के लिए लाठी-गोली खाई, वे आज गुमनामी में जी रहे हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल ने बार-बार यह चेतावनी दी कि यह भ्रष्टाचार ही राज्य की आत्मा को खत्म कर देगा। पर राष्ट्रीय पार्टियों ने सत्ता के मोह में इस सच्चाई को कभी स्वीकार नहीं किया।

नशे की गिरफ्त में युवा पीढ़ी?आज उत्तराखंड के हर मोहल्ले, हर गाँव में शराब और नशा आसानी से उपलब्ध है। सरकारें इसे “राजस्व का स्रोत” बताकर नशे को वैध ठहराने में लगी हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि युवा पीढ़ी तेजी से बर्बादी की ओर बढ़ रही है। शराब, हेरोइन, गांजा और सिंथेटिक ड्रग्स ने पहाड़ के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है।

उत्तराखंड क्रांति दल ने इस पर सबसे पहले आवाज उठाई थी कि राजस्व से अधिक महत्वपूर्ण है समाज का नैतिक स्वास्थ्य। पार्टी ने कई बार शराबबंदी और नशामुक्त उत्तराखंड की मांग की, लेकिन राष्ट्रीय दलों के लिए शराब कारोबार वोट बैंक और चंदे का बड़ा स्रोत बना हुआ है।
संस्कृति, भाषा और भूमि पर संकट
राज्य गठन के बाद सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि उत्तराखंड की भाषाओं, लोकसंस्कृति और भू-अधिकारों की रक्षा के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनी।
कुमाऊनी, गढ़वाली, जौनसारी और भोटिया जैसी भाषाएँ आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हो पाईं। गाँवों में बाहरी लोग बड़ी मात्रा में जमीनें खरीद रहे हैं, जिससे स्थानीय लोग धीरे-धीरे अपनी ही भूमि पर “किराएदार” बनते जा रहे हैं।उत्तराखंड क्रांति दल लगातार मांग करता रहा है कि हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर भूमि संरक्षण कानून (भू-अधिनियम) लागू किया जाए। लेकिन राष्ट्रीय दलों को इसमें अपनी पूंजीवादी राजनीति खतरे में दिखती है।
राज्य की अस्मिता से जुड़े प्रतीकों तक पर बाहरी प्रभाव बढ़ा है — यहाँ तक कि कई जगहों पर ऐसे लोगों की मूर्तियाँ लगाई जा रही हैं जिनका राज्य निर्माण या स्थानीय संस्कृति से कोई नाता नहीं।
धार्मिक ध्रुवीकरण का नया खतरा?जहाँ कभी गढ़वाल और कुमाऊं भाईचारे और लोक परंपराओं के लिए जाने जाते थे, वहाँ अब हिंदू-मुस्लिम राजनीति का जहर घुल चुका है। धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जा रही हैं।

कभी मुसलमानों के डर से हिंदू कांग्रेस की ओर गए, अब हिंदुओं के डर से मुसलमान भाजपा के खिलाफ लामबंद हैं — यह डर, यह विभाजन किसी राजनीतिक सिद्धांत से नहीं, बल्कि राजनीतिक असुरक्षा और सत्ता की भूख से जन्मा है।
उत्तराखंड क्रांति दल ने हमेशा कहा है कि “उत्तराखंड की पहचान उसकी गंगा-जमुनी संस्कृति है।” यहाँ धर्म नहीं, संस्कृति और परंपरा सर्वोपरि है।

यूकेडी — फिर से जनता की उम्मीद?उत्तराखंड क्रांति दल ने राज्य आंदोलन के दौरान ही जनता के सामने यह स्पष्ट किया था कि यह राज्य किसी जाति, धर्म या दल के लिए नहीं, बल्कि जनता की आत्मनिर्भरता के लिए बनेगा।

लेकिन राज्य गठन के बाद यूकेडी को तोड़ने और कमजोर करने की साजिशें रची गईं। कुछ नेता सत्ता और पद के लालच में राष्ट्रीय दलों में शामिल हो गए। परिणामस्वरूप पार्टी जनता के विश्वास से दूर होती गई।

आज जब जनता राष्ट्रीय पार्टियों की “तलवे चाटने वाली राजनीति” से ऊब चुकी है, तब यूकेडी का पुनर्जागरण संभव हो रहा है। युवाओं में फिर से एक नया जोश है। सोशल मीडिया पर यूकेडी के प्रति बढ़ता रुझान, पहाड़ के गाँवों में पार्टी की पुनर्स्थापना, और पुराने आंदोलनकारियों का फिर से जुड़ना — यह सब संकेत हैं कि एक नई क्रांति का समय आ गया है।

आने वाले चुनावों की दिशा?अगर उत्तराखंड क्रांति दल आने वाले विधानसभा चुनावों में जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहता है, तो उसे स्पष्ट नीति और अनुशासन दिखाना होगा।

पार्टी को हर प्रत्याशी से लिखित समझौता करवाना चाहिए कि वे किसी भी परिस्थिति में सत्ता दल से नहीं जुड़ेंगे, बल्कि विपक्ष में बैठकर जनता की आवाज उठाएंगे। यही यूकेडी की पहचान रही है — जनता के हक़ की बात करने वाली विपक्षी चेतना।

साथ ही पार्टी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि युवाओं को संगठन में नेतृत्व की भूमिका मिले। गांव-गांव में रोजगार सृजन, स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेन्द्रीकरण, सरकारी विद्यालयों का पुनर्जीवन, और पलायन रोकने के लिए स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा — यही यूकेडी के एजेंडे का मूल होना चाहिए।

एक नई शुरुआत का समय?आज उत्तराखंड का हर जागरूक नागरिक यह समझ चुका है कि दिल्ली और लखनऊ से चलने वाली पार्टियाँ कभी पहाड़ के दर्द को नहीं समझ सकतीं। उत्तराखंड का विकास यहाँ की मिट्टी से, यहाँ के लोगों से और यहाँ के सोच से ही संभव है।
उत्तराखंड क्रांति दल फिर से उसी चेतना का प्रतीक बनकर उभर रहा है। यह पार्टी किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि उस भावना की प्रतिनिधि है जिसने 1990 के दशक में हजारों युवाओं को सड़कों पर उतारा था।

अब वक्त है कि हम सब मिलकर फिर से उस अधूरे स्वप्न को पूरा करें?अपना राज्य, अपनी पहचान, और अपने अधिकार।”राष्ट्रीय पार्टियों की अंधी नकल ने उत्तराखंड को आत्मनिर्भर राज्य बनने से रोका है। बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार, नशा, और सांस्कृतिक संकट — इन सबका समाधान केवल वही राजनीतिक सोच दे सकती है जो स्थानीय संवेदनशीलता, पारदर्शिता और उत्तराखंडी अस्मिता पर आधारित हो।
उत्तराखंड क्रांति दल आज फिर से उसी मूल सोच को पुनर्जीवित कर रहा है। जनता के मन में उम्मीद है कि यह पार्टी किसी पद या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि उस खोए हुए आत्मसम्मान के लिए लड़ेगी जिसके लिए यह राज्य बना था।
अगर आने वाले वर्षों में यूकेडी अपने वादों पर अडिग रही, और जनता ने इसे फिर से अवसर दिया, तो निश्चय ही उत्तराखंड एक बार फिर “आंदोलन की धरती” से “विकास की धरती” बन सकता है।
उत्तराखंड की आत्मा को पुनः जागृत करने का समय आ गया है — और इस बार, उत्तराखंड क्रांति दल उस चेतना का नेतृत्व कर रहा है।”


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