

उत्तराखंड की राजनीति में इस समय पंचायत चुनाव सियासी नाप-तौल का सबसे बड़ा माध्यम बन गए हैं। एक ओर जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह चुनाव एक रिपोर्ट कार्ड है, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। 12 जिलों में संपन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के परिणाम 31 जुलाई को घोषित होंगे और उसी दिन तय होगा कि पहाड़ से मैदान तक किस दल की पकड़ गांवों की ‘छोटी सरकार’ पर बनी रहेगी या निर्दलीय उम्मीदवारों की धमक भाजपा-कांग्रेस के समीकरणों को ध्वस्त कर देगी।
उधम सिंह नगर: राज्य की सत्ता का ‘ट्रायल रूम’
इस पूरे चुनावी परिदृश्य में उधम सिंह नगर जिले की भूमिका बेहद निर्णायक रही है। गन्ने के खेतों, शहरी प्रवासियों और तराई के सामाजिक तानेबाने वाले इस ज़िले में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव किसी विधानसभा से कम नहीं रहे। 17 जिला पंचायत सीटों पर जिस तरह से मुकाबला हुआ, वह एक सीधा मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि गुटों, जातीय समीकरणों और स्थानीय प्रभावशाली क्षत्रपों के बीच की रणनीतिक लड़ाई बन गया।
यहां मुख्यमंत्री धामी के भरोसेमंद सहयोगी और भाजपा के कद्दावर नेता, विधायक शिव अरोरा, तिलक राज बेहड़, राजकुमार ठुकराल, पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और अन्य कई नेता पूरी ताकत से चुनावी मैदान में उतरे। प जिला पंचायत क्षेत्र में कांटे की टक्कर ने बता दिया कि यह महज गांव की राजनीति नहीं, बल्कि 2027 के बड़े चुनावी ‘ट्रेलर’ की झलक है।

मुख्यमंत्री धामी के लिए अग्निपरीक्षा
पंचायत चुनावों में भाजपा की रणनीति एकदम स्पष्ट रही — “नगर निकाय की तरह ही मजबूत पकड़, ज़मीनी नेटवर्क और हर बूथ पर माइक्रो मैनेजमेंट”। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद चुनावी प्रचार के दौरान गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में सक्रिय रहे। उधम सिंह नगर में तो खुद मुख्यमंत्री ने एक दर्जन से अधिक जनसभाएं और बैठकें कीं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को भाजपा ने केवल ग्राम प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्यों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इन्हें सीधे-सीधे 2027 विधानसभा चुनाव की बुनियाद के रूप में देखा।
धामी मंत्रिमंडल के कई मंत्री — जैसे सौरभ बहुगुणा, गणेश जोशी, चंदन रामदास और धन सिंह रावत — इन चुनावों के जिला प्रभारी बनाए गए। उनके प्रदर्शन पर भी अब सियासी समीक्षक निगाहें टिकाए हुए हैं।
कांग्रेस: क्षत्रपों का दांव और संगठन की परीक्षा
कांग्रेस के लिए यह चुनाव ‘रीब्रांडिंग’ की कोशिश है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए क्षत्रपों पर भरोसा जताया।
हालांकि, कांग्रेस ने इन चुनावों में कोई आधिकारिक चुनाव चिह्न का प्रयोग नहीं किया, लेकिन समन्वय समिति के जरिये एक समानांतर संगठनात्मक ढांचा तैयार किया गया, जो कार्यकर्ताओं को उर्जा देने और असंतोष को नियंत्रित करने के लिए नियुक्त किया गया।
कांग्रेस का यह प्रयोग कामयाब होता है या नहीं, यह 31 जुलाई को तय होगा। लेकिन इतना जरूर है कि अगर समर्थित प्रत्याशी बड़ी संख्या में जीतते हैं, तो 2027 के लिए कांग्रेस के पास गांवों से लेकर ब्लॉकों तक मजबूत कैडर खड़ा हो जाएगा।
गांवों का मिज़ाज, निर्दलीयों की धमक
एक ओर जहां दोनों दल अपनी ‘छवि’ और संगठन की परीक्षा दे रहे हैं, वहीं गांवों में बढ़ती निर्दलीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता भी बड़ी चुनौती बन रही है। खासतौर पर उधम सिंह नगर में कई ऐसे प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं जो न तो किसी पार्टी के सिंबल पर हैं और न ही किसी बड़े चेहरे के भरोसे, लेकिन उनका जनसमर्थन पार्टी प्रत्याशियों से अधिक मजबूत दिखा।
इन निर्दलीयों में युवा, किसान नेता, पूर्व प्रधान, स्थानीय प्रभावशाली चेहरों से लेकर महिला प्रत्याशी तक शामिल हैं, जो केवल अपने कार्य से पहचान बना रहे हैं।
क्या बदलेगा जिला पंचायत समीकरण?
अब तक जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा का दबदबा रहा है। लेकिन इस बार जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद अध्यक्ष चुने जाएंगे, ऐसे में यदि निर्दलीयों की संख्या अधिक होती है तो संभावित अध्यक्ष पद के लिए जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त का खेल भी देखने को मिल सकता है।
यदि भाजपा समर्थित प्रत्याशियों की संख्या कांग्रेस और निर्दलीयों के मुकाबले कम रही, तो यह मुख्यमंत्री धामी के लिए बड़ा झटका हो सकता है। वही कांग्रेस के लिए यह आत्मविश्वास का संचार करेगा।
2027 की बुनियाद पंचायत से?
स्पष्ट है कि इस बार के पंचायत चुनाव महज स्थानीय निकायों का चयन नहीं, बल्कि आने वाले 2027 विधानसभा चुनाव की बुनियाद रखने के लिहाज से देखे जा रहे हैं। ग्रामीण वोटर का मन, नेतृत्व पर भरोसा और संगठन की पकड़, इन तीनों का निष्कर्ष 31 जुलाई को सामने होगा।
31 जुलाई को उत्तराखंड की राजनीति की दिशा और दशा तय करने वाला दिन होगा। उधम सिंह नगर सहित पूरे प्रदेश में यदि भाजपा के समर्थित प्रत्याशी बहुमत में आते हैं, तो यह मुख्यमंत्री धामी की नीतियों पर ग्रामीण जनता की मुहर मानी जाएगी। वहीं यदि कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों को बड़ी सफलता मिलती है, तो यह ‘बदले की बयार’ मानी जाएगी।
पर सबसे बड़ा सवाल अब भी यही रहेगा — क्या निर्दलीय उम्मीदवार दोनों दलों की सियासी गणित को बिगाड़ देंगे? या किसी एक दल के पक्ष में ‘चुपचाप क्रांति’ हो चुकी है?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की इस विशेष पड़ताल में हम परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद सभी 12 जिलों की विस्तृत समीक्षा भी प्रस्तुत करेंगे।
31 जुलाई को रहिए तैयार — क्योंकि यही दिन बताएगा कि 2027 का रास्ता गांव से होकर जाता है या दलों की दीवारों से टकरा जाता है।
📞 रिपोर्ट: अवतार सिंह बिष्ट, वरिष्ठ संवाददाता, रुद्रपुर
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