

पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड कोट अंतर्गत ग्राम बालमना में आदमखोर गुलदार/बाघ की गिरफ्तारी ने भले ही एक बड़ी राहत दी हो, लेकिन यह राहत अधूरी है। जिस भय ने पिछले कई दिनों से ग्रामीणों की नींद छीन रखी थी, वह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 27/28 मार्च 2026 की रात वन विभाग द्वारा पिंजरे में कैद किए गए इस खूंखार वन्यजीव ने क्षेत्र में लंबे समय तक आतंक मचाया, और 9 मार्च की दर्दनाक घटना आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में जिंदा है।

उत्तराखंड के जंगल पड़ने लगे छोटे, क्षमता से 4 गुना हुए गुलदार; इंसानों के लिए बन रहे खतरा
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
यह सच है कि वन विभाग, प्रशासन और सहयोग करने वाले स्थानीय लोगों ने साहस और तत्परता दिखाते हुए इस अभियान को सफल बनाया। इसके लिए वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक आदमखोर की गिरफ्तारी से समस्या समाप्त हो गई?
ग्रामीणों की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार क्षेत्र में अन्य गुलदार/बाघ की सक्रियता अभी भी बनी हुई है। ऐसे में यह खतरा बरकरार है कि भविष्य में फिर कोई अप्रिय घटना सामने आ सकती है। यही कारण है कि बालमना सहित आसपास के गांवों में भय और असुरक्षा का माहौल अभी भी गहराया हुआ है।
इस पूरे प्रकरण में एक और गंभीर सवाल उठता है—क्या पकड़े गए आदमखोर को कहीं और छोड़ दिया जाएगा? यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल स्थानीय बल्कि अन्य क्षेत्रों के लिए भी खतरे की घंटी बन सकता है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि यदि कोई वन्यजीव “आदमखोर” घोषित होता है, तो जनसुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए कठोर निर्णय लिया जा सकता है।
यहीं पर समाजसेवी एवं पूर्व बीएसएफ असिस्टेंट कमांडेंट रविंद्र जुयाल (रवि-बोडा) की चेतावनी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने न केवल प्रशासन से पारदर्शिता की मांग की है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि आधे-अधूरे उपाय अब स्वीकार्य नहीं होंगे। उनकी यह चेतावनी दरअसल उस जनभावना की आवाज है, जो आज बालमना के हर घर में गूंज रही है।
रविंद्र जुयाल की मांगें पूरी तरह तार्किक और जनहित में हैं—पकड़े गए आदमखोर के बारे में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जाए, यदि उसे आदमखोर घोषित किया गया है तो स्थायी समाधान सुनिश्चित किया जाए, क्षेत्र में अन्य वन्यजीवों की पहचान कर विशेष अभियान चलाया जाए, और गांव में नियमित गश्त व त्वरित प्रतिक्रिया टीम तैनात की जाए।
यह मुद्दा केवल वन्यजीव प्रबंधन का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मानव जीवन और सुरक्षा का है। जब तक ग्रामीण खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तब तक किसी भी सरकारी कार्रवाई को पूर्ण नहीं माना जा सकता।
यदि प्रशासन ने इस बार भी केवल औपचारिकता निभाई, तो यह असंतोष जल्द ही बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। मानवाधिकार आयोग और न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी यह दर्शाती है कि अब लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और सजग हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की इस खबर का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यह केवल एक समाचार नहीं, बल्कि जनसरोकारों से जुड़ा वह आईना है, जो प्रशासन को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है।
अंततः प्रशासन के सामने अब दो रास्ते हैं—या तो वह इस चेतावनी को गंभीरता से लेकर ठोस और स्थायी समाधान दे, या फिर आने वाले समय में जनआक्रोश का सामना करने के लिए तैयार रहे।
जगह की इस कमी ने न केवल इंसानों के लिए खतरा पैदा किया है, बल्कि वन्यजीवों के बीच आपसी संघर्ष को भी चरम पर पहुंचा दिया है।
बेघर गुलदार पहुंच रहे इंसानी बस्ती
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक ताजा शोध के अनुसार, एक वयस्क गुलदार को अपने अस्तित्व और शिकार के लिए 30 से 50 वर्ग किलोमीटर दायरे की आवश्यकता होती है। उत्तराखंड का कुल वन क्षेत्र 24,686 वर्ग किमी है। इस गणित के हिसाब से राज्य के जंगल केवल 500 गुलदारों का भार सह सकते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि 1,775 गुलदार ऐसे हैं जिनके पास अपना कोई निश्चित इलाका नहीं है। यही ‘बेघर’ गुलदार अब भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं।
खाली गांव और खेत बंजर, लैंटाना बढ़ रही
शोध में सामने आया कि प्रदेशभर के 3940 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। खेत बंजर होकर जंगल में बदल रहे हैं। लैंटाना तेजी से फैल रही है। यह जानवरों के छिपने के लिए आदर्श स्थिति है। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
हर वर्ष हमले में तीन मौत
● टिहरी में किए गए सर्वे के अनुसार, पिछले 10 साल में गुलदार के हमले में हर साल औसतन तीन लोगों की मौत हुई और सात लोग घायल हुए। 2021, 2022 में गुलदारों ने 172 पालतू पशुओं को भी मार डाला।
● पौड़ी गढ़वाल में वर्ष 2025 में 15 से अधिक लोग गुलदार के हमले में मारे गए, जबकि पिछले पांच वर्षों में 27 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।




