

ज्योतिष परंपरा के अनुसार इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्य टालना बेहतर समझा जाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद
24 फरवरी 2026 के प्रमुख शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 5:23 से 6:12 बजे तक
प्रातः संध्या: 5:47 से 7:01 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:28 से 1:15 बजे तक
विजय मुहूर्त: 2:49 से 3:35 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 6:40 से 7:05 बजे तक
व्रत-त्योहार: दुर्गाष्टमी व्रत, होलाष्टक आरंभ
इन आठ दिनों में किन कार्यों से बचें?
1. विवाह और अन्य संस्कार स्थगित रखें
शादी, सगाई, नामकरण या मुंडन जैसे मांगलिक कार्य इस अवधि में नहीं किए जाते। मान्यता है कि ग्रहों की स्थिति अनुकूल न होने से रिश्तों में तनाव आ सकता है।
2. गृह प्रवेश टालें
यदि नया घर तैयार है तो उसमें प्रवेश होली के बाद करना बेहतर माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस समय प्रवेश करने से मानसिक अशांति की आशंका रहती है।
3. नया व्यवसाय या उद्घाटन न करें
नई दुकान, स्टार्टअप या बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत को भी स्थगित करने की सलाह दी जाती है। ज्योतिषीय मान्यता है कि इस दौरान शुरू किया गया काम अपेक्षित लाभ नहीं दे पाता।
4. बड़ी खरीदारी से परहेज
वाहन, सोना-चांदी या संपत्ति जैसे बड़े निवेश टाल देना ही समझदारी है। यदि अत्यंत आवश्यक न हो तो कीमती वस्तुओं की खरीद होली के बाद करें।
5. गर्भवती महिलाओं के लिए सावधानी
परंपरागत मान्यताओं में कहा गया है कि इस समय नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ सकता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को विशेष सतर्कता बरतने और अनावश्यक बाहर जाने से बचने की सलाह दी जाती है।
क्यों माने जाते हैं ये दिन संवेदनशील?
पौराणिक आधार
कथा के अनुसार, इन्हीं दिनों में हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्लाद को अनेक यातनाएं दी थीं। उन कष्टों की स्मृति में इन दिनों को संयम और साधना का समय माना जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण
अष्टमी से पूर्णिमा तक कई प्रमुख ग्रह उग्र प्रभाव में माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में आरंभ किए गए कार्य अपेक्षित सफलता नहीं दे पाते, इसलिए शुभ कार्यों से दूरी रखने की परंपरा बनी।
क्या करें इस अवधि में?
हालांकि मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, लेकिन यह समय भक्ति और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ है। भगवान विष्णु की आराधना, महामृत्युंजय मंत्र का जप, ध्यान और दान-पुण्य करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। होलाष्टक का यह काल संयम, साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष अवसर माना जाता है।




