नितिन नवीन की भाजपा, पुष्कर सिंह धामी का उत्तराखंड: युवा नेतृत्व की ओर बढ़ता नया राजनीतिक अध्याय”

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बदलता नेतृत्व, बदलता भाजपा का चरित्र
नितिन नवीन के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद संगठन के भीतर जो हलचल दिखाई दे रही है, वह केवल पदों के फेरबदल की नहीं, बल्कि भाजपा के भविष्य के राजनीतिक चरित्र की दिशा तय करने वाली प्रक्रिया है। नई टीम को लेकर चल रहा विमर्श दरअसल एक पीढ़ीगत परिवर्तन का संकेत है, जिसने पार्टी के कई पुराने और स्थापित नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। यह बेचैनी स्वाभाविक भी है, क्योंकि संगठन अब स्पष्ट रूप से युवा भारत–युवा नेतृत्व के रास्ते पर आगे बढ़ता दिख रहा है।
पुराने नेताओं की बेचैनी क्यों?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


भाजपा का संगठन हमेशा अनुशासन, धैर्य और दीर्घकालिक रणनीति के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के साथ ही जिस तरह युवाओं और महिलाओं को तरजीह देने की बात सामने आई है, उसने वर्षों से संगठन में जमे कई नेताओं को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है।
उम्र अब केवल अनुभव का प्रतीक नहीं रह गई, बल्कि एक सीमा के रूप में देखी जाने लगी है। 60 वर्ष पार कर चुके नेताओं को यह डर सता रहा है कि कहीं वे “मार्गदर्शक मंडल” जैसी भूमिका में न धकेल दिए जाएं।
हाल के महीनों में कुछ नेताओं को खास चुनावी या संगठनात्मक जिम्मेदारियां देकर यह संकेत जरूर दिया गया कि सभी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा, लेकिन यह राहत अस्थायी है। असली परीक्षा तब होगी जब अगले माह मध्य तक भाजपा की पूरी केंद्रीय टीम सामने आएगी। सूत्रों के अनुसार, उपाध्यक्ष, महासचिव और सचिव स्तर पर लगभग आधे नए चेहरे होंगे। यह साफ संदेश है कि भाजपा अब केवल नामों पर नहीं, बल्कि ऊर्जा और कार्यक्षमता पर दांव लगा रही है।
महिलाओं की भूमिका: मजबूरी नहीं, रणनीति
भाजपा की नई टीम में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की चर्चा केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं है। आने वाले समय में लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू होने जा रहा है। ऐसे में संगठनात्मक स्तर पर महिलाओं को मजबूत किए बिना चुनावी मोर्चे पर सफलता संभव नहीं है।
हालांकि पार्टी संविधान में केंद्रीय पदाधिकारियों में एक-तिहाई महिलाओं की व्यवस्था है, लेकिन व्यवहार में यह लक्ष्य अभी दूर है। फिर भी पिछली टीम की तुलना में नई टीम में महिलाओं की संख्या बढ़ना तय माना जा रहा है।
यह बदलाव भाजपा को अन्य दलों से अलग खड़ा करता है, जहां महिला नेतृत्व अभी भी प्रतीकात्मक भूमिका में सीमित है।
उत्तराखंड: जहां 2027 की दिशा तय होगी
राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस संगठनात्मक बदलाव का सबसे स्पष्ट प्रभाव उत्तराखंड जैसे राज्यों में दिखाई देगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव विजन बनाम विरासत की लड़ाई होगा।
धामी का फोकस स्पष्ट है—युवा, टेक्नोलॉजी, रोजगार और सुशासन। यही कारण है कि यह लगभग तय माना जा रहा है कि 2027 के चुनाव में 60 वर्ष पूरे कर चुके नेताओं को टिकट के मामले में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
यह कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य को पुराने ढर्रे पर नहीं चलाया जा सकता। राज्य आंदोलन की विरासत का सम्मान जरूरी है, लेकिन भविष्य की राजनीति केवल अतीत के कंधों पर नहीं टिकी रह सकती।
युवा भारत–युवा नेता: नारा नहीं, प्रयोग
भाजपा का दावा है कि उत्तराखंड को देश का पहला मॉडल राज्य बनाया जाएगा। यह तभी संभव है जब संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर नई सोच, नई भाषा और नई ऊर्जा को मौका मिले।
युवाओं को आगे लाने का मतलब यह नहीं कि अनुभव को नकार दिया जाए, बल्कि अनुभव को मार्गदर्शन की भूमिका में लाकर निर्णय प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाया जाए।
नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना इसी प्रयोग का हिस्सा है। वह न केवल संगठन को नई दिशा देना चाहते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि भाजपा अब केवल चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं, बल्कि नेतृत्व गढ़ने वाली संस्था है।

नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने से भाजपा के पुराने नेताओं की बेचैनी दरअसल सत्ता या पद खोने का डर नहीं, बल्कि बदलते समय को स्वीकार करने की चुनौती है। राजनीति में ठहराव मृत्यु समान है, और भाजपा यह जोखिम नहीं लेना चाहती।
उत्तराखंड हो या देश का कोई अन्य राज्य—2027 का चुनाव स्पष्ट संकेत देगा कि भाजपा अब उम्र नहीं, योग्यता; पहचान नहीं, प्रभाव; और विरासत नहीं, विजन को प्राथमिकता देने जा रही है।
यह परिवर्तन आसान नहीं होगा, लेकिन यदि भाजपा इस संतुलन को साधने में सफल रही, तो युवा भारत–युवा नेता का नारा केवल चुनावी जुमला नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का नया अध्याय बन सकता है।


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